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जिन्ना की पहली डील से मुनीर की मजबूरी तक, अमेरिका के हाथों कितनी बार नीलाम हुआ पाकिस्तान?

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Source :- LIVE HINDUSTAN

जानिए 1947 से 2026 तक अमेरिका और पाकिस्तान के कूटनीतिक रिश्तों का कड़वा सच। जिन्ना से लेकर जनरल मुनीर तक, कैसे पाकिस्तान एक ‘किराये का देश’ बना और अमेरिका ने इसे अपने भू-राजनीतिक फायदों के लिए खरीदा। पढ़ें पूरी ऐतिहासिक इनसाइड स्टोरी।

पाकिस्तान के बनने के बाद से ही इसके शासकों और विशेषकर इसकी सेना ने अपनी भौगोलिक स्थिति को एक ‘कमोडिटी’ यानी वस्तु के रूप में देखा है। एक ऐसी वस्तु जिसे सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को किराए पर दिया जा सकता है। इस वैश्विक नीलामी में अमेरिका हमेशा से सबसे बड़ा खरीदार रहा है। यानी 1947 में पाकिस्तान के जन्म लेने से लेकर अब तक, अमेरिका ने अक्सर इस देश को अपनी जरूरतों के मुताबिक खूब इस्तेमाल किया। बदले में पाक को क्या मिला? चंद डॉलर। जिनसे आवाम का तो नहीं पता, लेकिन सैन्य रसूखदारों का पेट खूब भरता गया।

बुनियाद और ‘किराए की रियासत’ का जन्म (1940s – 1960s)

पाकिस्तान के बनते ही उसे भारत के खिलाफ खड़े होने के लिए धन और हथियारों की सख्त जरूरत थी।

जिन्ना की पहली ‘अपील’: 1947 में अपनी स्थापना के कुछ ही महीनों के भीतर, मोहम्मद अली जिन्ना के निर्देश पर पाकिस्तान ने अमेरिका से 2 अरब डॉलर की सैन्य और आर्थिक मदद की गुहार लगाई थी। यह उस समय एक बहुत बड़ी रकम थी।

वाशिंगटन का चुनाव: 1950 में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को सोवियत संघ (USSR) से न्योता मिला था, लेकिन उन्होंने मॉस्को के बजाय वाशिंगटन की यात्रा चुनी। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान कम्युनिज्म के खिलाफ अमेरिकी खेमे में शामिल होने के लिए उपलब्ध है- बशर्ते कीमत सही हो।

सैन्य संधियां और हवाई अड्डे: 1950 के दशक में पाकिस्तान SEATO (1954) और CENTO (1955) जैसे अमेरिकी सैन्य गठबंधनों में शामिल हो गया। बदले में अमेरिका ने आर्थिक मदद की बारिश की। अयूब खान के दौर में पाकिस्तान ने पेशावर के पास बडाबेर एयरबेस अमेरिका को सौंप दिया, जहां से अमेरिका सोवियत संघ की जासूसी (U-2 स्पाई प्लेन) करता था। अमेरिका ने पाकिस्तान को अपना सबसे करीबी सहयोगी घोषित कर दिया। हालांकि 1965 के भारत-पाक युद्ध में अमेरिका ने दोनों देशों पर हथियार प्रतिबंध लगा दिया। पाकिस्तान को धोखा महसूस हुआ।

शीत युद्ध और ‘जिहाद’ की फंडिंग (1970s – 1980s)

जब भी अमेरिका को इस क्षेत्र में कोई गंदा काम करवाना होता, पाकिस्तान हमेशा अपनी सेवाएं देने के लिए तैयार रहता था।

चीन से पुल: 1970 के दशक की शुरुआत में जनरल याह्या खान ने अमेरिका (निक्सन-किसिंजर) और चीन के बीच गुप्त बातचीत के लिए ‘डाकिए’ का काम किया। इसके इनाम के रूप में 1971 के युद्ध में अमेरिका ने भारत को डराने के लिए अपना 7वां बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेजा था। लेकिन रूस के डर से उसने भारत की ओर कदम नहीं बढ़ा पाए।

अफगान जिहाद और डॉलर की बारिश

1970 के दशक में जुल्फिकार अली भुट्टो के न्यूक्लियर कार्यक्रम ने रिश्ते को तनाव दिया। फिर 1979 में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर हमला किया, तो पाकिस्तान की किस्मत खुल गई। जनरल जिया-उल-हक ने अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर द्वारा प्रस्तावित 40 करोड़ डॉलर की मदद को ‘मूंगफली’ कहकर ठुकरा दिया था। बाद में रोनाल्ड रीगन प्रशासन ने अरबों डॉलर और F-16 लड़ाकू विमानों की झड़ी लगा दी। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी (ISI) ने अमेरिकी डॉलरों से ऑपरेशन साइक्लोन के तहत मुजाहिदीन खड़े किए। पाकिस्तान ने फिर से अपनी जमीन अमेरिका को किराए पर दे दी थी।

‘वॉर ऑन टेरर’ और दोहरी नीति (2001 – 2010s)

1990 के दशक में सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिका को पाकिस्तान की जरूरत नहीं रही और उस पर प्रतिबंध लगा दिए गए। लेकिन 9/11 के हमलों ने पाकिस्तान को फिर से एक बिकाऊ वस्तु बना दिया।

मुशर्रफ का यू-टर्न: 9/11 के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री रिचर्ड आर्मिटेज ने जनरल परवेज मुशर्रफ को धमकी दी कि या तो अमेरिका का साथ दो या ‘पत्थर युग में वापस जाने के लिए तैयार रहो।’ मुशर्रफ तुरंत मान गए।

कोलिशन सपोर्ट फंड (CSF): अमेरिका ने ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ के नाम पर पाकिस्तान को CSF के तहत 33 अरब डॉलर से अधिक की सैन्य और आर्थिक मदद दी। पाकिस्तान ने अमेरिका को हवाई मार्ग और रसद के रास्ते बेचे।

धोखाधड़ी का खेल: यह वह दौर था जब पाकिस्तान अमेरिका से डॉलर ले रहा था और उसी डॉलर का इस्तेमाल अफगान तालिबान को पालने-पोसने में कर रहा था, जो अंततः अमेरिकी सैनिकों को मार रहे थे। ओसामा बिन लादेन का एबटाबाद (पाकिस्तान के सैन्य छावनी शहर) में मिलना इस दोहरी नीति का सबसे बड़ा सबूत था।

इमरान खान का ‘साइफर’ ड्रामा और मुनीर का सरेंडर (2020 – 2026)

2021 में अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने के बाद, अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में फिर से खटास आ गई। लेकिन पाकिस्तान का ‘बिजनेस मॉडल’ अमेरिका के बिना नहीं चल सकता था।

इमरान खान और “Absolutely Not”: जब इमरान खान प्रधानमंत्री थे, तो उन्होंने दावा किया कि वे पाकिस्तान को अमेरिका की गुलामी से आजाद कराएंगे। उन्होंने अमेरिकी बेस देने के सवाल पर “Absolutely Not” यानी साफ इनकार किया और रूस-चीन के करीब जाने की कोशिश की। इमरान खान का दावा है कि अमेरिका ने एक ‘साइफर’ (गुप्त राजनयिक केबल) के जरिए उन्हें सत्ता से बेदखल करवाया क्योंकि वे बिकने को तैयार नहीं थे।

जनरल आसिम मुनीर और IMF की मजबूरी

इमरान खान की विदाई के बाद सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने कमान संभाली। 2023 से लेकर 2026 के वर्तमान परिदृश्य तक, पाकिस्तान भयंकर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। मुनीर और पाकिस्तानी इस्टेब्लिशमेंट ने अमेरिका के साथ फिर से संबंध बहाल किए हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से बेलआउट पैकेज प्राप्त करने के लिए अमेरिका का आशीर्वाद अनिवार्य था। कई रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और पश्चिमी देशों को खुश करने (और IMF डील सुरक्षित करने) के लिए पाकिस्तान ने ब्रिटेन और अन्य रास्तों से यूक्रेन को गुपचुप तरीके से हथियार और गोला-बारूद भी सप्लाई किए हैं।

2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच छोटा संघर्ष हुआ। इसके बाद असीम मुनीर की भूमिका बढ़ी। उन्हें फील्ड मार्शल का दर्जा मिला। 2025-2026 में मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ व्यक्तिगत रिश्ता बनाया। ट्रंप ने उन्हें ‘मेरा फेवरेट फील्ड मार्शल’ कहा। मुनीर वाइट हाउस गए, क्रिप्टो, क्रिटिकल मिनरल्स, हाइड्रोकार्बन और निवेश समझौतों पर बात हुई।

2026 में पाकिस्तान US-ईरान तनाव में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। मुनीर तेहरान गए, शांति वार्ता में पाकिस्तान को ब्रिज बनाया जा रहा है। अमेरिका ने कुछ बलूच समूहों को आतंकवादी घोषित किया। बदले में पाकिस्तान को टैरिफ छूट और निवेश का वादा मिला। यह दौर साबित करता है कि पाकिस्तान की सेना अब भी अमेरिका के लिए उपयोगी साझेदार है- चाहे मध्यस्थता हो, काउंटर-टेररिज्म हो या चीन के प्रभाव को बैलेंस करने में।

‘रेंट-सीकिंग स्टेट’ की त्रासदी

2026 के वर्तमान भू-राजनीतिक माहौल में भी यह कहानी बदली नहीं है। पाकिस्तान का पूरा अस्तित्व एक रेंट-सीकिंग यानी किराया वसूलने वाले मॉडल पर आधारित है। जब अमेरिका को सोवियत संघ को रोकना था, तो पाकिस्तान ने ‘इस्लामिक जिहाद’ बेचा। जब अमेरिका को अल-कायदा से लड़ना था, तो पाकिस्तान ने ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ बेचा। और आज जब पाकिस्तान दिवालिया होने की कगार पर है, तो उसकी सेना वाशिंगटन के चक्कर लगा रही है ताकि कोई नया सौदा किया जा सके- चाहे वह चीन को संतुलित करने के नाम पर हो या यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में।

अमेरिका को अपने वैश्विक एजेंडे के लिए दक्षिण एशिया में हमेशा एक ऐसा मोहरा चाहिए था जिसे खरीदा जा सके और पाकिस्तानी सैन्य इस्टेब्लिशमेंट ने हमेशा खुशी-खुशी अपने देश की संप्रभुता की बोली लगाई है। इसलिए, यह कहना बिल्कुल ऐतिहासिक और तथ्यात्मक है कि पाकिस्तान हमेशा से बिकाऊ रहा है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN