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भारत के खिलाफ ईरान ने की थी मदद, 1971 का एहसान चुका रहा पाकिस्तान; छिपाए ईरानी जेट्स

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Source :- LIVE HINDUSTAN

क्या अमेरिका के डर से ईरान ने अपने फाइटर जेट्स पाकिस्तान में छिपाए हैं? जानिए 1971 के भारत-पाक युद्ध से जुड़े ईरान के 50 साल पुराने ‘एहसान’ और नूर खान एयरबेस की इनसाइड स्टोरी।

क्या पाकिस्तान 53 साल पुराने एक एहसान का कर्ज चुका रहा है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं कि अमेरिकी हमलों के बीच ईरान ने अपने सैन्य विमानों को पाकिस्तान में छिपाया है। अगर यह सच है, तो यह 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की याद दिलाता है। तब ईरान ने पाकिस्तानी सैन्य विमानों को अपने यहां पनाह दी थी और अब पाकिस्तान वही एहसान चुकाता नजर आ रहा है।

नूर खान बेस पर विमान छिपाने के दावे और पाकिस्तान की सफाई

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच यह आरोप लग रहे हैं कि पाकिस्तान ने ईरानी सैन्य विमानों को अपने यहां शरण दी है। पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन दावों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने ‘सीबीएस न्यूज’ को बताया कि ये दावे बिल्कुल अविश्वसनीय हैं क्योंकि उनका ‘नूर खान बेस’ शहर के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित है, ऐसे में वहां विमानों के इतने बड़े बेड़े को छिपाना नामुमकिन है। दूसरी तरफ, अमेरिकी प्रशासन ने भी अब तक सार्वजनिक तौर पर इस्लामाबाद पर कोई सीधा आरोप नहीं लगाया है। लेकिन अमेरिकी इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए रिपब्लिकन पार्टी के सांसद लिंडसे ग्राहम ने अमेरिका-ईरान युद्ध को समाप्त कराने के लिए मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की भूमिका पर फिर से विचार करने की जरूरत पर जोर दिया। यह युद्ध 28 फरवरी को शुरू हुआ था।

अफगानिस्तान भी भेजे गए ईरानी विमान

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अपने कुछ नागरिक विमानों को पड़ोसी देश अफगानिस्तान भी भेजा है। एक अफगान नागरिक उड्डयन अधिकारी ने बताया कि तनाव बढ़ने से पहले ‘महान एयर’ का एक विमान काबुल में उतरा था। हालांकि, बाद में जब पाकिस्तानी हवाई हमलों के कारण काबुल एयरपोर्ट के भी निशाना बनने का डर पैदा हुआ, तो सुरक्षा के लिहाज से इस विमान को हेरात भेज दिया गया।

1971 में ईरान ने किया था पाकिस्तान पर बड़ा ‘एहसान’

1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान का विभाजन हुआ और विश्व मानचित्र पर एक नए देश ‘बांग्लादेश’ बना जो पहले पूर्वी पाकिस्तान था। 1971 के दौर में ईरान में शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था। जब 1971 के युद्ध में भारत की तीनों सेनाओं (थल, जल और वायु) ने पाकिस्तान को बुरी तरह घेर लिया, तब ईरान ने पाकिस्तान को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किए। युद्ध के दौरान जब भारतीय वायुसेना (IAF) ने पाकिस्तानी एयरबेस पर अपना दबदबा बना लिया और भारी बमबारी शुरू कर दी, तब पाकिस्तान को अपने लड़ाकू और नागरिक विमानों के नष्ट होने का डर सताने लगा। ऐसे में ईरान ने अपने एयरबेस पाकिस्तान के लिए खोल दिए। पाकिस्तान के कई सैन्य और नागरिक विमानों (PIA) ने भारतीय हमलों से बचने के लिए ईरान में शरण ली थी।

तेहरान ने इस्लामाबाद को सिर्फ नैतिक समर्थन ही नहीं दिया, बल्कि सैन्य हेलीकॉप्टर, गोला-बारूद, हथियारों के स्पेयर पार्ट्स और लड़ाकू विमानों के लिए एविएशन फ्यूल (विमान ईंधन) भी मुहैया कराया था। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर भी पाकिस्तान का ही समर्थन कर रहे थे। चूंकि अमेरिकी संसद में पाकिस्तान को हथियार देने पर रोक लगी हुई थी, इसलिए अमेरिका ने सीधे मदद करने के बजाय ईरान और जॉर्डन के जरिए पाकिस्तान तक गुपचुप तरीके से सैन्य साजो-सामान पहुंचाया। ईरान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पूर्वी पाकिस्तान में भारत के सैन्य हस्तक्षेप की कड़ी निंदा की। शाह पहलवी ने साफ शब्दों में कहा था कि वे पाकिस्तान को टुकड़ों में बंटता हुआ या ढहता हुआ नहीं देख सकते।

ईरान और अमेरिका की इस तमाम कूटनीतिक और सैन्य मदद के बावजूद, भारतीय सेना के शौर्य के आगे पाकिस्तान टिक नहीं सका। महज 13 दिनों के भीतर, 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के 93,000 से अधिक सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। भले ही पाकिस्तान युद्ध हार गया, लेकिन संकट की उस घड़ी में ईरान द्वारा विमानों को छिपाने और हथियार देने की उस घटना को पाकिस्तान के कूटनीतिक इतिहास में एक बड़े ‘एहसान’ के रूप में दर्ज किया गया।

50 सालों में कैसे बदल गए कूटनीतिक समीकरण

आधी सदी बीतने के बाद आज दुनिया का कूटनीतिक नक्शा बिल्कुल बदल चुका है। ईरान अब पश्चिम एशिया में अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन है, जबकि पाकिस्तान दक्षिण एशिया में चीन का सबसे करीबी सुरक्षा साझीदार बन चुका है।

आंकड़ों के मुताबिक साल 2020 से 2024 के बीच पाकिस्तान ने अपने मुख्य हथियारों का लगभग 80 फीसदी हिस्सा चीन से आयात किया है। वहीं, बीजिंग ने भी अमेरिका-ईरान के बीच अप्रत्यक्ष संपर्क कराने में इस्लामाबाद की भूमिका की तारीफ की है।

पाकिस्तान इस वक्त एक बेहद नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। वह चीन के सैन्य साजो-सामान पर भारी तौर पर निर्भर होने के साथ-साथ वाशिंगटन के साथ भी अपने उन सैन्य और खुफिया संबंधों को फिर से बहाल करना चाहता है, जो ओबामा प्रशासन के दौरान बिगड़ गए थे।

पाकिस्तान की मध्यस्थता की कोशिश और अमेरिका का अविश्वास

पाकिस्तानी अधिकारियों ने तेहरान के साथ अपने संबंधों को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए की गई ‘रचनात्मक कूटनीति’ बताने की कोशिश की है। इस्लामाबाद ने समय-समय पर अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश भी की है।

हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा प्रतिष्ठान के कई हिस्सों में पाकिस्तान की विश्वसनीयता को लेकर अब भी गहरा अविश्वास कायम है। इसके पीछे ओसामा बिन लादेन से जुड़ा इतिहास और इस्लामी चरमपंथी समूहों के साथ पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र के कथित रिश्ते हैं।

ईरान के विमानों को पनाह देने की हालिया रिपोर्ट्स ने अमेरिकी संसद में भी तीखी आलोचनाओं को जन्म दे दिया है। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर ये खबरें सच साबित होती हैं, तो अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की भूमिका का ‘पूरी तरह से पुनर्मूल्यांकन’ करना पड़ेगा।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN