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पंचायत एक्टर विनोद सूर्यवंशी को होटल में खाना खाने के बाद धोने पड़े थे बर्तन, बताया गांव में होता है जातिवाद

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Source :- LIVE HINDUSTAN

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पंचायत फेम विनोद सूर्यवंशी का कहना है कि उनके गांव में आज तक जातिवाद होता है। उनके गांव में 2 एरिया डिवाइड हुए हैं जिसमें एक अपर कास्ट और दूसरे में लोवर कास्ट रहती है।

कई वेब शोज और फिल्मों में साइड किरदार निभा चुके विनोद सूर्यवंशी जो पंचायत के सीजन 4 में भी नजर आए थे, उन्होंने हाल ही में बताया कि कैसे उन्होंने लाइफ में जातिवाद का काफी सामना किया है। इतना ही नहीं उन्होंने बताया कि कैसे उनके परिवार वालों को मंदिर में जाने की इजाजत नहीं थीं।

गाव में डिवाइड थे 2 एरिया

सिद्धार्थ कनन से बात करते हुए विनोद ने कहा, ‘कर्नाटक में मेरे गांव में आज भी जातिवाद को लेकर भेदभाव होते हैं। उस गांव में 2 एरिया हैं- एक ऊपर वाली कास्ट का और दूसरा नीचे वाली कास्ट का। जिस एरिया में दलित रहते हैं वो गांव से अलग है।’

जब होटल में धोए विनोद ने बर्तन

विनोद ने उस किस्से के बारे में बताया जब होटल में धोए थे होने थे बर्तन। उन्होंने कहा, ‘एक बार जब मैं अपने पिता के साथ गांव गया तब मैं 12 साल का था और हमने एक होटल में खाना खाया। हमें अपने बर्तन खुद धोने पड़े थे और खाने के भी पैसे दिए। मेरे गांव में आज भी कुछ मंदिर हैं जहां हमें जाने की इजाजत नहीं है।’

आर्थिक तंगी में नहीं मना पाते थे त्योहार

विनोद ने आगे आर्थिक तंगी को लेकर भी बात की कहा, ‘मैंने कई बार अपने पैरेंट्स को रोता देखा है। जब त्योहार आते थे तो मैं सोचता था क्यों दीवाली आ रही है। त्योहार हमको रुलाते थे क्योंकि हम उन्हें दूसरों की तरह नहीं सेलिब्रेट कर पाते थे। हमारी कंडिशन काफी खराब होती थी और सिर्फ हम इमोशनल होते थे। मेरी मां कभी रो जाती थीं जो ज्यादा हर्ट करता था। अगर कोई हमें कुछ देता तभी हम सेलिब्रेट कर पाते थे। यही हमारी रिएलिटी थी।’

विनोद के पॉपुलर प्रोजेक्ट्स

बता दें कि विनोद जॉली एलएलबी 3, सत्यमेव जयते, जॉली एलएलबी 3, थामा जैसी फिल्मों में काम कर चुके हैं।

जब होमबाउंड के डायरेक्टर बोले थे छिपाते थे सरनेम

वैसे ना सिर्फ विनोद इससे पहले फिल्ममेकर नीरज घायवान जिन्होंने होमबाउंस फिल्म बनाई है, उन्होंने द हिंदू से बात करते हुए कहा था, मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं विक्टिम हूं। हम लोगों को अपना कास्ट नहीं बताते थे। मुझे डर लगता था कि अगर कोई मुझे पहचान लें तो मैं अपने स्कूल, कॉलेज या कॉरप्रेट लाइफ के इटेलेक्चुल क्लब का हिस्सा नहीं बन पाऊंगा। ये डर मेरे मन में काफी समय तक रहा है। 35 साल बाद मैंने फिर अपना आखिरी नाम लगाना शुरू किया।

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