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सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की ‘कुछ बेरोज़गार युवा कॉकरोच…’ वाली टिप्पणी पर छिड़ी बहस

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Source :- BBC INDIA

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत

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प्रकाशित 12 मिनट पहले

पढ़ने का समय: 7 मिनट

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत शुक्रवार को सीनियर वकील का दर्जा दिए जाने की मांग संबंधी एक वकील की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे.

इस दौरान उन्होंने न्यायपालिका पर बढ़ते ‘अनुचित हमलों’ को लेकर कड़ी टिप्पणी की.

उन्होंने कहा कि ‘मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई कार्यकर्ताओं’ के कुछ वर्ग लगातार न्यायपालिका पर हमला कर रहे हैं.

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “समाज में कुछ परजीवी हैं, जो व्यवस्था पर हमला करते हैं. उन्हें रोज़गार नहीं मिलता और पेशेवर ज़िंदगी में कोई जगह नहीं मिलती. उनमें से कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर हर किसी पर हमला शुरू कर देते हैं.”

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच वकील के रवैये से नाराज़ दिखी.

यह याचिका वकील संजय दुबे की थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि दिल्ली हाई कोर्ट सीनियर वकीलों के नामांकन से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को लागू करने में देरी कर रहा है और इस पर अवमानना कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए.

जस्टिस जॉयमाल्य बागची के साथ सुनवाई कर रही इस बेंच ने याचिका ख़ारिज करते हुए कहा कि ‘सीनियर वकील’ का दर्जा अदालत से दिया जाता है, यह कोई स्टेटस सिंबल नहीं है.

जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा, “समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी मौजूद हैं जो व्यवस्था पर हमला करते हैं. क्या आप भी उनके साथ जुड़ना चाहते हैं? कुछ युवा ऐसे हैं, जो रोज़गार नहीं मिलने और पेशे में जगह न बना पाने के कारण कॉकरोच की तरह हर जगह फैल जाते हैं. उनमें से कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया पर सक्रिय हो जाते हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं, कुछ दूसरे तरह के एक्टिविस्ट बन जाते हैं और फिर हर किसी पर हमला शुरू कर देते हैं.”

क्या है पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट

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बाद में अदालत ने वकील को अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी.

जब वकील ने शिकायत की कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय प्रक्रिया का हाई कोर्ट सही तरीक़े से पालन नहीं कर रहा है, तो बेंच ने पूछा कि क्या उनके पास अपने ‘सीनियर वकील’ के दर्जे के लिए मुक़दमा लड़ने के अलावा कोई दूसरा मामला नहीं है?

जस्टिस बागची ने कहा, “सीनियर का दर्जा दिया जाता है, उसका पीछा नहीं किया जाता.”

जब बेंच को बताया गया कि हाई कोर्ट में इस समय सीनियर वकीलों के नामांकन की प्रक्रिया चल रही है, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “पूरी दुनिया शायद सीनियर दर्जे के लिए पात्र हो सकती है, लेकिन कम से कम आप नहीं हैं. अगर हाई कोर्ट आपको सीनियर बना भी देता है, तो हम आपके पेशेवर आचरण को देखते हुए उसे रद्द कर देंगे.”

वकीलों के क़ानून की डिग्रियों की जांच प्रक्रिया का ज़िक्र करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सोशल मीडिया पर कुछ वकीलों की ओर से डाली जाने वाली सामग्री को देखकर उन्हें कई वकीलों की क़ानून की डिग्रियों की प्रामाणिकता पर गंभीर संदेह है.

मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता वकील से कहा, “क्या आपको लगता है कि हम देख नहीं रहे हैं?”

उन्होंने कहा कि वह किसी उपयुक्त मामले का इंतज़ार कर रहे हैं, जिसमें दिल्ली के कई वकीलों की क़ानून की डिग्रियों की सत्यता की जांच सीबीआई से कराई जा सके, क्योंकि बार काउंसिल ऑफ इंडिया कई कारणों से ऐसा नहीं कर रही है.

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश

वकील संजय दुबे ने क्या कहा

समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए इंटरव्यू में याचिकाकर्ता वकील संजय दुबे ने सीनियर दर्जा देने में गड़बड़ियों का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, “असल में यह मामला हाई कोर्ट में सीनियर दर्जे से जुड़ा है. 2014 में सीनियर दर्जे के लिए एक नोटिफ़िकेशन जारी हुआ था और मैं भी उम्मीदवार था. प्रक्रिया में कुछ गड़बड़ियां थीं. सुधीर नंद्राजोग कमिटी के सदस्य थे और उन्होंने भी गड़बड़ियां देखने के बाद इस्तीफ़ा दे दिया था.”

उन्होंने कहा, “इसके बाद हमने प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की. जस्टिस ओक ने भी इस मामले में निर्देश जारी किए थे. गड़बड़ी यह थी कि कुछ अयोग्य लोगों को सीनियर दर्जा दे दिया गया जबकि योग्य उम्मीदवारों को नज़रअंदाज़ किया गया. फ़ैसला लेते समय सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और रिकॉर्ड्स को भी अनदेखा किया गया.”

उन्होंने कहा कि ‘सीनियर दर्जा देने के दौरान मैरिट को संज्ञान में नहीं लिया गया.’

चीफ़ जस्टिस की टिप्पणी पर छिड़ी बहस

मनोज झा

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सीजेआई की टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर कई प्रतिक्रिया आ रही हैं. राज्यसभा में राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने एक सार्वजनिक चिट्ठी लिख कर मुख्य न्यायाधीश की भाषा को लेकर चिंता जताई गई है.

उन्होंने एक्स पर यह चिट्ठी साझा की जिसमें लिखा है, “आपकी हालिया टिप्पणियों में ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ जैसे शब्दों ने देश के अनेक नागरिकों की तरह मुझे भी गहराई से विचलित किया है. चिंता केवल शब्दों के चयन की नहीं है, बल्कि उस दृष्टिकोण की है, जिसकी झलक इन टिप्पणियों में दिखाई देती है.”

“जब एक संवैधानिक लोकतंत्र के मुख्य न्यायाधीश बेरोज़गार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, मीडिया कर्मियों और असहमति व्यक्त करने वालों की तुलना “कॉकरोच” और “परजीवी” से करते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत आक्रोश का मामला नहीं रह जाता; यह लोकतंत्र की मूल आत्मा और उसकी बुनियादी संवैधानिक संस्कृति को आहत करने लगता है.”

उन्होंने लिखा, “भारत के बेरोज़गार युवा, आरटीआई कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार और असहमति रखने वाले नागरिक लोकतंत्र में रहने वाले कीड़े-मकोड़े नहीं हैं.”

उन्होंने लिखा, “ऐसे समय में, जब देश पहले ही राजनीतिक संवाद में गिरती शालीनता का साक्षी बन रहा है, न्यायपालिका से यह उम्मीद थी कि वह संवैधानिक संयम और गरिमा की अंतिम शरणस्थली बनी रहेगी.”

एक्टिविस्ट, पत्रकारों और वकीलों ने क्या कहा?

अंजली भारद्वाज

आरटीआई एक्टिविस्ट अंजली भारद्वाज ने एक्स पर की गई एक पोस्ट में कहा, “परजीवी और कॉकरोच जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना शोभा नहीं देता.”

सीजेआई की टिप्पणी को साझा करते हुए अंजलि भारद्वाज ने लिखा, “महोदय, सवाल पूछने का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है. सत्ता से जवाब मांगने वाले नागरिक व्यवस्था पर हमला नहीं कर रहे होते बल्कि उसे मज़बूत बनाए रखने में अपनी भूमिका निभा रहे होते हैं.”

“दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुख्य न्यायाधीश को मीडिया, सोशल मीडिया, आरटीआई और दूसरे एक्टिविस्ट जैसे निगरानी रखने वाले लोगों के लिए परजीवी और कॉकरोच जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना शोभा नहीं देता.”

कई किताबों की लेखिका और वरिष्ठ पत्रकार सबा नक़वी ने एक्स पर लिखा, “भारत के मुख्य न्यायाधीश ने अभी कहा कि बेरोज़गार युवा कॉकरोच जैसे हैं और मीडिया, आरटीआई एक्टिविस्ट भी कॉकरोच की तरह हैं, ख़ास तौर पर बेरोज़गार लोग. अगर यह बेहद ग़लत तरीके से पेश किया गया बयान नहीं है, तो इसके लिए शब्द नहीं हैं.”

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक्स पर लिखा, “जो युवा और आरटीआई एक्टिविस्ट आवाज़ उठाते हैं, कठिन सवाल पूछते हैं और व्यवस्था की कमियां उजागर करते हैं, क्या वे ‘कॉकरोच’ हैं? सच में, महोदय? क्या हमारे ‘लोकतंत्र’ की स्थिति अब यही रह गई है? सच में? सोचता हूं कि जस्टिस कृष्ण अय्यर जैसे लोग इस पर क्या कहते.”

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने एक्स पर लिखा, “सीजेआई की ओर से युवाओं को लेकर की गई यह टिप्पणी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ हद तक सामान्यीकृत लगती है. मैं मानता हूं कि उनके सामने मौजूद युवक ग़ैर-ज़िम्मेदार हो सकता है.”

“लेकिन इस तरह की आम टिप्पणी एक्टिविस्टों के प्रति उनके विरोध को दिखाती है, जो मौजूदा फासीवादी सत्ताधारी व्यवस्था की सोच से भी मेल खाती है. इससे ग़लत संदेश जाता है. उन्हें इस पर माफ़ी मांगनी चाहिए और सफ़ाई देनी चाहिए.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

SOURCE : BBC NEWS