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पाकिस्तानी सेना सऊदी अरब में क्या कर रही है?

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Source :- BBC INDIA

10 अप्रैल, 2026 को इस्लामाबाद के 'रेड ज़ोन' इलाके में पाकिस्तानी सैनिक पहरा दे रहे हैं.

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कुछ दिन पहले पाकिस्तान के लड़ाकू विमान और सैन्य बल सऊदी अरब पहुंचे. यह तैनाती दोनों देशों के बीच पिछले साल हुए रक्षा समझौते का हिस्सा मानी जा रही है.

इस समझौते के तहत दोनों में से किसी एक देश पर हमला दूसरे देश पर भी हमला माना जाएगा और सैन्य रूप से दूसरा देश उस देश की मदद करेगा जिस पर हमला हुआ है.

यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ, जब पाकिस्तान ईरान-अमेरिका वार्ता की मेज़बानी कर रहा है, जिसका उद्देश्य ईरान जंग ख़त्म करने का रास्ता निकालना है.

हालांकि बातचीत के पहले चरण में कोई रास्ता नहीं निकला है, लेकिन आने वाले दिनों में दूसरे दौर की बातचीत होने की ख़बरें हैं.

सऊदी रक्षा मंत्रालय ने साफ़ किया कि पाकिस्तानी सेना की तैनाती संयुक्त रक्षा सहयोग को मज़बूत करने के अलावा क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के तहत की गई है.

वहीं, रॉयटर्स से बात करते हुए पाकिस्तान के एक अधिकारी ने, नाम न बताने की शर्त पर, कहा कि सऊदी अरब पहुंचे पाकिस्तानी सैनिक “किसी पर हमला करने के लिए नहीं” हैं.

यह क़दम अपने समय और इसके रणनीतिक प्रभावों को लेकर कई सवाल खड़े करता है. साथ ही, यह भी चर्चा का विषय है कि खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सुरक्षा गारंटी के भविष्य पर इसका क्या असर पड़ेगा.

ईरान ने जिस तरह से खाड़ी क्षेत्रों में हमले किए हैं, उसके बाद इन देशों को मिली अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर सवाल खड़े हो गए हैं.

इसके अलावा, चीन के सहयोग पर टिकी पाकिस्तान की सैन्य तकनीक और अमेरिकी रक्षा प्रणालियों के बीच सामंजस्य भी एक बड़ी चुनौती है.

पाकिस्तान अपने आपको अमेरिका और ईरान दोनों का दोस्त बताता है.

ऐसे में ईरानी हमलों के बाद सऊदी अरब में अपनी सेना भेजना पाकिस्तान की उस मध्यस्थ भूमिका पर भी सवाल उठाता है.

पर्यवेक्षकों का मानना है कि लगभग एक साल पहले पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता कर सऊदी अरब ने अपने लिए एक अतिरिक्त सुरक्षा घेरा तैयार कर लिया है, ताकि उसकी अमेरिका पर निर्भरता कम हो.

अमेरिका से भरोसा हुआ कम?

पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पिछले साल रक्षा समझौता हुआ था (फ़ाइल फ़ोटो)

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खाड़ी देशों में यह असंतोष है कि ईरान के साथ अमेरिका ने युद्ध छेड़ने का जो फ़ैसला लिया, उसमें उनके हितों और संभावित नुकसान के बारे में नहीं सोचा गया.

ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने खाड़ी देशों के अहम तेल और नागरिक सुविधाओं पर ड्रोन और बैलिस्टिक हमले किए. इस वजह से इन देशों में यह नाराज़गी है कि अमेरिका के इस थोपे गए युद्ध की क़ीमत उन्हें चुकानी पड़ रही है.

सऊदी सुरक्षा और रणनीतिक विशेषज्ञ हसन अल-शहरी का कहना है कि दोनों देशों के बीच हुए रक्षा समझौते के तहत सऊदी ज़मीन पर पाकिस्तानी वायुसेना की तैनाती दिखाती है कि सऊदी अरब अपनी सुरक्षा गारंटी में विविधता लाना चाहता है.

उन्होंने इसे एक स्मार्ट क़दम बताया, यानी एक तरफ़ अमेरिका के साथ साझेदारी बनाए रखना और दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ मिलकर एक अलग समानांतर सुरक्षा कवच तैयार करना.

सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट (एसएमडीए) में यह प्रावधान है कि एक पक्ष पर हमला, दोनों पर हमला माना जाएगा.

हाल के दिनों में खाड़ी देशों में अमेरिकी सुरक्षा को लेकर भरोसा घटा है. ताज़ा घटनाक्रम को उसी नज़र से देखा जा रहा है.

बीबीसी अरबी से बातचीत में अल-शहरी ने बताया कि पाकिस्तान के साथ यह रणनीतिक रक्षा समझौता किस तरह सऊदी अरब को मज़बूती देगा.

उनका कहना है कि सऊदी अरब में पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी के कारण ईरान और उसके सहयोगी सऊदी अरब या खाड़ी देशों को निशाना बनाने से पहले दोबारा विचार करेंगे.

क्या संदेश देना चाह रहा है पाकिस्तान?

सऊदी अरब थाड और बैलिस्टिक डिफ़ेंस सिस्टम पर निर्भर करता है (सांकेतिक तस्वीर)

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यह रक्षा समझौता अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने से कई महीने पहले हुआ था.

इसलिए, पाकिस्तानी बलों का यह आगमन इस समझौते की गंभीरता को दर्शाता है, भले ही पाकिस्तानी अधिकारियों के मुताबिक़ इसका उद्देश्य किसी पर ‘हमला करना नहीं है.’

2015 में यमन युद्ध के दौरान सऊदी अरब ने पाकिस्तान से सैन्य मदद मांगी थी, लेकिन उस समय पाकिस्तानी संसद ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया था.

अल-शहरी के मुताबिक, ‘आज हालात अलग हैं क्योंकि अब दोनों देशों के बीच औपचारिक रक्षा समझौता है.’

रक्षा मामलों पर लिखने वाले अमेरिकी पत्रकार सेबेस्टियन रोबलिन ने बीबीसी अरबी से कहा, “यह याद रखना चाहिए कि यमन युद्ध में सऊदी अरब का ज़मीनी दख़ल आक्रामक प्रकृति का था, जबकि मौजूदा संघर्ष में सऊदी अरब का रुख़ अब तक रक्षात्मक ही रहा है.”

अरब-यूरेशियन स्टडीज़ सेंटर के दक्षिण एशिया अध्ययन इकाई के निदेशक डॉ. मुस्तफा शलाश कहते हैं, “सऊदी अरब में पाकिस्तानी तैनाती ज्यादा प्रतीकात्मक यानी सिंबोलिक है. यह पाकिस्तान की रक्षा प्रतिबद्धता और अपने सहयोगियों के प्रति वफ़ादारी का संदेश है.”

उनके मुताबिक, युद्ध शुरू होने के एक महीने बाद सऊदी अरब में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर जो सवाल उठे, यह तैनाती उनका जवाब भी है. इसलिए, यह क़दम “व्यापक रक्षा भागीदारी से ज्यादा प्रतीकात्मक” है.

ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान पर सवाल ये उठ रहे थे कि सऊदी अरब के साथ समझौता होने के बावजूद वह ईरानी हमलों से बचाव करने में सऊदी अरब की मदद क्यों नहीं कर रहा है.

क्या अमेरिका को कोई संदेश दे रहा है सऊदी अरब?

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SOURCE : BBC NEWS