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जस्टिस स्वर्ण कांता की अदालत में पेश ना होने से केजरीवाल पर क्या क़ानूनी असर पड़ेगा?

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Source :- BBC INDIA

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा और अरविंद केजरीवाल

इमेज स्रोत, Delhihighcourt/@ArvindKejriwal

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को चिट्ठी लिखकर कहा है कि आबकारी मामले में सीबीआई की अपील याचिका पर उनके सामने वो या उनके वकील पेश नहीं होंगे.

केजरीवाल ने सोशल मीडिया एक्स पर एक वीडियो भी पोस्ट किया. इसमें उन्होंने कहा, “जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा जी से न्याय मिलने की मेरी उम्मीद टूट चुकी है. अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनते हुए, गांधी जी के सिद्धांतों को मानते हुए और सत्याग्रह की भावना के साथ, मैंने फ़ैसला किया है कि मैं इस केस में उनके सामने पेश नहीं होऊंगा और कोई दलील भी नहीं रखूंगा.”

अरविंद केजरीवाल के ऐसे बयान के बाद यह भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह अदालत की अवमानना (कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट) का मुद्दा बन सकता है. अगर ऐसा हुआ तो, क्या होगा?

अगर इसे कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट नहीं भी माना गया तो इससे अरविंद केजरीवाल को क्या हासिल होगा और इस तरह के मामले का भारत की न्याय प्रक्रिया पर क्या असर पड़ सकता है?

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यह मामला इसलिए भी काफ़ी अहम है क्योंकि इसमें एक हाई कोर्ट जज और पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रमुख के बीच टकराव भी दिखता है.

केजरीवाल ने लिखा है, “मैंने यह कठिन फ़ैसला इसलिए लिया है क्योंकि मुझे साफ़ तौर पर लगा कि उनकी अदालत में चल रही कार्यवाही उस मूल सिद्धांत को पूरा नहीं करती कि न्याय सिर्फ़ होना ही नहीं चाहिए बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए.”

क्या यह अदालत की अवमानना है?

कोट कार्ड फ़ैज़ान मुस्तफ़ा

कानून के जानकार और पटना के चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, “केजरीवाल ने जो कहा है कि वो या उनके वकील इस मामले में पेश नहीं होंगे, तो इस मामले को अदालत की अवमानना (कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट) के अधीन लाना मुश्किल है.”

“केजरीवाल ने जज बदलने के लिए जो दलीलें दीं, अगर कोई पेशेवर वकील होता तो शायद उनसे कुछ बेहतर दलील देता और उनकी बात मान भी ली जाती. लेकिन शायद केजरीवाल को ख़ुद भी चर्चा में आना था. फिर उनकी अपील पर फ़ैसले में जज ने जो टिप्पणी की उससे यह मामला और बिगड़ गया.”

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, “केजरीवाल के केस की सुनवाई के लिए कोई दूसरा जज आ जाता और फिर भी राहत नहीं मिलती तो वो आगे सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते थे. लेकिन न्याय प्रक्रिया में न्याय होना ही नहीं दिखना भी चाहिए. जिस तरह के कुछ वीडियो हैं, अगर स्वर्ण कांता जी ने ख़ुद को केस से हटा लिया होता तो उनकी निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठता.”

जाने माने वकील प्रशांत भूषण कभी आम आदमी पार्टी के सदस्य और केजरीवाल के काफ़ी क़रीबी हुआ करते थे, हालाँकि बाद में दोनों के रिश्तों में इतनी तल्खी आ गई कि प्रशांत भूषण को पार्टी से बाहर होना पड़ा.

फिर भी इस मामले में प्रशांत भूषण ने अरविंद केजरीवाल का समर्थन किया है.

उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर अरविंद केजरीवाल की लिखी चिट्ठी को शेयर करते हुए लिखा, “केजरीवाल का, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के सामने अपनी रिहाई को चुनौती देने वाली सीबीआई की अपील में शामिल न होने का फ़ैसला, एक सही और उचित फ़ैसला है.”

प्रशांत भूषण ने आगे लिखा, “निस्संदेह, इस मामले के तथ्यों को देखते हुए, उन्हें पक्षपात का एक वाजिब संदेह है. मैं तो यह कहूँगा कि उनका यह संदेह पूरी तरह से जायज़ है.”

वरिष्ठ वकील अमन लेखी का कहना है कि एक जज के पास कई विकल्प होते हैं और यह तय करने का अधिकार होता है कि इसे अवमानना ​​माना जाए या नहीं.

वो कहते हैं, “भले ही यह (पत्र लिखना) अनुचित क्यों न हो, क्योंकि कानूनी शिकायतों को उठाने का यह सही तरीका नहीं है. लेकिन, अगर समझदारी से काम लिया जाए, जैसा मुझे यकीन भी है तो वह इस पत्र को नज़रअंदाज़ करने का फ़ैसला कर सकती हैं.”

‘न्यायिक प्रक्रिया की छवि को नुक़सान’

कोट कार्ड सिद्धार्थ लूथरा

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा इस मामले को न्यायिक प्रक्रिया के लिहाज़ से एक ऐसी नज़ीर के तौर पर देखते हैं, जिससे न्याय व्यवस्था पर लोगों के भरोसे और इसकी छवि को नुक़सान हो सकता है.

वो कहते हैं, “अगर स्वर्ण कांता जी ने ख़ुद को अलग कर लिया होता तो यह मामला ही ख़त्म हो जाता. इस विवाद ने भारत की न्यायिक प्रक्रिया की छवि, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और क़ानून का शासन (रूल ऑफ़ लॉ) की छवि पर सवाल खड़े करा दिए हैं. क़ानून का एक शिक्षक होने के नाते मेरे लिए सबसे दुख की बात यही है.”

क़ानून के जानकार और कई जाने-माने वकीलों का मानना है कि अरविंद केजरीवाल के पास और भी विकल्प थे, उन्हें चिट्ठी लिखने से बचना चाहिए था.

वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने इस मुद्दे पर पत्रकारों से बातचीत में कहा, “जब आप किसी कोर्ट के सामने पेश होते हैं और कोई बात उठाते हैं तो आप जीत भी सकते हैं या आपकी हार भी हो सकती है. इसका उपाय यह है कि उस आदेश को चुनौती दी जाए. चिट्ठी लिखना सही तरीका नहीं है.”

वरिष्ठ वकील वैभव गग्गर के मुताबिक़, “अगर यह एक नज़ीर बन जाए, जहाँ जज या किसी आदेश से असंतुष्ट व्यक्ति को जज की आलोचना करते हुए निजी पत्र लिखने की इजाज़त मिल जाए और वह फिर से उन्हीं पुराने आरोपों को दोहराता रहे, जिन पर न्यायिक रूप से पहले ही फ़ैसला हो चुका है, तो आप संस्थान की पवित्रता की नींव पर ही चोट कर रहे हैं.”

“केजरीवाल के पास एक मौक़ा था कि वे अपील कर सकते थे, लेकिन उन्होंने चिट्ठी लिखने का विकल्प चुना. उनके पास इसका अधिकार है, लेकिन एक वकील होने के नाते मैं नहीं समझ पा रहा कि इसके पीछे क्या तर्क है.”

आगे क्या हो सकता है?

अमन लेखी कोट कार्ड

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, “अब यह केस स्वर्ण कांता शर्मा ही सुनेंगी और ये हो सकता है कि मामले में एक्स पार्टी डिसीज़न हो जाए.”

इसका मतलब है कि अगर अरविंद केजरीवाल या उनके वकील इस मामले में अपना पक्ष रखने के लिए पेश नहीं होते हैं तो कोर्ट का फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ जा सकता है.

इस स्थिति में भी अरविंद केजरीवाल को आगे सुप्रीम कोर्ट में अपील करना होगी.

सिद्धार्थ लूथरा कहते हैं, “कोर्ट या तो जमानती वारंट के ज़रिए उनकी पेशी को अनिवार्य कर सकता है, या अगर वह पेश न होने का फैसला करते हैं, तो कोर्ट एक एमिकस या लीगल एड पैनल से किसी वकील को नियुक्त कर सकता है, जो आकर अरविंद केजरीवाल का प्रतिनिधित्व करे.”

अमन लेखी मानते हैं, “मुझे उनका (केजरीवाल) यह कदम हर लिहाज़ से, चाहे वह राजनीतिक हो या कानूनी, समझ से परे लगता है. मेरी राय में, यह न केवल अशोभनीय और अनुचित है, बल्कि इसकी संभावना भी न के बराबर है कि इस कदम से किसी भी तरह से उनके लिए कोई अनुकूल नतीजा निकलेगा.”

मामला क्या है

अरविंद केजरीवाल और मनीष

इमेज स्रोत, Getty Images

अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री रहते दिल्ली सरकार ने एक नई आबकारी नीति (आबकारी नीति 2021-22) नवंबर 2021 में लागू की थी.

लेकिन 22 जुलाई 2022 को दिल्ली के तत्कालीन उप-राज्यपाल विनय सक्सेना ने इस नई एक्साइज पॉलिसी की सीबीआई जांच कराने के आदेश दिए थे.

इसी साल फ़रवरी महीने में दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने शराब नीति से जुड़े कथित भ्रष्टाचार मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया था.

इसके साथ ही अदालत ने आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया को भी आरोपों से मुक्त कर दिया था.

लाइव लॉ के मुताबिक़, अदालत ने फ़ैसला सुनाते हुए सीबीआई की जांच में खामियों पर कड़ी टिप्पणी भी की थी.

सीबीआई ने इस फ़ैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. यह मामला जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में गया था.

अरविंद केजरीवाल ने शराब नीति मामले में सुनवाई कर रही दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से ख़ुद को केस से हटाने की अपील की थी, लेकिन इस याचिका को दिल्ली हाई कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया था.

पिछले हफ़्ते इस मामले में अहम सुनवाई हुई और केजरीवाल ने ख़ुद ही अपना पक्ष कोर्ट के सामने रखा था.

केजरीवाल ने अदालत से कहा कि इस मामले की सुनवाई कर रहीं जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ख़ुद को इस केस से अलग कर लें, क्योंकि उन्हें इस अदालत से निष्पक्ष सुनवाई को लेकर आशंका है.

अपने डेढ़ घंटे की दलील में केजरीवाल ने यह आरोप लगाया कि जस्टिस शर्मा के आदेशों में एक पैटर्न दिखता है, जिसमें ईडी और सीबीआई के हर तर्क को स्वीकार किया जाता है.

केजरीवाल ने कहा, ”जस्टिस शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद के कार्यक्रम में 4 बार शामिल भी हो चुकी हैं. जो उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है.”

केजरीवाल ने ये भी आरोप लगाए कि जस्टिस स्वर्ण कांता के बच्चे केंद्र सरकार के सरकारी वकील हैं तो उनसे निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS