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क्षणे रुष्टा, क्षणे तुष्टा; इतने रंग क्यों बदल रहे ट्रंप? आक्रमण की कोई रणनीति या फिर नई डीलिंग टैक्टिक्स

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Source :- LIVE HINDUSTAN

विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप अक्सर अपने बयानों में बदलाव करके दुश्मन देशों (जैसे ईरान) को भ्रमित रखने की रणनीति अपनाते हैं । इससे सामने वाले देश के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि अमेरिका का अगला कदम क्या होगा?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कब क्या कह दें या कौन सा कदम उठा लें, कोई नहीं कह सकता। उनके बयान अक्सर विरोधाभासी होते हैं। ईरान संग जंग में हाल के दिनों में उनके बयानों ने उनके विरोधाभासी स्टैंड को और स्थापित किया है। ट्रंप एक पल ईरान की तारीफ करते हैं तो 24 घंटे के अंदर ही उसे धमकी देते हैं और उसकी आलोचना करते हैं। इसी तरह वह कभी चीन की तारीफ करते हैं तो 24 घंटे के अंदर ही अपने स्टैंड से यू-टर्न लेकर उस पर गंभीर आरोप लगाते हैं। वह कभी होर्मुज समुद्री मार्ग को बंद करने की बात करते हैं तो कभी खोलने की धमकी देते हैं।

विरोधी भी उनके इस रुख को अब भली भांति समझ चुके हैं और उनका मजाक उड़ा रहे हैं। लेकिन ईरान के रणनीतिकार ट्रंप के इस रुख से सबक भी ले रहे हैं और कह रहे हैं कि वो ट्रंप के झांसे में नहीं आने वाले हैं। संभवत: यही वजह रही कि मंगलवार को इस्लामाबाद में होने वाली शांति वार्ता टल गई और ट्रंप को खुद ही सीजफायर बढ़ाने का ऐलान करना पड़ा।

घाना में ईरानी दूतावास का तंज

इस बीच, घाना में ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया एक्स पर पिछले 24 घंटों के अंदर ट्रंप के बदलते बयानों का जिक्र कर उन पर तंज कसा है। दूतावास ने एक्स पर लिखा है, “24 घंटे में अमेरिका के प्रेसिडेंट ने होर्मुज को बंद करने के लिए ईरान को धन्यवाद दिया। फिर ईरान को धमकी दी। चीन पर इल्ज़ाम लगाया। चीन की तारीफ़ की। ब्लॉकेड को सफल बताया। कन्फर्म किया कि ईरान ने इसके ज़रिए रीस्टॉक किया। ईरान के साथ डील का वादा किया। फिर वादा किया कि ईरान पर बम गिरेंगे। एक ग्रुप चैट जहाँ हर मेंबर का नाम ट्रंप है।”

ट्रंप क्यों बदल रहे बयान, क्या रणनीति?

कुछ रणनीतिकारों और जानकारों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बार-बार अपना स्टैंड बदलने के पीछे कई रणनीतिक और राजनीतिक कारण हो सकते हैं। वर्तमान में (अप्रैल 2026) उनके विरोधाभासी बयानों और बदलती नीतियों के पीछे रणनीतिक भ्रम से लेकर यह डीलिंग टैक्टिक्स तक हो सकती है। विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप अक्सर अपने बयानों में बदलाव करके दुश्मन देशों (जैसे ईरान) को भ्रमित रखने की रणनीति अपनाते हैं । इससे सामने वाले देश के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि अमेरिका का अगला कदम क्या होगा?

नियंत्रण खोने का खतरा

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप के लिए दुनिया का कोई भी देश स्थायी दुश्मन नहीं है। ऐसे में अगर उस देश के साथ कोई आर्थिक या रणनीतिक सौदा संभव हो तो ट्रंप वैसा करने के लिए तैयार रहते हैं। वे टैरिफ और व्यापारिक प्रतिबंधों को एक ‘लाठी’ या मोलभाव के औजार (Bargaining Tool) की तरह इस्तेमाल करते हैं, जिससे वे कभी सख्त तो कभी लचीला रुख दिखाते हैं। विशेषज्ञों कह कहना है कि ट्रंप के बयानों में विरोधाभास की एक वजह राजनीतिक दबाव भी है। ईरान के साथ युद्ध जैसे मुद्दों पर ट्रंप को व्हाइट हाउस के अंदर और बाहर दोनों तरफ से भारी राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। ईरान पर उन्होंने बार-बार सैन्य हमलों और संघर्ष विराम (Ceasefire) की डेडलाइन बदली है, जिसे अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक उनकी अस्थिर नीति या नियंत्रण खोने के खतरे के रूप में देख रहे हैं।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN