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रूस ने बांग्लादेश को बना दिया ‘परमाणु ताकत’! कर ली भारत-पाक की बराबरी, लेकिन कई झोल

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Source :- LIVE HINDUSTAN

जानिए कैसे रूस की मदद से बांग्लादेश बना परमाणु ऊर्जा संपन्न देश। रूपपुर न्यूक्लियर पावर प्लांट की असली कहानी, कर्ज का जाल, अमेरिकी प्रतिबंध और इसमें छिपे सबसे बड़े ‘झोल’ को आसान भाषा में समझें।

बांग्लादेश के ईश्वरदी उपजिला में स्थित रूपपुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र में ईंधन लोडिंग का काम आधिकारिक तौर पर शुरू हो गया है। यह इस विशाल संयंत्र को चालू करने की दिशा में एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मील का पत्थर है। बांग्लादेश का यह परमाणु ऊर्जा संयंत्र रूस की मदद से बना है। सबसे पहले यह साफ कर दें कि ‘परमाणु ऊर्जा संपन्न’ होने का मतलब परमाणु बम बनाना नहीं है, बल्कि परमाणु ऊर्जा से बिजली पैदा करना है। आइए इस पूरी घटना की ‘असली कहानी’ और इसमें छिपे ‘झोल’ को समझते हैं।

असली कहानी क्या है?

बांग्लादेश काफी समय से बिजली की कमी से जूझ रहा था। अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था और उद्योगों को चलाने के लिए उसे एक भरोसेमंद ऊर्जा स्रोत की जरूरत थी। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए बांग्लादेश ने पबना जिले के रूपपुर में अपना पहला परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने का फैसला किया। इस प्रोजेक्ट को बनाने का ठेका रूस की सरकारी परमाणु कंपनी ‘रोसाटॉम’ को दिया गया।

रूस की मदद- यूरेनियम की डिलीवरी और क्षमता

अक्टूबर 2023 में रूस ने इस प्लांट के लिए यूरेनियम (परमाणु ईंधन) की पहली खेप बांग्लादेश को सौंप दी। इसके साथ ही बांग्लादेश दुनिया का 33वां ऐसा देश बन गया जिसके पास परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाने की क्षमता है। इस प्लांट में 1200-1200 मेगावाट के दो रिएक्टर लगे हैं। 12 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक की लागत वाली यह परियोजना रूस की वित्तीय और तकनीकी सहायता से पूरी की जा रही है। पद्मा नदी के तट पर स्थित यह संयंत्र जब पूरी तरह से चालू हो जाएगा, तो इसकी कुल बिजली उत्पादन क्षमता 2,400 मेगावाट होगी।

अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ चरणबद्ध शुरुआत

इस परमाणु ऊर्जा संयंत्र को चालू करने की प्रक्रिया अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के कड़े दिशा-निर्देशों के अनुसार चरणबद्ध तरीके से की जा रही है। इसी प्रक्रिया के पहले हिस्से के तहत मंगलवार को यूनिट में ईंधन भरने (फ्यूल लोडिंग) का काम शुरू कर दिया गया।

दक्षिण एशिया का तीसरा परमाणु ऊर्जा उत्पादक देश

इस परियोजना के शुरू होने से बांग्लादेश एक बड़े एलीट क्लब में शामिल होने जा रहा है। उम्मीद है कि इस साल अगस्त तक इस संयंत्र से कम से कम 300 मेगावाट बिजली का उत्पादन शुरू हो जाएगा और इसे बांग्लादेश के राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ दिया जाएगा। यह लक्ष्य हासिल करते ही बांग्लादेश, भारत और पाकिस्तान के बाद दक्षिण एशिया का तीसरा ऐसा देश बन जाएगा जो परमाणु ऊर्जा से बिजली पैदा करता है।

ऊर्जा संकट का समाधान

पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट पैदा हुआ है, जिससे बांग्लादेश भी अछूता नहीं है। इसी संकट से निपटने और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सरकार ने इस साल के अंत तक कम से कम एक यूनिट से राष्ट्रीय ग्रिड में बिजली की आपूर्ति शुरू करने का लक्ष्य रखा है। इससे देश में बिजली की निर्बाध और स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित होगी।

योजना के अनुसार, ईंधन लोडिंग शुरू होने के लगभग तीन महीने के भीतर (अगस्त तक) पहली यूनिट से पैदा होने वाली बिजली राष्ट्रीय ग्रिड में जोड़ दी जाएगी। इसके बाद कई चरणों में संयंत्र का परीक्षण किया जाएगा और इसकी क्षमता बढ़ाई जाएगी। दिसंबर तक इस संयंत्र से इसकी पूरी क्षमता के साथ बिजली प्रसारण का लक्ष्य रखा गया है।

तो फिर ‘झोल’ क्या है? (चुनौतियां और विवाद)

ऊपर से देखने पर यह बांग्लादेश के विकास की एक शानदार कहानी लगती है, लेकिन इसके पीछे कई आर्थिक और भू-राजनीतिक पेंच (झोल) फंसे हुए हैं।

भारी-भरकम कर्ज का जाल

यह प्रोजेक्ट बहुत महंगा है। इसकी कुल लागत लगभग 12.65 बिलियन डॉलर है। इसमें से 90% पैसा (लगभग 11.38 बिलियन डॉलर) रूस ने लोन के रूप में दिया है। आलोचकों का मानना है कि बांग्लादेश की डगमगाती अर्थव्यवस्था के लिए इतना बड़ा कर्ज चुकाना भविष्य में गले की फांस बन सकता है।

पेमेंट की भयंकर समस्या (पश्चिमी देशों के प्रतिबंध)

रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं और उसे ‘स्विफ्ट’ (SWIFT – अंतर्राष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम) से बाहर कर दिया है। अब झोल ये है कि बांग्लादेश रूस को डॉलर में लोन की किस्तें और ब्याज नहीं चुका पा रहा है। बांग्लादेश ने चीनी मुद्रा ‘युआन’ में पेमेंट करने की कोशिश की, लेकिन यह प्रक्रिया भी बहुत जटिल और विवादित साबित हुई है।

रूस पर पूरी तरह निर्भरता

यह प्लांट पूरी तरह से रूस के कंट्रोल में है। प्लांट को चलाने के लिए यूरेनियम रूस से आएगा और इस्तेमाल होने के बाद जो खतरनाक परमाणु कचरा बचेगा, उसे रूस ही वापस लेकर जाएगा। इसका मतलब है कि बांग्लादेश अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए दशकों तक रूस पर निर्भर रहेगा।

राजनीतिक अस्थिरता का साया

यह पूरा प्रोजेक्ट बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ था। 2024 में हुए बड़े राजनीतिक तख्तापलट के बाद शेख हसीना को सत्ता छोड़कर भागना पड़ा। अब वहां जो नई अंतरिम सरकार है, उसके सामने इस महंगे प्रोजेक्ट को संभालने और रूस के साथ कूटनीतिक संतुलन बनाने की बहुत बड़ी चुनौती है, क्योंकि नई सरकार को पश्चिमी देशों (अमेरिका आदि) का भी समर्थन चाहिए, जो रूस के खिलाफ हैं।

हालांकि रूस ने ‘जेनरेशन 3+’ के सबसे सुरक्षित रिएक्टर लगाने का दावा किया है, लेकिन रूपपुर घनी आबादी वाला इलाका है और पद्मा नदी के किनारे है। चेरनोबिल या फुकुशिमा जैसी किसी भी छोटी सी दुर्घटना की कल्पना भी बांग्लादेश जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए विनाशकारी हो सकती है।

संक्षेप में कहें तो, रूस की मदद से परमाणु बिजली मिलना बांग्लादेश के लिए एक बड़ी उपलब्धि जरूर है, लेकिन ‘रूस का भारी कर्ज, अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण पेमेंट में हो रही दिक्कतें और देश की वर्तमान राजनीतिक उथल-पुथल’ ने इस प्रोजेक्ट को एक दोधारी तलवार बना दिया है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN