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इस्लामाबाद ईरान जंग को खत्म करने के मकसद से हुए संघर्ष-विराम वार्ता के लिए अमेरिकी-ईरानी प्रतिनिधिमंडलों की मेजबानी कर रहा था लेकिन वह सऊदी के साथ एक ऐसे गुप्त समझौते से बंधा है कि उसे फाइटर जेट उतारने को मजबूर होना पड़ा है।
ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौता कराने के लिए एड़ी चोटी एक कर रहा पड़ोसी देश पाकिस्तान दो-धारी तलवार पर चल रहा है। एक तरफ वह शांति दूत बनकर अमेरिका–ईरान के बीच बातचीत करवा रहा है, तो दूसरी तरफ उसका सऊदी अरब के साथ ऐसा रक्षा समझौता है, जो उसे उसी युद्ध में धकेल सकता है। होर्मुज समुद्री मार्ग की अमेरिका द्वारा नाकाबंदी के बाद पश्चिम एशिया में हालात तेजी से उलझते दिख रहे हैं। इससे पाकिस्तान की चिंता और मजबूरी गहरा गई है क्योंकि ईरान और सऊदी की शत्रुता पुरानी है और इस जंग में भी उसकी बानगी दिखी है। होर्मुज संकट के बाद सऊदी पर ईरानी हमले का खतरा बढ़ा है।
पाकिस्तान की इसी मजबूरी का नतीजा है कि उसने अपने फाइटर जेट्स और अन्य जेट सऊदी अरब भेजे हैं। ये विमान किंग अब्दुल अजीज एयर बेस पर उतरे हैं। पाकिस्तान ने ऐसी सैन्य कार्रवाई ‘रणनीतिक आपसी रक्षा समझौते’ (SMDA) के तहत की है। सबसे बड़ी बात यह है कि पाकिस्तान ने यह कदम ऐसे वक्त उठाया, जब पाकिस्तान में अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता चल रही थी। इस्लामाबाद ही हफ़्तों से चल रही क्षेत्रीय लड़ाई को खत्म करने के मकसद से हुए संघर्ष-विराम वार्ता के लिए अमेरिकी-ईरानी प्रतिनिधिमंडलों की मेज़बानी कर रहा था लेकिन वह सऊदी के साथ एक ऐसे गुप्त समझौते से बंधा है कि उसे ईरान के खिलाफ भी फाइटर जेट उतारने को मजबूर होना पड़ा है।
क्या है यह ‘गुप्त’ रक्षा समझौता?
दरअसल, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक ‘रणनीतिक आपसी रक्षा समझौता’ है। इसके तहत अगर सऊदी अरब को खतरा होता है, तो पाकिस्तान को अपनी सेना भेजना अनिवार्य होगा और अगर पाकिस्तान पर कोई खतरा आता है तो सऊदी अरब के लिए सेना भेजना अनिवार्य होगा। रिपोर्ट के अनुसार, यह समझौता पाक संसद में कभी सार्वजनिक नहीं हुआ। इसमें एकतरफा जिम्मेदारी ज्यादा दिखाई देती है। यानी पाकिस्तान की भी रक्षा सऊदी करेगा ये जरूरी नहीं लगता।
‘ड्रॉप साइट न्यूज़’ के मुताबिक, इस नए समझौते के तहत इस्लामाबाद स्पष्ट रूप से इस बात के लिए बाध्य है कि अगर अनुरोध किया जाता है, तो वह सऊदी अरब की रक्षा के लिए अपनी सैन्य टुकड़ियां भेजेगा; समझौते में इस ज़िम्मेदारी को स्पष्ट शब्दों में रेखांकित किया गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि लेकिन इसमें ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिसके तहत सऊदी अरब भी बदले में पाकिस्तान की रक्षा करने के लिए बाध्य हो।
ईरान युद्ध में खिंचने का खतरा
इन परिस्थितियों में पाकिस्तान के इस युद्ध में खिंचने का खतरा मंडरा रहा है। यह वजह है कि पाकिस्तान हर हाल में ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता कराना चाहता है। अगर ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच युद्ध बढ़ता है और सऊदी अरब को खतरा होता है तो पाकिस्तान को मजबूरी में युद्ध में उतरना पड़ सकता है। यानी जो मध्यस्थता कर रहा था, वही युद्ध करने को मजबूर हो सकता है।
सऊदी का आर्थिक दबाव, दो धारी तलवार
पाकिस्तान पर सऊदी अरब का आर्थिक दबाव भी है। उसने पाकिस्तान को लंबे समय से आर्थिक मदद दी है। इसके अलावा पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक में सऊदी ने 5 अरब डॉलर से ज्यादा जमा कर रखा है। इससे इस्लामाबाद पर राजनीतिक और आर्थिक दबाव भी है। यही वजह है कि शांति और मध्यस्थता की बात करने वाला पाकिस्तान दुविधा में है। बहरहाल, पाकिस्तान के सामने अब तीन बड़ी चुनौतियां आ खड़ी हुई हैं। पहली- ईरान से रिश्ते ठीक रखना क्योंकि वह न सिर्फ पड़ोसी और सीमा साझेदार है बल्कि दोनों का धार्मिक जुड़ाव भी है। दूसरी, अमेरिका से संबंध और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना और तीसरी सऊदी के साथ रक्षा समझौते बहनाए रखना और वक्त पर उसे अमल में लाना। पाकिस्तान में बड़ी शिया आबादी भी है, जो ईरान के पक्ष में मानी जाती है। ऐसे में पाकिस्तान दो नावों की सवारी कर रहा, जो उसे मजबूरी में धकेल रही है। लिहाजा, उसकी रणनीति अब बेहद जोखिम भरी हो चुकी है।
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