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पश्चिम बंगाल में बुधवार को दूसरे और अंतिम चरण का मतदान हुआ. केंद्रीय निर्वाचन आयोग के मुताबिक़ दूसरे चरण में 91.66 फ़ीसदी मतदान हुआ है.
वहीं पहले चरण में पश्चिम बंगाल में 93.19 फ़ीसदी मतदान हुआ था. कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में 92.47 फ़ीसदी मतदान हुआ है.
पश्चिम बंगाल के अलावा असम, केरल और पुडुचेरी में एक चरण में 9 अप्रैल को मतदान हुआ था. वहीं तमिलनाडु में भी एक चरण में 23 अप्रैल को मतदान हुआ था.
मतदान के बाद टीएमसी और बीजेपी दोनों ने अपनी-अपनी जीत का दावा किया है.
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मतदान ख़त्म होने के साथ इन सभी विधानसभाओं के अलग-अलग एग्ज़िट पोल भी सामने आ गए हैं.
हालांकि बंगाल में पिछले विधानसभा चुनाव के एग्ज़िट पोल ग़लत साबित हुए थे लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार बीजेपी और टीएमसी में कड़ी टक्कर है.
एग्ज़िट पोल और दावे

294 सीटों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा में बहुमत के लिए 148 सीटों की ज़रूरत है.
पी-मार्क़ एग्ज़िट पोल में टीएमसी को 118-138, बीजेपी को 150-175 सीटें और अन्य को 2-6 सीटें दी गई हैं. मैटराइज़ एग्ज़िट पोल में टीएमसी को 125-140, बीजेपी को 146-161 और अन्य को 6-10 सीटें दी गई हैं.
पीपल्स पल्स के एग्ज़िट पोल में टीएमसी को 178-189, बीजेपी को 95-110, कांग्रेस को 1-3 और लेफ़्ट को 0-1 सीटें दी गई हैं. चाणक्य स्ट्रेटेजीज़ एग्ज़िट पोल में टीएमसी को 130-140, बीजेपी को 150-160 और अन्य को 6-10 सीटें दी गई हैं.
मतदान के बाद मीडियाकर्मियों के सवालों का जवाब देते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया कि टीएमसी फिर सरकार बनाएगी और वह दो-तिहाई वोटों से जीत हासिल करेंगीं.
बीजेपी नेता प्रेम शुक्ला ने एग्ज़िट पोल के बाद समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा कि वास्तविक नतीजे एग्ज़िट पोल से भी बेहतर साबित होंगे और बीजेपी पश्चिम बंगाल और असम में सरकार बनाएगी. उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के लोगों ने ममता बनर्जी के कुशासन से मुक्ति का जनादेश दे दिया है.
हालांकि एग्ज़िट पोल्स सिर्फ़ अनुमान हैं और यह हमेशा सही साबित नहीं होते. 2021 के चुनावों में बंगाल के एग्ज़िट पोल पूरी तरह ग़लत साबित हुए थे और टीएमसी को दो तिहाई से ज़्यादा सीटें मिली थीं जिसका किसी को अंदाज़ा नहीं था.
लेकिन इस बार लग रहा है कि कांटे की टक्कर है. बीबीसी बांग्ला के संवाददाता शुभज्योति घोष ने ज़मीन पर इन चुनावों को कवर किया है. वह कहते हैं एग्ज़िट पोल्स को आप एक बार भूल भी जाएं तो यह साफ़ दिख रहा है कि इस बार पश्चिम बंगाल के चुनावों में मुकाबला कड़ा है.
एसआईआर का असर

पश्चिम बंगाल का चुनाव कई लिहाज से महत्वपूर्ण है. एसआईआर के बाद 91 लाख लोगों का नाम मतदाता सूची में से काट दिया गया था. इसके बाद दोनों चरणों में 90 फ़ीसदी से ज़्यादा मतदान हुआ.
शुभज्योति घोष कहते हैं कि जानकारों का मानना है कि यह रिकॉर्ड वोटिंग एसआईआर की वजह से हुई है.
वह कहते हैं, “एसआईआर की वजह से लोगों को लगा कि उन्हें अपने मताधिकार का इस्तेमाल करना ही होगा वरना पता नहीं अगली बार क्या होगा? पता नहीं अगली बार कौन सा अधिकार छीन लिया जाएगा. यह डर ज़रूर पैदा हुआ लोगों में और इसीलिए लोग इतने बड़े पैमाने पर मतदान केंद्रों में गए.”
सर्वे एजेंसी सीएनएक्स के मैनेजिंग डायरेक्टर और राजनीतिक विश्लेषक भावेश झा कहते हैं, “63 ऐसी सीट्स हैं जिनमें अल्पसंख्यक वोट 40% से ज़्यादा है. बीजेपी के लिए इन सीटों पर जीतने की गुंज़ाइश कम है, बाकी बची सीटों पर वह कोशिश कर सकती है.”
चुनावों में एसआईआर के असर को लेकर वह कहते हैं, “अल्पसंख्यक समुदाय का बंगाल में 30 फ़ीसदी वोट है. एसआईआर के बाद यह ‘डाल्यूट’ हुआ है या नहीं यह देखने वाली बात है. लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि टीएमसी 30% से शुरू करती है और बीजेपी शून्य से.”
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि जितना ज़्यादा मतदान होगा लोकतंत्र के लिए उतना अच्छा लेकिन इसके साथ ही वह ध्यान दिलाते हैं, “अगर 100 में से 80 लोग वोट दे रहे थे और उनमें से 10 के नाम कट गए तो वोटिंग पर्सेंटेज तो बढ़ ही जाएगा. लोकतंत्र में एक भी व्यक्ति को उसके मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता और यह शर्मनाक है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित ट्रिब्यूनल्स में अपील करने वाले 30 लाख से ज़्यादा लोगों के वोट कट गए.”
पहचान की राजनीति
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शुभज्योति घोष कहते हैं, “असम और पश्चिम बंगाल दोनों ही जगह संस्कृति मुद्दा बनी और एसआईआर की वजह से बंगाल में पहचान की राजनीति बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गई. असम ऐसा राज्य है जिसे एसआईआर से बाहर रखा गया था. असम का मुद्दा अलग है, वहां एनआरसी हुआ है लेकिन पहचान की राजनीति दोनों राज्यों में मुद्दा बनी, चर्चा का विषय बनी. हालांकि इसका असर कितना होगा यह 4 मई को पता चलेगा.”
रशीद किदवई कहते हैं, “बंगाल एक विशिष्ट भाषा और संस्कृति वाला राज्य है. ऐसे राज्यों में भाषा का बहुत महत्व होता है. जो राज्य की भाषा नहीं बोल पाता, उसका उतना असर नहीं होता. जैसे कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री गुजराती हैं तो उनका इसका फ़ायदा गुजरात में मिलता है लेकिन वैसा फ़ायदा बंगाल में नहीं मिल सकता.”
“ऐसे में सवाल उठता है कि फिर वोटर भाजपा की ओर क्यों जा रहा है? मान लें कि ममता बनर्जी को अगर 70-80 फ़ीसदी मुसलमान वोट देते हैं तो 40 फ़ीसदी हिंदू भी वोट देते ही होंगे. तो वह चालीस फ़ीसदी से एकदम शून्य पर आ जाएगा, ऐसा संभव नहीं है.”
‘टीएमसी का बहुमत से कम रहना संभव नहीं’

देश के मशहूर सेफ़ोलॉजिस्ट रहे योगेंद्र यादव ने एक्स पर ट्वीट कर कहा, “मैं अब सेफ़ोलॉजी नहीं करता, इसलिए अब तक चुप रहा. लेकिन आज शाम आए पश्चिम बंगाल के एग्ज़िट पोल देखने के बाद मुझे इतना तो कहना ही पड़ेगा: एक निष्पक्ष चुनाव में इस बार टीएमसी का बहुमत से कम रहना किसी भी हालत में संभव नहीं है.”
“बीजेपी के जीतने का एकमात्र तरीका धांधली ही हो सकता है, यानी किसी न किसी रूप में चुनावी अनियमितता- चाहे वह मतदाता सूची से छेड़छाड़ हो या मतगणना में धोखाधड़ी.”
लेकिन रशीद किदवई इससे सहमत नहीं.
वह कहते हैं, “अगर एक राजनीतिक दल शून्य से 70 सीटों पर पहुंच जाता है, उसका वोट प्रतिशत 20-30 फ़ीसदी बढ़ जाता है, तो यह धोखाधड़ी से संभव नहीं है. दरअसल हमारे देश में लोग खेमों में बंट जाते हैं. इसके साथ हैं या इसके ख़िलाफ़.”
“फिर देखिए केरल में भी चुनाव हो रहा है, तमिलनाडु में भी चुनाव हो रहा है अगर धोखाधड़ी ही करनी होती तो वहां भी हो जाती लेकिन वहां तो बीजेपी की दाल नहीं गल रही.”
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