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‘लग रहा जैसे पिंजरे में हैं’, शांतिदूत बनने की होड़ में बुरा फंसा पाकिस्तान; पूरी राजधानी ही ठप हो गई

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Source :- LIVE HINDUSTAN

अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता की मेजबानी के चक्कर में पाकिस्तान ने इस्लामाबाद और रावलपिंडी में अनिश्चितकालीन ‘लॉकडाउन’ लगा दिया है। जानिए कैसे ‘शांतिदूत’ बनने की होड़ पाकिस्तान की आम जनता पर भारी पड़ रही है।

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में शांतिदूत की भूमिका निभाने की पाकिस्तान की महत्वाकांक्षा का एक गंभीर परिणाम सामने आया है। वाशिंगटन और तेहरान के बीच बातचीत भले ही अभी अधर में लटकी हो, लेकिन पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद और उसका सैन्य केंद्र रावलपिंडी पूरी तरह से ठप पड़ गए हैं। इस अनिश्चितकालीन बंदी ने कोविड-19 के दौर वाले लॉकडाउन की कड़वी यादें ताजा कर दी हैं, जिससे व्यापार और आय के नुकसान के कारण जनता में भारी आक्रोश है। राजधानी इस्लामाबाद में शुक्रवार को भी यातायात ठप रहा, क्योंकि अधिकारी शांति वार्ता के लिए अमेरिका और ईरान के शीर्ष नेताओं के संभावित दौरे का इंतजार कर रहे हैं।

इस्लामाबाद और रावलपिंडी के प्रशासन ने रविवार को अति विशिष्ट लोगों के आवागमन वाले क्षेत्रों में सभी प्रमुख सड़कों और बाजारों को बंद कर दिया था, क्योंकि संकेत मिल रहे थे कि बातचीत किसी भी दिन शुरू हो सकती है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए 10,000 से अधिक सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है। हालांकि, सप्ताह समाप्त होने के बावजूद नेताओं के आगमन का कोई कार्यक्रम घोषित नहीं किया गया है। अनिश्चितता के कारण, जिला प्रशासन ने अभी तक नूर खान एयरबेस के आसपास के क्षेत्रों को फिर से खोलने और मेट्रो बस, इलेक्ट्रिक बस सेवाओं और माल परिवहन को फिर से शुरू करने के बारे में कोई निर्णय नहीं लिया है।

खाली सड़कें और ‘कोविड-लॉकडाउन’ जैसी वापसी

ब्रिटेन के समाचार आउटलेट ‘द गार्जियन’ के अनुसार, राजधानी की सड़कें कई दिनों से सुनसान हैं। सड़कों पर केवल सेना और पुलिस की वर्दी में जवान ही दिखाई दे रहे हैं। दुकानें बंद हैं, सार्वजनिक परिवहन ठप है और शहर भर में ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ (घर से काम) के आदेश लागू हैं। लोगों को लग रहा है जैसे महामारी का दौर वापस आ गया है, बस फर्क इतना है कि इस बार कारण कोई वायरस नहीं, बल्कि अमेरिका-ईरान की वह संभावित बातचीत है जो अब तक शुरू ही नहीं हो पाई है। अधिकारियों ने इस्लामाबाद और रावलपिंडी के वीवीआईपी (VVIP) क्षेत्रों, मुख्य सड़कों और बाजारों को सील कर दिया है और 10,000 से अधिक सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है।

नूर खान एयरबेस और इस्लामाबाद का रेड ज़ोन पूरी तरह से बंद है। 19 अप्रैल से मालवाहक वाहनों की आवाजाही रोक दी गई है। कागजों पर स्कूल खुले हैं, लेकिन छात्र जा नहीं पा रहे हैं। कई विश्वविद्यालयों ने ऑनलाइन पढ़ाई शुरू कर दी है।

मजदूरों और आम जनता पर दोहरी मार

इस ‘लॉकडाउन’ का सबसे बुरा असर दोनों शहरों के मजदूर वर्ग पर पड़ा है। द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद और रावलपिंडी में काम करने वाले कई ऐसे मजदूर जो किराए का फ्लैट नहीं ले सकते, उन्हें शनिवार को सरकारी आदेश के बाद उनके हॉस्टल से बेदखल कर दिया गया। हजारों लोगों को आनन-फानन में रहने के लिए नई जगह तलाशनी पड़ी।

एक स्वास्थ्य अधिकारी अरीज अख्तर ने अपनी हताशा व्यक्त करते हुए कहा, “ऐसा लगता है जैसे हम किसी पिंजरे में रह रहे हैं।” दिहाड़ी मजदूर मोहम्मद जुबैर का दर्द सबसे गहरा है: “हम काम पर नहीं जा सकते। लॉकडाउन का मतलब है कोई काम नहीं, और काम न होने का मतलब है कोई खाना नहीं। सरकार को गरीबों की कोई परवाह नहीं है।”

गहराता आर्थिक संकट और ऊर्जा की कमी

अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, जो बाज़ार हमेशा खचाखच भरे रहते थे, वहां अब दुकानदार खाली बैठकर ग्राहकों का इंतज़ार कर रहे हैं क्योंकि सार्वजनिक परिवहन बंद है। व्यवसायों को केवल कुछ घंटों के लिए खोलने की अनुमति है, जिससे उनका मुनाफा खत्म हो गया है।

इस लॉकडाउन से राजधानी की अर्थव्यवस्था को जो नुकसान हो रहा है, उसे अमेरिका-ईरान युद्ध ने और भी बदतर बना दिया है। तेहरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने से तेल और गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे पाकिस्तान में ऊर्जा संकट पैदा हो गया है।

ब्लूमबर्ग के आंकड़े इस सुस्ती को बयां करते हैं। राइड-हेलिंग ड्राइवर (अब्दुल हफीज) ने बताया कि सड़कें बंद होने के कारण पिछले दो हफ्तों में मेरी कमाई कम से कम 30% गिर गई है। मैं अब 10 के बजाय 13 घंटे गाड़ी चला रहा हूं। बिक्री और राजस्व में कम से कम 30% की गिरावट दर्ज की गई है।

अधिकारी हालांकि अब भी आशावान हैं। पूर्व राजनयिक जौहर सलीम ने ब्लूमबर्ग को बताया कि वाशिंगटन और तेहरान दोनों के साथ इस्लामाबाद के अच्छे संबंधों के कारण पाकिस्तान बातचीत की मेजबानी करने के लिए “एक विशिष्ट स्थिति” में है।

सोशल मीडिया पर फूटता जनता का गुस्सा

लगातार खिंचती जा रही इस अनिश्चितता के कारण जनता का धैर्य अब जवाब दे रहा है। एक यूजर ने लिखा- रावलपिंडी और इस्लामाबाद को पूरी तरह से लॉकडाउन मोड में क्यों रखा गया है? अधिकारियों को राजधानी को सांस लेने देना चाहिए। एक अन्य ने लिखा- बिना बातचीत शुरू हुए ही कई दिनों तक लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त है! क्योंकि उन्हें कोई परवाह नहीं है। यह शासकों की मानसिकता को दर्शाता है। पूर्व ‘डॉन’ संपादक सिरिल अल्मेडा ने लिखा- इस्लामाबाद शहर को खोलो।

नोबेल शांति पुरस्कार की चाह बनाम जमीनी हकीकत

एक तरफ राजधानी ठप पड़ी है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान का शीर्ष नेतृत्व तेहरान और वाशिंगटन के बीच खुद को ‘शांतिदूत’ के रूप में स्थापित करने का पूरा प्रयास कर रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मंगलवार को खैबर पख्तूनख्वा विधानसभा में पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) की विधायक फराह खान द्वारा पेश किया गया वह प्रस्ताव है, जिसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज फील्ड मार्शल असीम मुनीर को नोबेल शांति पुरस्कार देने की सिफारिश की गई है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN