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स्ट्रॉन्ग रूम क्या होते हैं, जिनके कारण पश्चिम बंगाल में छिड़ी है सियासी जंग

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Source :- BBC INDIA

तमिलनाडु में पहले चरण के मतदान से पहले, निर्धारित बूथों पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन  और अन्य मतदान सामग्री भेजने की प्रक्रिया शुरू होने के दौरान स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर तैनात एक सुरक्षाकर्मी

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5 घंटे पहले

पढ़ने का समय: 7 मिनट

पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे चरण का मतदान हुआ और इसके अगले दिन ईवीएम और पोस्टल बैलेट बॉक्स को रखने वाले स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर विवाद शुरू हो गया.

दूसरे चरण में राज्य की 142 विधानसभा सीटों पर वोट डाले गए थे. मतगणना 4 मई को होगी.

यह विवाद गुरुवार दोपहर से शुरू हुआ और शाम आते-आते कई जगहों पर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता, उनके समर्थक और प्रशासन-पुलिस के बीच बहस की वजह बन गया.

तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर पुलिस और प्रशासन पर ‘धांधली’ के आरोप लगाए. बीजेपी ने जवाब में कहा कि ममता बनर्जी की पार्टी हार की आशंका से ऐसे आरोप लगा रही है.

ये सारा विवाद स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर हुआ है. आइए जानते हैं कि स्ट्रॉन्ग रूम होते क्या हैं और इनके बारे में चुनाव आयोग के दिशा-निर्देश क्या हैं?

स्ट्रॉन्ग रूम एक बेहद सुरक्षित, निर्धारित कमरा या हॉल होता है, जिसका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) ख़ास तौर पर कंट्रोल यूनिट और बैलेट यूनिट, वोटर वेरिफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) यूनिट और संबंधित चुनावी कागज़ात या सामग्री को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है.

ये रूम इसलिए ज़रूरी होते हैं क्योंकि ये मतदान केंद्रों से वापस लाए जाने के बाद और मतगणना तक (कभी-कभी उसके बाद भी) इस्तेमाल की गई और बिना इस्तेमाल की गई ईवीएम/वीवीपैट मशीनों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं.

स्ट्रॉन्ग रूम का मक़सद चुनावी सामग्री तक किसी भी अनधिकृत पहुंच या छेड़छाड़ को रोकना है.

ये कमरे आम तौर पर ज़िला मुख्यालय या अन्य सुरक्षित स्थानों पर बनाए जाते हैं, जो ज़िला निर्वाचन अधिकारी या रिटर्निंग ऑफिसर के नियंत्रण में होते हैं.

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कितनी तरह के होते हैं स्ट्रॉन्ग रूम?

गुजरात के राजकोट में मंगलवार को मतगणना केंद्र का एक दृश्य, जहाँ गुजरात स्थानीय निकाय चुनावों के लिए वोटों की गिनती के लिए 'स्ट्रॉन्ग रूम' खोला गया था

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निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देश इन कमरों को, बेहतर प्रबंधन के लिए अलग-अलग श्रेणियों में बांटते हैं.

इनमें से पहली श्रेणी है वोटिंग में इस्तेमाल हुईं ईवीएम के स्ट्रॉन्ग रूम की. इन कमरों में मतदान के बाद इस्तेमाल की गई ईवीएम और वीवीपैट को रखा जाता है.

ख़राब हो चुकी मशीनों, रिज़र्व या बिना इस्तेमाल मशीनों और चुनावी कागज़ात के लिए अलग व्यवस्था की जाती है.

कुछ मामलों में चुनावी कागज़ात (जैसे वैधानिक और गैर-वैधानिक दस्तावेज़, जैसे फॉर्म 17C) को ईवीएम से अलग रखा जा सकता है, ताकि मशीनों की सुरक्षा बनाए रखते हुए नियंत्रित पहुंच संभव हो सके.

मतदान से पहले और उसके बाद इन्हें रखने का कामकाज, ईवीएम मैनुअल के प्रोटोकॉल के अनुसार होता है.

ईवीएम वेयरहाउस या स्ट्रॉन्ग रूम में सीमित पहुंच होनी चाहिए. मैनुअल के अनुसार जहां तक संभव हो, इस रूम में दाख़िल होने के लिए एक ही दरवाज़ा होना चाहिए. बाक़ी खिड़कियों या दरवाज़ों को सील कर दिया जाता है.

इसके अलावा इन्हें ज़िला मुख्यालय या कम से कम तहसील स्तर से नीचे नहीं होना चाहिए. इन कमरों में ईवीएम से जुड़ी सामग्री के अलावा कुछ भी नहीं रखा जाना चाहिए.

स्ट्रॉन्ग रूम से जुड़े ख़ास नियम

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के बाद, गुरुवार को कोलकाता में सुरक्षाकर्मी स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर पहरा देते हुए

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निर्वाचन आयोग ने समय-समय पर स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा, सीलिंग, निगरानी और पहुंच को लेकर निर्देश जारी किए हैं. इन्हें बाद में सर्कुलर और ईवीएम मैनुअल में शामिल किया गया है.

इन्हीं निर्देशों में सबसे अहम है सुरक्षा और संरचना.

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि स्ट्रॉन्ग रूम में एक ही दरवाज़ा होना चाहिए.

इसके अलावा डबल लॉक सिस्टम का भी प्रावधान है. इसमें एक चाबी ज़िला निर्वाचन अधिकारी (या एडीएम स्तर के अधिकारी) के पास और दूसरी रिटर्निंग ऑफिसर (या सहायक रिटर्निंग ऑफ़िसर) के पास रहनी चाहिए.

आग और बाढ़ की स्थिति में स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा के इंतजाम के लिए भी निर्देश हैं.

कुछ मामलों में कंट्रोल यूनिट और बैलेट यूनिट के लिए अलग स्ट्रॉन्ग रूम या अलग हिस्से बनाए जाते हैं.

इनकी सुरक्षा और निगरानी के लिए एक विस्तृत प्रोटोकॉल मौजूद है.

24 घंटे बहु-स्तरीय सुरक्षा के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों या राज्य पुलिस की निगरानी का प्रावधान है. इसके लिए बाहरी और आंतरिक सुरक्षा घेरा बनाया जाता है.

इसके अलावा प्रवेश द्वार, स्ट्रॉन्ग रूम और आसपास के इलाक़े लगातार सीसीटीवी निगरानी में रहते हैं. स्ट्रॉन्ग रूप के पास कंट्रोल रूम होता है जहां से सारी गतिविधियों पर नज़र रखी जाती है.

स्ट्रॉन्ग रूम अहम प्रक्रियाओं के दौरान वीडियोग्राफी अनिवार्य है. हर गतिविधि के लिए लॉगबुक रखी जाती है, जिसमें खोलने, बंद करने, विजिट और घटनाओं का रिकॉर्ड होता है.

सीलिंग और सभी पक्षों की मौजूदगी

पिछले साल दिसंबर में नासिक में नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों के लिए वोटों की गिनती शुरू होने पर, एक चुनाव अधिकारी त्र्यंबकेश्वर नगर परिषद के स्ट्रॉन्ग रूम को खोलते हुए.

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मतदान के बाद ईवीएम/वीवीपैट जमा होने के बाद कमरे को उम्मीदवारों या उनके प्रतिनिधियों की मौजूदगी में बंद और सील किया जाता है.

उम्मीदवार या उनके प्रतिनिधि आधिकारिक सील के अलावा अपनी सील भी लगा सकते हैं.

उन्हें स्ट्रॉन्ग रूम के बाहर निर्धारित स्थान पर चौबीसों घंटे निगरानी की अनुमति होती है.

हर गतिविधि (जैसे स्ट्रॉन्ग रूम तक लाना, उसे किसी कारण से खोलना) की पहले से जानकारी दी जाती है और पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी होती है.

रिटर्निंग ऑफिसर रोज़ाना सुबह और शाम परिसर, लॉगबुक और सीसीटीवी की जांच करते हैं और रिपोर्ट ज़िला निर्वाचन अधिकारी (डीईओ) को भेजते हैं.

इसके अलावा पर्यवेक्षक और ईसीआई के अधिकारी भी निरीक्षण करते हैं. ईसीआई को अनुपालन प्रमाण पत्र देना होता है. इसमें एक दरवाज़ा, डबल लॉक, सुरक्षा, सीसीटीवी जैसी व्यवस्थाओं का ज़िक्र होता है.

स्ट्रॉन्ग रूम तक पहुंच और उसे खोलने के नियम क्या हैं?

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SOURCE : BBC NEWS