Source :- LIVE HINDUSTAN
Digital Gold: पूरे भारत में डिजिटल गोल्ड का मार्केट तेजी से बढ़ रहा है। डिजिटल गोल्ड पर न तो RBI का नियम है और न ही SEBI का। इसके बावजूद 2025 तक भारतीयों के पास करीब 45 टन डिजिटल गोल्ड जमा हो चुका है, जिसकी कीमत लगभग ₹55,000 करोड़ है।
भारत में सोना खरीदने का तरीका पूरी तरह बदल गया है। अब न तो ज्वेलरी शॉप पर जाना जरूरी है और न ही ईटीएफ (ETF) में निवेश करना। लोग यूपीआई ऐप से बैठे-बिठाए ₹100 का भी डिजिटल गोल्ड खरीद रहे हैं। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह है मुंबई की स्टार्टअप कंपनी सेफगोल्ड। यह कंपनी फोनपे, क्रेड, जियोफाइनेंस, अमेजन, तनिष्क, भारतपे, जुपिटर और मोबिक्विक जैसे ऐप्स के अंदर डिजिटल गोल्ड खरीदने का इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराती है। सेफगोल्ड हर दिन 37 लाख ट्रांजेक्शन और हर महीने करीब 1 टन सोना बेचता है।
कैसे काम करता है डिजिटल गोल्ड?
सेफगोल्ड की सह-संस्थापक रिया चटर्जी कहती हैं, “नौ साल पहले आप घर बैठे सोना नहीं खरीद सकते थे। हमने कोशिश की कि सोने की असली बचत (फिजिकल गोल्ड) का फायदा डिजिटल तरीके से मिले।”
सबसे खास बात यह है कि सेफगोल्ड सीधे ग्राहक को नहीं बेचता। यह B2B2C मॉडल पर काम करता है, यानी यह दूसरे ऐप्स को एपीआई (API) देता है। जब आप फोनपे या किसी और ऐप से सोना खरीदते हैं, तो पीछे सेफगोल्ड का सिस्टम काम करता है। कंपनी की 90% कमाई ऐसी ही साझेदारियों से आती है।
कितना बड़ा है कारोबार?
सेफगोल्ड ने साल 2024-25 में करीब ₹6,866 करोड़ का कारोबार किया। हालांकि, कंपनी को ₹12 करोड़ का शुद्ध घाटा हुआ, लेकिन उसका ईबीआईटीडीए पॉजिटिव हो गया है, जो अच्छा संकेत है।
पूरे भारत में डिजिटल गोल्ड का मार्केट तेजी से बढ़ रहा है। 2025 तक भारतीयों के पास करीब 45 टन डिजिटल गोल्ड जमा हो चुका है, जिसकी कीमत लगभग ₹55,000 करोड़ है। अक्टूबर 2025 में अकेले यूपीआई के जरिए 11.6 करोड़ से अधिक गोल्ड ट्रांजेक्शन हुए।
डिजिटल गोल्ड खरीदने में कितना रिस्क है
डिजिटल गोल्ड पर न तो RBI का नियम है और न ही SEBI का। यानी अगर किसी कंपनी के साथ धोखाधड़ी हो जाए, तो शेयर मार्केट या म्यूचुअल फंड की तरह निवेशकों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। 2022 में मिंट ने इस खामी को उजागर किया था और नवंबर 2025 में SEBI ने भी चेतावनी दी थी कि डिजिटल गोल्ड अनियमित है।
तो फिर सेफगोल्ड सुरक्षा कैसे देता है?
ट्रस्टी : आपका पैसा सीधे सेफगोल्ड के खाते में नहीं जाता, बल्कि एक आजाद ट्रस्टी के खाते में जाता है। ट्रस्टी हर दिन वॉल्ट रिपोर्ट चेक करने के बाद ही पैसा जारी करता है।
वॉल्ट कस्टोडियन: असली सोना ब्रिंक्स नाम की कंपनी की तिजोरियों में रखा जाता है।
पूल्ड वॉल्ट मॉडल: हर ग्राहक के नाम पर कोई अलग सोने की छड़ नहीं होती, लेकिन पूरे सिस्टम में जितना सोना ग्राहकों ने खरीदा होता है, उतना ही वॉल्ट में मौजूद होता है। हर ग्राहक के हिस्से का हक लेजर में दर्ज होता है।
रिया चटर्जी समझाती हैं, “आप चाहे ₹100 का सोना खरीदें या ₹1 लाख का, दोनों के लिए एक ही नियम है।”
क्या ट्रस्टी सिस्टम काफी है?
कानून के जानकारों का कहना है कि ट्रस्टी और कस्टोडियन तो अच्छे हैं, लेकिन यह कानूनी ढांचे का विकल्प नहीं है। लॉ फर्म सिरिल अमरचंद मंगलदास की अनु तिवारी कहती हैं, “सोना चाहे डिजिटल हो या फिजिकल, वह उपभोक्ता कानून के दायरे में आता है, न कि RBI या SEBI के नियमों में।”
अल्फा पार्टनर्स के अक्षत पांडे कहते हैं, “ट्रस्टी-आधारित मॉडल कुछ हद तक सुरक्षा देता है, लेकिन अगर कंपनी दिवालिया हो जाए या विवाद हो, तो यह कानूनी सुरक्षा नहीं दे सकता।” सबसे बड़ी असमानता यह है कि स्टॉकब्रोकर्स (जो SEBI रजिस्टर्ड हैं) डिजिटल गोल्ड नहीं बेच सकते, जबकि फोनपे, पेटीएम, गूगल पे और जार जैसे ऐप्स इसे बेच रहे हैं।
डिजिटल गोल्ड का भविष्य क्या है?
विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार को तीन रास्तों में से एक चुनना होगा…
1. SEBI के दायरे में डिजिटल गोल्ड को सिक्योरिटी मान लिया जाए।
2. बुलियन ETF की तरह इसे कमोडिटी से जुड़ा उत्पाद बनाया जाए।
3. नए सिरे से कानून बनाया जाए, जिसमें जमा करना, ऑडिट, निकासी, और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय हो।
अक्षत पांडे कहते हैं, “सबसे सही रास्ता होगा कि ढांचे को नियमित किया जाए, न कि सिर्फ सोने को।”
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