Home राष्ट्रीय समाचार क्या रेगिस्तान को हरा भरा बनाया जा सकता है?

क्या रेगिस्तान को हरा भरा बनाया जा सकता है?

15
0

Source :- BBC INDIA

रेगिस्तान

इमेज स्रोत, Getty Images

2 घंटे पहले

पढ़ने का समय: 6 मिनट

जब हम किसी रेगिस्तान के बारे में सोचते हैं, तो गोबी या सहारा के विशाल विस्तार हमारे ज़ेहन में आ सकते हैं.

असल में, रेगिस्तान काफ़ी विविधता से भरे होते हैं, जहां पौधों, जानवरों और इंसानी ज़िंदगी के अलग-अलग स्तर पाए जाते हैं.

मिस्र की राजधानी काहिरा दुनिया का सबसे बड़ा रेगिस्तानी शहर है, जहां 2.3 करोड़ से ज़्यादा लोग रहते हैं.

लेकिन आम तौर पर, रेगिस्तान एक बेहद सूखा इलाक़ा होता है, जहां पानी की कमी ज़्यादातर जीवन के पनपने को मुश्किल बना देती है.

दुनिया में रेगिस्तान बढ़ रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, हर साल क़रीब 10 लाख वर्ग किलोमीटर उपजाऊ ज़मीन ख़राब हो जाती है.

जैसे-जैसे धरती पर उपजाऊ ज़मीन कम होती जा रही है, क्या यह मुमकिन है कि हम अनोखे तरीक़ों से पानी पैदा करें और रेगिस्तान को ऐसा बनाएं जहां पौधे पनप सकें?

मौसम में बदलाव

रेगिस्तान में सोलर पैनल

इमेज स्रोत, VCG via Getty Images

चीन की बीजिंग नॉर्मल यूनिवर्सिटी में भौगोलिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर यान ली बताते हैं, “मरुस्थलीकरण का मतलब है कि कोई प्राकृतिक ज़मीन, जैसे घास का मैदान या झाड़ीदार इलाक़ा, धीरे-धीरे ज़्यादा सूखा होता जाता है और फिर रेगिस्तान में बदल जाता है.”

1970 के दशक में वैज्ञानिक जूल चार्नी ने पाया कि इस प्रक्रिया में इंसानी गतिविधियों की अहम भूमिका होती है.

ली बीबीसी के प्रोग्राम क्राउडसाइंस को बताते हैं, “जब आपके पास बहुत ज़्यादा मवेशी होते हैं, तो वे सारे घास खा जाते हैं, जिससे घास ख़त्म होकर ज़मीन नंगी या रेत में बदल जाती है.”

जब ऐसा होता है तो अल्बीडो यानी सतह की परावर्तन क्षमता बदल जाती है, क्योंकि नंगी रेत काफ़ी चमकदार होती है और वह सूरज की रोशनी का बड़ा हिस्सा लौटा देती है.

जब ज़मीन गर्मी को सोखने के बजाय उसे वापस परावर्तित करती है, तो उसके ऊपर की हवा उतनी गर्म नहीं हो पाती है और कम नमी भाप में बदलती है, इससे कम बादल बनते हैं, नतीजा यह होता है कि इलाक़ा और ज़्यादा सूखा हो जाता है.

ली ने सोचा कि क्या इसका उल्टा काम कर सकता है, “क्या होगा अगर हम सतह का अल्बीडो कम कर दें? क्या इससे बारिश बढ़ेगी?”

वे कहते हैं कि सोलर पैनल ऐसा करने का एक अच्छा तरीक़ा हैं. ये गहरे रंग के होते हैं और गहरे रंग की सतहें गर्मी को सोखती हैं, जिससे हवा गर्म होती है, नमी ऊपर उठती है और बादल बनते हैं.

उनकी टीम ने एक मॉडल बनाया, जिसमें यह देखा गया कि अगर सहारा का 20 फ़ीसदी हिस्सा गहरे रंग के सोलर पैनलों से ढक दिया जाए तो क्या होगा.

उन्होंने इस काम में विंड टर्बाइन (पवन चक्कियां) के संभावित इस्तेमाल का भी ज़िक्र किया.

ली बताते हैं, “अगर हमारे पास विंड टर्बाइन होंगे, तो यह सतह के खुरदुरापन को बदलेगा. ज़्यादा घर्षण के साथ, ज़्यादा ऊर्जा टर्बुलेंस के ज़रिए वायुमंडल में जा सकती है. और यह टर्बुलेंस मौसम बनाती है और बादल तैयार करती है.”

उनके मॉडल के मुताबिक़, पूरे सहारा रेगिस्तान में औसत बारिश दोगुनी हो सकती है.

लेकिन अभी यह सिर्फ़ एक सिमुलेशन है और इसके लिए बड़ी संख्या में सोलर पैनल और विंड टर्बाइन की ज़रूरत होगी, जो क़रीब 20 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में होंगे. यह लगभग मेक्सिको या इंडोनेशिया के क्षेत्रफल के बराबर है.

ली यह भी बताते हैं कि यह तरीक़ा सिर्फ़ उन जगहों पर काम करता है, जैसे सहारा, जो समुद्र के क़रीब हैं, जहां से नम हवा अंदर लाई जा सकती है.

कई दूसरे रेगिस्तान, जैसे गोबी या मध्य पूर्व के रेगिस्तान, समुद्र से बहुत दूर हैं.

फ़ॉग हार्वेस्टिंग

रेगिस्तान

इमेज स्रोत, MARTIN BERNETTI/AFP via Getty Images

चिली के एटाकामा रेगिस्तान अक्सर धरती का सबसे सूखा स्थान कहा जाता है, वहां एक तकनीक के ज़रिये हवा से पानी निकाला जाता है.

चिली की यूनिवर्सिटी ‘यूनिवर्सिदाद मेयर’ में भूगोलविद और असिस्टेंट प्रोफ़ेसर वर्जीनिया कार्टर इन फ़ॉग कलेक्शन सिस्टम को तैयार करने की विशेषज्ञ हैं.

वह कहती हैं, “फ़ॉग हार्वेस्टिंग क़रीब 50 साल पहले चिली में शुरू हुई थी. इसका मक़सद रेगिस्तान में बादलों से पानी हासिल करना है.”

धुंध से पानी पकड़ना काफ़ी आसान है. खंभों के बीच एक जाली टांगी जाती है, और जब नमी से भरे बादल इस बारीक जाली से गुज़रते हैं, तो बूंदें बनती हैं. इसके बाद पानी को पाइप और टैंक में इकट्ठा किया जाता है.

कार्टर कहती हैं कि चिली के उत्तरी हिस्से में औसतन हर दिन प्रति वर्ग मीटर दो लीटर पानी हासिल किया जा सकता है, जबकि कुछ जगहों पर यह सात लीटर तक हो सकता है.

तो क्या भविष्य में फ़ॉग हार्वेस्टिंग रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने में मदद कर सकती है?

कार्टर कहती हैं कि यह मुमकिन है. उनकी टीम इस समय एटाकामा रेगिस्तान में एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, जिसमें फ़ॉग के पानी का इस्तेमाल हाइड्रोपोनिक्स के लिए किया जा रहा है, यानी मिट्टी के बजाय पोषक घोल वाले पानी में पौधे उगाना.

लेकिन इसमें कुछ कमियां भी हैं. इस तरीक़े से मिलने वाला पानी दूसरी तकनीकों के मुकाबले काफ़ी कम होता है, और इसके लिए ऐसी जगह चाहिए जहां धुंध मौजूद हो, जो आमतौर पर समुद्र के क़रीब होती है.

समुद्री पानी को पीने लायक बनाना

डीसेलिनेशन प्लांट

इमेज स्रोत, Clea Rekhou/The Washington Post via Getty Images

जब वैश्विक समुद्री जल स्तर बढ़ रहा है, तो क्या सीधे समुद्र से पानी लेना मददगार हो सकता है?

हालांकि समुद्री पानी को मीठा बनाना काफ़ी असरदार है, लेकिन आज के तरीक़े काफ़ी ऊर्जा खपत करते हैं और अक्सर जीवाश्म ईंधन पर निर्भर होते हैं.

डर्बी यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर क्रिस्टोफ़र सेनसम छोटे डीसेलिनेशन यूनिट विकसित कर रहे हैं, जो सौर ऊर्जा पर आधारित हैं.

इसमें आईनों का इस्तेमाल करके सूरज की रोशनी को पाइपों पर केंद्रित किया जाता है, जिससे समुद्री पानी उबलता है और नमक अलग हो जाता है.

लेकिन इंसानी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए और रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने के लिए, इस तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू करना होगा.

और चाहे इसे किसी भी तरीक़े से किया जाए, इसमें बड़ी मात्रा में बचा हुआ नमक निकलता है, जो आसपास के पर्यावरण को नुक़सान पहुंचा सकता है.

क्या हमें यह करना चाहिए?

रेगिस्तान

इमेज स्रोत, STR/NurPhoto via Getty Images

सिद्धांत रूप में, हम समुद्री पानी को मीठा बनाकर, बादलों से पानी हासिल करके, या रेगिस्तान के मौसम को बदलकर उसे हरा-भरा बना सकते हैं.

लेकिन रेगिस्तान अपने आप में बुरे नहीं होते.

ली कहते हैं, “रेगिस्तान धरती पर प्राकृतिक जगह हैं. अगर रेगिस्तान स्थिर है, तो यह ठीक है. हम उसे वैसे ही रहने दे सकते हैं.”

नॉटिंघम यूनिवर्सिटी की प्लांट साइंटिस्ट ज़िन्निया गोंज़ालेज़ करांज़ा कहती हैं, “रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने या वहां पानी लाने की कोशिश करने के बजाय, हमें वहां मौजूद जीवन की रक्षा करनी चाहिए.”

वह कहती हैं कि रेगिस्तान को हरा-भरा बनाने की कोशिश लंबे समय में पर्यावरण और वहां रहने वाले लोगों के लिए नुक़सानदेह हो सकती है.

उनके अनुसार, “पौधे लगाकर शायद हम कुछ समय के लिए अच्छी फ़सलें उगा लें, लेकिन इसके लिए बहुत ज़्यादा पानी चाहिए होगा. और हमने देखा है कि अगर आप इन फ़सलों में ज़्यादा पानी इस्तेमाल करते हैं, तो रेगिस्तान के आसपास रहने वाले समुदाय ही सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं.”

वह कहती हैं, “मुझे लगता है कि सबसे अच्छा यही है कि हम रेगिस्तान को समझें, उसका सम्मान करें और उसके साथ मिलकर काम करने की कोशिश करें.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

SOURCE : BBC NEWS