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28 फ़रवरी को ईरान पर अमेरिका और इसराइल के हमलों के बाद दुनिया का सबसे बड़ा ऊर्जा संकट असल में अब शुरू ही हुआ है.
न तो अस्थायी युद्धविराम और न ही ईरान युद्ध की समाप्ति वैश्विक ऊर्जा संकट और कीमतों को युद्ध से पहले की स्थिति में तुरंत ही पहुंचा सकता है.
युद्ध से पहले की स्थिति का मतलब है कि ऐसा समय जब सस्ता तेल और गैस प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे. व्यवसाय फल-फूल रहे थे और लोगों की आमदनी चाहे जितनी भी थी, वह बढ़ ही रही थी.
अब इसकी कई वजहें हैं जो युद्ध-पूर्व स्थिति को बहाल करना मुश्किल बनाते हैं.
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1. अभी तो तेल की कमी शुरू हुई है
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फ़ारस की खाड़ी से एक टैंकर को अपने ख़रीदारों यानी आयात करने वालों तक पहुँचने में औसतन क़रीब एक से डेढ़ महीने का समय लगता है.
युद्ध ठीक डेढ़ महीने पहले शुरू हुआ था. यानी अब से दुनिया को तेल की वास्तविक कमी का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि होर्मुज़ स्ट्रेट इस दौरान प्रभावी रूप से बंद रहा है.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख फातिह बिरोल कहते हैं, “अप्रैल की स्थिति मार्च से कहीं अधिक ख़राब होगी. सबसे राहत भरे अनुमानों के मुताबिक़ भी नुक़सान दोगुना हो जाएगा. इसकी वजह से महंगाई बढ़ेगी और आर्थिक विकास धीमा हो जाएगा.”
वे कहते हैं, “स्थिति इससे भी बदतर हो सकती है. ऐसे में कई देशों में जल्द ही ऊर्जा राशनिंग शुरू हो जाएगी.”
युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ गईं, जबकि तेल टैंकर युद्ध से पहले लोड किया गया तेल लेकर आ रहे थे.
अब जब तेल की उपलब्धता कम होगी, तो भले ही ईरान होर्मुज़ को फौरन खोल दे, कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर पर वापस नहीं आएंगी.
तेल संकट का एक नया दौर अभी शुरू हो रहा है. आदर्श हालात में भी आपूर्ति बहाल होने में एक से डेढ़ महीने का समय लगेगा.
वास्तव में, अमेरिकी ऊर्जा विभाग की सांख्यिकी शाखा, अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, यह कमी कई महीनों तक और संभवतः साल 2026 के अंत तक महसूस की जाएगी.
हालाँकि तेल का मामला थोड़ा आसान है. अगर मध्य पूर्व में स्थायी शांति बनी रहती है, तो सऊदी अरब और इस क्षेत्र के अन्य देश तेजी से उत्पादन बढ़ा सकते हैं.
लेकिन गैस की स्थिति कहीं ज्यादा गंभीर है.
2. तेल संकट से कहीं अधिक गंभीर है गैस संकट
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ईरान युद्ध से पहले दुनिया पाइपलाइनों पर निर्भरता कम करने के लिए तेजी से एलएनजी की ओर रुख़ कर रही थी.
पाइपलाइनों को रूस ने यूरोप पर दबाव डालने के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था, जिससे साल 2022 का वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा हुआ था.
कोयले की तुलना में गैस सस्ती और स्वच्छ होती जा रही थी, और ऊर्जा खपत में इसकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही थी. ईरान युद्ध ने दिखाया कि यह विकल्प कितना जोखिम भरा था.
युद्ध से पहले क़तर के पास दुनिया की एलएनजी आपूर्ति का 21 प्रतिशत या कुल गैस बाज़ार का क़रीब 17 प्रतिशत हिस्सा था. यह इतनी बड़ी हिस्सेदारी है जिसके लिए व्यावहारिक रूप से कोई विकल्प मौजूद नहीं है.
फातिह बिरोल कहते हैं, ” युद्ध की वजह से पूरे गैस उद्योग की विश्वसनीयता को नुक़सान पहुंचा है. एलएनजी को एक भरोसेमंद और आसानी से मिलने वाले विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया था. लेकिन दुनिया पहले साल 2022 में रूसी गैस संकट में फंसी और अब क़तर की गैस का संकट.”
एलएनजी की आपूर्ति में तेजी से सुधार संभव नहीं है. क़तर से निर्यात के लिए कोई वैकल्पिक समुद्री मार्ग नहीं है, जबकि तेल का निर्यात कुछ हद तक ज़मीनी पाइपलाइनों से होर्मुज़ स्ट्रेट को बाईपास करके किया जा सकता है.
इसके अलावा फ़िलहाल भविष्य अनिश्चित है, जिसकी वजह से गैस की कीमतें कई महीनों तक ऊंची बनी रहेंगी.
क़तर ने नई उत्पादन क्षमता विकसित करना रोक दिया है. युद्ध के कारण उसके मौजूदा बुनियादी ढांचे के एक हिस्से पर भी असर पड़ा है.
3. उत्पादन को पहले जैसा करने में लंबा वक़्त
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होर्मुज़ स्ट्रेट को तेल टैंकरों और गैस ले जाने वाले जहाज़ों के लिए खोलना एक मुद्दा है. जबकि डेढ़ महीने की बमबारी के दौरान क्षतिग्रस्त हुए क्षेत्र के कारखानों में उत्पादन बहाल करना दूसरा मुद्दा है.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार, युद्ध के दौरान मध्य पूर्व में स्थित 40 से अधिक तेल और गैस संयंत्रों को हमले से नुक़सान हुआ है.
क़तर के रास लाफ़ान गैस फ़ील्ड में सबसे ज़्यादा नुक़सान हुआ है. ईरानी मिसाइलों ने दुनिया के सबसे बड़े गैस लिक्विफ़ाई करने वाले संयंत्र की 17 प्रतिशत क्षमता को नष्ट कर दिया.
क़तर के अधिकारियों के अनुसार, इस तरह के उपकरण ख़ास तौर पर बनाए जाते हैं और इनका कोई विकल्प नहीं होता है. इसलिए इनकी मरम्मत में महीनों नहीं, बल्कि कई साल का समय लगेगा, जो तीन से पांच साल तक हो सकता है.
अन्य देशों में भी इसी तरह की समस्याएं मौजूद हैं. ईरानी ड्रोनों ने संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और इराक़ में रिफाइनरियों, तेल क्षेत्रों और अन्य ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया है. इनकी मरम्मत में कई महीने लगेंगे और इस पर अरबों डॉलर का ख़र्च आएगा.
युद्ध से पहले, ये धनराशि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाने के लिए दी गई थी, लेकिन अब इसे मरम्मत पर ख़र्च किया जाएगा.
4. सरकारों के सामने संकट
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युद्ध से पहले, खाड़ी देशों ने बढ़ती आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने उत्पादन को बढ़ाने की योजना बनाई थी.
उपभोक्ता देशों को उम्मीद थी कि तेल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होगा और गैस की आपूर्ति भी बढ़ेगी.
लेकिन अब सऊदी अरब, यूएई, ईरान, क़तर और अन्य देशों को अपने संसाधनों को विकास पर नहीं, बल्कि उत्पादन के पुराने स्तरों को बहाल करने और भविष्य के हमलों के ख़िलाफ़ रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर ख़र्च के लिए मजबूर होना पड़ेगा.
उपभोक्ताओं को महंगी ऊर्जा के साथ-साथ परमाणु, सोलर, विंड, बैटरी और कोयले जैसे विकल्पों में किए गए निवेश और उद्योगों को दी जाने वाली सब्सिडी के लिए भी लोगों को अधिक भुगतान करना होगा.
कोविड और रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण पैदा हुए पिछले दो संकटों के विपरीत, इस बार प्रभावित देशों के पास ज़्यादा कर्ज़ लेने की क्षमता कम है.
सरकारों के सामने दोहरी समस्या है: महंगाई अधिक है, सार्वजनिक कर्ज़ और बजट घाटा भी अधिक है.
धीमी आर्थिक वृद्धि से सरकारों को टैक्स से होने वाली कमाई कम होती है और आर्थिक सहायता की संभावना सीमित हो जाती है. जबकि ज़्यादा महंगाई ब्याज दरों में कटौती को रोकती है.
इसके अलावा, रणनीतिक तेल भंडारों के दोहन से भविष्य के संसाधन पहले ही समाप्त हो चुके हैं.
5. रणनीतिक भंडार को फिर से तैयार करना अहम

तेल की कमी को दूर करने के लिए, पश्चिमी देशों ने अपने रणनीतिक भंडार से 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने का फैसला किया.
युद्ध के कारण मध्य पूर्व से रोज़ 10 से 12 करोड़ बैरल तेल बाज़ार नहीं पहुंच पाया है. रणनीतिक भंडार इसकी भरपाई के लिए रोज़ 3 से 4 करोड़ बैरल तेल जारी करते हैं.
ये उपाय 4-5 महीनों के लिए पर्याप्त हैं. लेकिन उसके बाद इस भंडार को फिर से भरना होगा.
डोनाल्ड ट्रंप ने रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका के कुछ भंडार बेचने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडन को दोषी ठहराया. उन्होंने इसकी भरपाई करने का वादा किया, लेकिन अब तक ऐसा नहीं किया.
अब भंडार खतरनाक स्तर तक कम हो जाएंगे. यानी अब कानूनी और सुरक्षा कारणों से देशों को तेल की कीमतों की परवाह किए बिना धीरे-धीरे रणनीतिक तेल भंडार को फिर से भरने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.
रणनीतिक भंडार को फिर से तैयार करना तेल की कीमतों को बढ़ाएगा और संकट को लंबा खींच देगा.
6. फिर से युद्ध शुरू होने का ख़तरा
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ऊर्जा के विश्वसनीय स्रोत के रूप में मध्य पूर्व की छवि वर्षों से धूमिल होती जा रही है. युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है और इलाक़े में तनाव बरकरार है.
इस संघर्ष ने जोखिमों को बढ़ा दिया है, बीमा और ढुलाई की लागतों में बढ़ोतरी हुई है और यह ख़र्च लंबे समय तक या शायद स्थायी रूप से ऊर्जा की कीमतों को ऊपर बनाए रखेगा.
अमेरिकी ऊर्जा विभाग ने घोषणा की है कि तेल की कीमतों में एक स्थायी जोखिम प्रीमियम शामिल होगा.
यह समस्या केवल होर्मुज़ स्ट्रेट तक सीमित नहीं है. लाल सागर पर भी ख़तरा मंडरा रहा है. यहाँ ड्रोन का इस्तेमाल करने वाले और ईरान का समर्थन करने वाले समूह अन्य महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को भी निशाना बना सकते हैं.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख का कहना है कि इस स्थिति पर दुनिया ने बहुत ही शांत प्रतिक्रिया दी है.
1970 के दशक के तेल संकट के कारण महंगाई, जीवन स्तर में गिरावट और राजनीतिक अशांति पैदा हुई थी. इस बार हालात और भी बदतर हो सकते हैं.
फातिह बिरोल कहते हैं, “अब तक एशिया सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ है, लेकिन यह संकट यूरोप और अन्य क्षेत्रों तक भी पहुंचेगा.”
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, “हम इतिहास के सबसे बड़े ऊर्जा संकट में प्रवेश कर रहे हैं.”
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