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क्या है फॉकलैंड द्वीप, जिस पर ट्रंप ने खड़ा कर दिया नया भू-राजनीतिक विवाद; ईरान संघर्ष के बीच अब मित्र देश में हड़कंप

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Source :- LIVE HINDUSTAN

What is Falkland Islands: रॉयटर्स के अनुसार, इस मेमो में प्रस्ताव दिया गया था कि ब्रिटिश नियंत्रण वाले फॉकलैंड द्वीप समूह जैसे ‘यूरोपीय शाही कब्जों’ पर अमेरिकी समर्थन को एक सौदेबाजी के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

What is Falkland Islands: ईरान-अमेरिका संघर्ष और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सरकार की लीक हुई एक आंतरिक मेल ने अब वैश्विक कूटनीति में हड़कंप मचा दिया है। साथ ही अटलांटिक क्षेत्र में एक नया भू-राजनीतिक विवाद भी खड़ा कर दिया है। दरअसल, अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन की एक आंतरिक ईमेल लीक हो गई है, जिसमें दक्षिणी अटलांटिक में स्थित छोटे से द्वीप समूह फॉकलैंड द्वीप समूह (Falkland Islands) पर कुछ ऐसी अमेरिकी रणनीति का पता चला है, जिससे न केवल अमेरिका और उसके सबसे पुराने सहयोगी ब्रिटेन को हिला कर रख दिया दिया है, बल्कि दक्षिणी अमेरिकी देश अर्जेंटीना को भी अपनी संप्रभुता का दावा करने का दुर्लभ मौका मिल गया है।

ईमेल में क्या है?

इस विवाद की वजह पेंटागन का वह अंदरूनी ईमेल है, जिसमें उन नाटो सहयोगियों पर दबाव बनाने के विकल्पों का जिक्र किया गया है, जिन्होंने हाल ही में ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका का साथ नहीं दिया था। रॉयटर्स के अनुसार, इस मेमो में प्रस्ताव दिया गया था कि ब्रिटिश नियंत्रण वाले फॉकलैंड द्वीप समूह जैसे ‘यूरोपीय शाही कब्जों’ पर अमेरिकी समर्थन को एक सौदेबाजी के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यह प्रस्ताव उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसका मकसद उस “हक जताने की प्रवृत्ति” को कम करना है जिसे यूरोपीय देशों में देखा जाता रहा है।

क्या है फॉकलैंड द्वीप समूह?

फॉकलैंड द्वीप समूह दक्षिण अटलांटिक महासागर में स्थित यूनाइटेड किंगडम का एक स्वशासी क्षेत्र है। इसे अर्जेंटीना में ‘इस्लास मालविनास’ (Islas Malvinas) के नाम से जाना जाता है। यह दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी सिरे (Patagonia) से लगभग 480 किलोमीटर (300 मील) पूर्व में स्थित है। इस द्वीप समूह में दो मुख्य द्वीप हैं। एक ईस्ट फॉकलैंड और दूसरा वेस्ट फॉकलैंड। दोनों पर लगभग 776 छोटे द्वीप शामिल हैं। इसकी राजधानी स्टैनली (Stanley) है, जो ईस्ट फॉकलैंड द्वीप पर स्थित है। यह ब्रिटेन के अधीन है, लेकिन इसका अपना आंतरिक संविधान और अपनी सरकार है। हालांकि, रक्षा और विदेशी मामलों की जिम्मेदारी ब्रिटेन ही संभालता है। फॉकलैंड की संप्रभुता को लेकर ब्रिटेन और अर्जेंटीना के बीच लंबे समय से विवाद रहा है। इसी विवाद के चलते 1982 में फ़ॉकलैंड युद्ध हुआ था, जिसमें ब्रिटेन ने जीत हासिल कर द्वीपों पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। यह द्वीप समूह अपने अनोखे वन्यजीवों, विशेषकर पेंगुइन की विशाल आबादी के लिए प्रसिद्ध है।

अमेरिकी विदेश मंत्री की सफाई

हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसे “महज एक ईमेल” बताकर मामले को शांत करने की कोशिश की है, लेकिन लंदन में इसे ‘अटलांटिक समझौते’ की कमजोरी के रूप में देखा जा रहा है। दूसरी तरफ, अर्जेंटीना तुरंत इस मौके को भुनाने की कोशिशों में जुट गया। अर्जेंटीना के राष्ट्रपति जेवियर माइली ने तुरंत कड़ा रुख अपना लिया। पहले फॉकलैंड मुद्दे पर कूटनीतिक और नरम रुख अपनाने वाले माइली ने अब घोषणा की है कि “मालविनास अर्जेंटीना का था, है और हमेशा रहेगा”।

अर्जेंटीना ने अलापा पुराना राग

वहीं, अर्जेंटीना की उपराष्ट्रपति विक्टोरिया विल्लार्रुएल ने और भी कड़ा बयान देते हुए कहा कि वहां रह रहे ब्रिटिश मूल के लोगों (केल्पर्स) को “हजारों मील दूर वापस इंग्लैंड चले जाना चाहिए,” क्योंकि यह द्वीप अर्जेंटीना का है और इसमें स्थानीय निवासियों की इच्छा का कोई स्थान नहीं है। उधर, इस विवाद पर ब्रिटेन की भी तीखी प्रतिक्रिया आई है। लंदन (10 डाउनिंग स्ट्रीट) ने इस मुद्दे पर किसी भी तरह के समझौते से साफ इनकार कर दिया है। ब्रिटेन का कहना है कि संप्रभुता का फैसला वहां रहने वाले लोगों की इच्छा पर निर्भर करता है। सूत्रों के अनुसार, 2013 के जनमत संग्रह में 99.8 प्रतिशत निवासियों ने ब्रिटिश क्षेत्र बने रहने के पक्ष में मतदान किया था। ब्रिटेन के लिए यह मुद्दा 1982 के युद्ध की यादों से जुड़ा है, इसलिए वहां की सरकार इस पर कोई भी नरमी बरतने को तैयार नहीं है।

ट्रंप की ‘ट्रांजैक्शनल’ कूटनीति विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद ट्रंप की उस विदेश नीति का हिस्सा है जिसमें वह गठबंधन और समझौतों को सिद्धांतों के बजाय ‘लेन-देन’ (transactional) के रूप में देखते हैं। इससे पहले ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने का विचार भी पेश किया था। भले ही अमेरिका ने वर्तमान में अपनी तटस्थता बरकरार रखी हो, लेकिन इस एक ‘लीक’ ने यह संकेत दे दिया है कि ट्रंप प्रशासन के तहत दशकों पुराने अंतरराष्ट्रीय समझौते भी अब पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। फिलहाल, फॉकलैंड का मुद्दा एक ऐसा ‘फ्लैशपॉइंट’ बन गया है जिसने वैश्विक कूटनीति में हलचल पैदा कर दी है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN