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बिहार के भागलपुर शहर के बरारी घाट पर अफ़रा-तफ़री मची है.
शाम का वक़्त है और हरेराम मंडल लगभग रूआंसे हैं. उनकी आज शादी है.
उन्हें डर है कि देरी से उनकी शादी न टल जाए.
हरेराम बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, “पेट्रोल लेने में देरी हो गई. 12 मिनट ही तो लेट हुए हैं. प्रशासन उस तरफ़ पहुँचा दे. केलाबाड़ी बारात जानी है. पुल होता तो 15 मिनट लगते. अब गंगा पार नहीं करने देंगे तो 200 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ेगी. तब तक तो शादी का मुहूर्त ही निकल जाएगा.”
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दरअसल भागलपुर का विक्रमशिला सेतु (पुल) बीती तीन और चार मई की दरमियानी रात को टूट गया था. इसके बाद गंगा नदी पार करने के लिए यहां ज़िला प्रशासन ने नाव की व्यवस्था की है.
नियम के अनुसार, ये नाव सुबह पाँच बजे से शाम पाँच बजे तक ही चलती है. हरेराम मंडल का 12 मिनट लेट पहुंचना ही उनकी शादी पर संकट लेकर आया है.
विक्रमशिला सेतु-भागलपुर, कोसी, सीमांचल की लाइफ़लाइन
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हरेराम मंडल समेत हज़ारों लोग आजकल बरारी घाट पर इस मुश्किल को झेल रहे हैं.
उनकी मुश्किलों की कहानी शुरू होती है विक्रमशिला सेतु का एक स्लैब टूटकर गिरने से. ये पुल इस पूरे इलाक़े की लाइफ़लाइन है.
तीन मई को पुल का एक हिस्सा धँसने लगा था. पुल से गुजरने वाले एक ऑटो चालक का वीडियो भी वायरल हुआ था, जिसमें वो कह रहे हैं कि लोग ध्यान से इस पुल से गुजरें.
वहीं, देर रात तक पुल का ये हिस्सा इतना धंस चुका था कि लोगों को अपनी मोटरसाइकिल तक हाथ से उठाकर पुल के दूसरे हिस्से पर चढ़ानी पड़ रही थी.
ज़िला प्रशासन को इसकी सूचना रात साढ़े बारह बजे मिली. जिसके बाद भागलपुर ट्रैफ़िक पुलिस ने पुल पर लोगों की आवाजाही रोक दी और पुल को ख़ाली कराया. रात तकरीबन एक बजे पुल का स्लैब गंगा नदी में गिर गया.
भागलपुर को कोसी और पूर्णिया प्रमंडल से जोड़ने वाला ये पुल साल 2001 में बनकर तैयार हुआ था. उस वक़्त राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं. 4.7 किलोमीटर लंबे इस पुल को यूपी ब्रिज कॉर्पोरेशन ने बनाया था.
भागलपुर ज़िले का भौगोलिक नक्शा देखें तो ये पुल ज़िले को दो भागों में विभाजित करता है. पुल गिरने के बाद भागलपुर, कटिहार, पूर्णिया, अररिया, सुपौल, और सहरसा सहित कई ज़िले प्रभावित हुए हैं.
स्थानीय मीडिया में आई ख़बरों में बताया गया कि रोजाना इस पुल से क़रीब एक लाख लोग गुजरते थे. बड़ी संख्या में सामान ढोने वाले ट्रकों की वजह से पुल पर दबाव था.
इस पुल से जो दूरी महज़ कुछ मिनटों की होती थी अब वो कई घंटों में तब्दील हो गई है.
‘जान हथेली पर रखकर कर रहे हैं नौकरी’
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विक्रमशिला सेतु टूटने के बाद ज़िला प्रशासन ने तीन घाटों पर नाव, जहाज़ और जेटी चलाने का फ़ैसला लिया है.
ये घाट हैं बरारी, कहलगांव और बाबूपुर. बरारी से जहां आम लोगों के लिए नाव चलाई जाती है, वहीं कहलगांव और बाबूपुर घाट से फेरी (एक तरह का जहाज़) चलाने की कोशिश प्रशासन कर रहा है. इस फेरी में एक बार में तकरीबन 20 ट्रक लादे जा सकते हैं.
बरारी घाट जहाँ से आम लोगों का सबसे ज्यादा आवागमन है, वहां मेले जैसा माहौल है.
जीविका दीदियों के एक समूह ‘चिराग जीविका दीदी’ ने टेंट के नीचे कुछ टेबल कुर्सियां लगाकर ‘दीदी की रसोई’ लगा ली है.
जहां सस्ते दर पर चूरा, सादा खाना, चाय, चना आदि मिल रहा है. एंबुलेंस, शौचालय, आइसक्रीम, खाने-पीने के सामान की दुकान खुल गई है.
आर्यन मिश्रा पेशे से मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव हैं. उनको रोज़ाना अपने काम के सिलसिले में नवगछिया (भागलपुर ज़िले का अनुमंडल) से भागलपुर शहर आना पड़ता है.
आर्यन बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, “सरकार सिर्फ़ दो बड़े जहाज चला रही है और बाकी सब छोटी नाव हैं. गंगा में कहीं-कहीं पानी ज़्यादा है. हम लोग जान हथेली पर रखकर काम कर रहे हैं. हमे फ्री सेवा नहीं चाहिए, सरकार पैसे लेकर जहाज़ चलाए ताकि हम लोग सुरक्षित सफ़र कर सके.”
दरअसल बरारी घाट से सरकार से रजिस्टर्ड 40 से ज़्यादा छोटी, मध्यम और बड़ी आकार की नाव चल रही हैं.
इसमें प्रशासन ने इसका एक किराया तय किया हुआ है. इसके अलावा बड़ा जहाज़ रोज़ाना तीन चक्कर लगाता है, इसमें यात्रा नि:शुल्क रखी गई है.
मौसम ख़राब होने और लाइफ़ जैकेट की अनुपलब्धता के चलते नाव से यात्रा जोखिम भरी हो जाती है. इस पर भागलपुर के ज़िलाधिकारी नवल किशोर चौधरी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, “हमारी पहली वरीयता लोगों का मूवमेंट स्टार्ट कराना था. हमने लोगों की सुरक्षा के लिए आपदा मित्र तैनात कर रखे थे. अब हम लाइफ़ जैकेट को अनिवार्य करने जा रहे हैं ताकि किसी तरह की हानि नहीं हो.”
पढ़ाई-दवाई पर भी आफ़त
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ग्रेजुएशन कर रहे अभिषेक भी अपनी मोटरसाइकिल से बरारी घाट पहुंचे हैं.
अभिषेक कहते हैं, “पुल की वजह से मैं परीक्षा नहीं दे सका. मेरा उस तरफ़ आलू-प्याज का कारोबार भी है और मैं पढ़ाई भी करता हूं. अभी टीएनबी कॉलेज में परीक्षा थी, वो छूट गई. उसको फिर से लिया जाएगा लेकिन सरकार पुल जल्द ठीक करे.”
बरारी घाट पर नाव के ज़रिए लोग मवेशी, मोटरसाइकिल, रसोई गैस, पलंग, अलमारी और बॉक्स समेत कई अन्य चीज़ें ले जाते हुए दिखेंगे.
निर्मला कामत तो पुल टूटने वाले दिन ही भागलपुर आई थीं.
वो बताती हैं, “तब से यहां भागलपुर में फंस गई हूं. मेरे गांव लोकमानपुर में पति अकेले बना खा रहे हैं. पुल से जाने में चार घंटे लगते हैं.”
स्कूली बच्चों और शिक्षकों के लिए स्कूल समय पर पहुँचना भी एक चुनौती बन गई है.
मौलाना अब्दुल हन्नान अशरफ़ी जिनका आधा परिवार मधेपुरा और आधा परिवार भागलपुर में रहता है, वो बताते हैं, ” ना तो टीचर वक़्त पर स्कूल पहुंच रहे हैं और ना बच्चे.”
वहीं, शंभू प्रसाद अपने पिता के इलाज को लेकर परेशान हैं. उनका कहना है, “बहुत मुश्किल है. नाव पर कैसे चढ़ेगा मरीज़? नाव आती है तो लोग दौड़ते हैं ताकि वो नाव पर चढ़ सकें.”
पुल टूटने से कारोबार पर भी असर
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इस घाट पर दूध बेचने वालों का आना-जाना भी लगा रहता है.
अरुण प्रसाद रोजाना 80 किलो दूध नवगछिया से लेकर आते थे. अरुण बताते कि ग्राहकों ने दूध लेना कम कर दिया है.
वो कहते हैं, “दूध लेकर गाड़ी को ऊपर-नीचे (नाव पर चढ़ाना-उतारना) करना पड़ता है. दूध फटने का डर हमेशा बना रहता है.”
इसका असर यहां की थोक मंडियों पर भी देखा जा सकता है.
ईस्टर्न बिहार चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष शरद सलारपुरिया के मुताबिक पुल टूटने से कम से कम 40 हजार कारोबारियों पर असर पड़ा हैं.
शरद बताते हैं, “इस पुल के कारण थोक और खुदरा 50 फ़ीसदी व्यवसाय कम हो गया है. दवा, किराना, कॉस्मेटिक समेत कपड़ा ख़रीदने लोग पूर्णिया-कटिहार से यहां आते थे. लेकिन अब वो नहीं आ रहे हैं. हम लोगों को डर है कि अगर जल्दी पुल ठीक नहीं हुआ तो भागलपुर का मार्केट दूसरी जगह शिफ़्ट हो जाएगा.”
महीने भर पहले कहा था- ‘कोई मेजर फॉल्ट नहीं’
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पुल निर्माण विभाग की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़, बीते 18 साल में 3,698 पुल बने हैं. सिर्फ़ गंगा नदी जिस पर विक्रमशिला सेतु भी बना है, उसकी बात करें तो गंगा पर आठ पुल बने हुए हैं. आठ पुलों का निर्माण कार्य चल रहा है और तीन पुल प्रस्तावित हैं.
जून-जुलाई 2024 में गंडकी नदी पर बने सात पुल एक के बाद एक गिर गए थे. इसके बाद राज्य सरकार ने जून 2025 में पुल के रखरखाव के लिए ‘ब्रिज मेंटेनेंस पॉलिसी’ बनाई थी.
उस वक़्त पथ निर्माण मंत्री नितीन नबीन थे, जिन्होंने दावा किया था कि बिहार ऐसी पॉलिसी बनाने वाला पहला राज्य है.
विक्रमशिला सेतु को लेकर दैनिक भास्कर में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, ” अगस्त 2024 में एनएच के अधीक्षण अभियंता ने पुल में 60 एक्सपैंशन जॉइंट में 6 का गैप बढ़ने और 22 जगह चैंबर धंसने की रिपोर्ट भेजी थी. ज़िलाधिकारी नवल किशोर चौधरी ने 28 अगस्त 2025 को मुख्य सचिव अमृतलाल मीणा की समीक्षात्मक बैठक में कहा था कि विक्रमशिला सेतु की हालत ठीक नहीं है. दरारें आ रही हैं.”
बिहार पुल निर्माण निगम लिमिटेड के अध्यक्ष चंद्रशेखर सिंह ने विक्रमशिला सेतु गिरने के बाद एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस की.
इसमें उन्होंने कहा, “एक माह पहले पुल निगम, पथ निर्माण विभाग और आईआईटी पटना की एक टीम गई थी, जिसने रिपोर्ट में कहा था कि पुल के पिलर ठीक हैं और पुल में कोई मेजर फॉल्ट नहीं है. लेकिन पुल के मेंटेनेंस के लिए डीपीआर बनाकर भेजा गया था जो स्वीकृति की प्रक्रिया में था. इस बीच माइनर मरम्मत के लिए कार्यपालक अभियंता को निर्देश दिया गया था.”
पुल क्यों गिरा-उच्चस्तरीय जांच बताएगी
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विक्रमशिला सेतु गिरने के बाद राज्य सरकार ने सीमा सड़क संगठन से मदद मांगी है.
भागलपुर के ज़िलाधिकारी नवल किशोर चौधरी कहते हैं, ”उम्मीद है कि एक महीने के भीतर आम लोगों के लिए स्थिति सामान्य हो जाएगी.”
इस बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने तीन माह के भीतर विक्रमशिला सेतु को ठीक करने का निर्देश दिया है.
क्या विक्रमशिला सेतु के बाक़ी बचे हिस्से का भी ऑडिट करवाया गया है?
इस सवाल पर नवल किशोर चौधरी कहते हैं, “पुल के ऑडिट में एक-दो अन्य जगह भी छोटी-छोटी खामियां देखी गई हैं, जिनको ठीक करके ही पुल पर संचालन शुरू किया जाएगा. इसके अलावा पुराने टू लेन विक्रमशिला सेतु के समानांतर विक्रमशिला नाम से ही एक छह लेन का पुल तैयार होना है, जिसे दिसंबर 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. पुल क्यों गिरा, इसकी जांच उच्चस्तरीय टीम कर रही है.”
विक्रमशिला सेतु गिरने के बाद राज्य सरकार ने सभी पुराने पुलों का सुरक्षा ऑडिट करवाने का निर्देश दिया है.
मॉनसून को ध्यान में रखते हुए सभी इंजीनियर्स को अलर्ट रहने का निर्देश दिया गया है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिहार जहां पुल गिरना ‘सालाना दुर्घटना’ बन है, वहां सरकार की सारे एक्शन काग़ज़ी दावे ही साबित हुए हैं.
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