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ईरान-अमेरिका रिश्ते पिछले कई दशकों के सबसे जटिल गतिरोध में फंसे हुए हैं. अमेरिका और इसराइल की तरफ़ से ईरान पर हमले शुरू होने और नाज़ुक युद्धविराम लागू होने के दस हफ़्तों बाद भी दोनों पक्ष किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं.
प्रस्तावों और जवाबी प्रस्तावों के इस दौर में पांच बड़े मुद्दे अब भी ईरान और अमेरिका के बीच असहमति की मुख्य वजह बने हुए हैं.
इनमें यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम, ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार का भविष्य, होर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण और यातायात की पूरी बहाली, क्षेत्र में ईरान समर्थित समूहों की गतिविधियां और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम शामिल हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हालिया अमेरिकी प्रस्ताव पर ईरान की प्रतिक्रिया को ‘पूरी तरह अस्वीकार्य’ बताया था.
रिपोर्ट्स के मुताबिक़, अमेरिका की 14 सूत्रीय योजना में यूरेनियम संवर्धन रोकना, 60 फ़ीसदी संवर्धित यूरेनियम के ईरानी भंडार को ख़त्म करना या पूरी तरह सीमित करना और होर्मुज़ स्ट्रेट को बिना शर्त खोलना शामिल है.
इस योजना में 30 दिन की एक अवधि भी शामिल है, ताकि दूसरे मुद्दों पर बातचीत का रास्ता तैयार किया जा सके. इनमें क्षेत्र में ईरान समर्थित समूह और उसका मिसाइल कार्यक्रम शामिल हैं.
दूसरी तरफ़, ईरान इन प्रस्तावों को स्वीकार करना ऐसी जंग में आत्मसमर्पण के बराबर मानता है. उसके मुताबिक़, दुनिया की दो सबसे बड़ी सैन्य ताक़तों के ख़िलाफ़ वह खड़ा रहा.
इसी वजह से ईरान रियायतें हासिल करने की कोशिश कर रहा है और रिपोर्ट्स के मुताबिक़, अपने जवाब में तत्काल युद्धविराम, सभी प्रतिबंध हटाने, हर्जाना देने, होर्मुज़ स्ट्रेट पर अपनी संप्रभुता को मान्यता देने और परमाणु वार्ता को बाद में करने की मांग कर रहा है.
ईरान ने यह भी कहा है कि वह अपने कुछ संवर्धित यूरेनियम को कम स्तर पर लाने या किसी तीसरे देश को सौंपने के लिए तैयार है, लेकिन उसने पूरा भंडार सौंपने से इनकार किया है.
इन पांच बड़े विवादित मुद्दों पर जारी गतिरोध का असर सिर्फ़ ईरान और अमेरिका पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, तेल की क़ीमतों और मध्य पूर्व की स्थिरता पर भी पड़ रहा है.
1- यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम
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यूरेनियम संवर्धन ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का सबसे अहम और पुराना विवादित मुद्दा है, क्योंकि अमेरिका के नज़रिये से यह इस सवाल से जुड़ा है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की तकनीकी क्षमता से कितनी दूरी पर है.
प्राकृतिक यूरेनियम अकेले बहुत प्रभावी नहीं होता. संवर्धन प्रक्रिया यूरेनियम के ऊर्जावान हिस्से यानी आइसोटोप 235 की मात्रा बढ़ाती है, ताकि इसे ऐसे ईंधन में बदला जा सके जिसका इस्तेमाल परमाणु रिएक्टरों में हो सके.
हालांकि, जैसे-जैसे यूरेनियम का संवर्धन अनुपात बढ़ता है, उसके सैन्य इस्तेमाल का ख़तरा भी बढ़ता जाता है.
ईरान परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी के तहत ऊर्जा उत्पादन, रिसर्च और मेडिकल ज़रूरतों जैसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए यूरेनियम संवर्धन के अपने अधिकार पर ज़ोर देता है.
दूसरी तरफ़, अमेरिका और इसराइल इस कार्यक्रम को परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश का बहाना मानते हैं.
आमतौर पर तीन से पांच फ़ीसदी संवर्धन स्तर बिजली संयंत्रों के लिए इस्तेमाल होता है, जबकि 20 फ़ीसदी संवर्धित यूरेनियम रिसर्च के मक़सद से इस्तेमाल किया जाता है.
लेकिन इससे ऊपर का संवर्धन परमाणु हथियार के लिए यूरेनियम के इस्तेमाल का रास्ता खोल देता है.
पिछली गर्मियों की 12 दिन की जंग तक ईरान 60 फ़ीसदी संवर्धन स्तर तक पहुंच चुका था.
अमेरिकी व इसराइली अधिकारियों के मुताबिक़ इससे ईरान के “न्यूक्लियर ब्रेकआउट” का समय घटकर कुछ हफ़्तों तक रह गया था.
इसी दौरान अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने दावा किया था कि तेहरान ने हज़ारों उन्नत सेंट्रीफ़्यूज लगाए हैं और बड़ा भंडार जमा कर लिया था.
नतांज़, फ़ोर्दो और इस्फ़हान ठिकानों पर इसराइली और अमेरिकी हमलों के बाद संवर्धन गतिविधियां लगभग रुक गईं और कई उपकरण बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए.
जंग ख़त्म करने के लिए हालिया बातचीत में डोनाल्ड ट्रंप ने लंबे समय तक, कथित तौर पर 20 साल या स्थायी रूप से, ईरान में संवर्धन पूरी तरह रोकने की मांग की और कहा कि “ईरान को कभी परमाणु हथियार नहीं मिलना चाहिए.”
दूसरी तरफ़, ईरान शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए अस्थायी प्रतिबंध, कम संवर्धन स्तर और अंतरराष्ट्रीय निगरानी स्वीकार करने को तैयार दिखता है, लेकिन कार्यक्रम को पूरी तरह बंद करने या गतिविधियों को विदेश भेजने को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानते हुए ख़ारिज करता है.
यह दूरी दरअसल गहरे ऐतिहासिक अविश्वास पर आधारित है. पश्चिम को ईरान की पुरानी गुप्त गतिविधियों पर शक है, जबकि ईरान अमेरिका के परमाणु समझौते यानी जेसीपीओए से बाहर निकलने और डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान हुई जंगों को अविश्वास की वजह बताता है.
2- यूरेनियम भंडार का भविष्य
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दूसरा बड़ा विवादित मुद्दा ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार के भविष्य को लेकर है. 12 दिन की जंग से पहले अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने बताया था कि ईरान के पास लगभग 440 किलोग्राम 60 फ़ीसदी संवर्धित यूरेनियम था.
यह स्तर हथियार स्तर के क़रीब माना जाता है और विशेषज्ञों के मुताबिक़ अगर इसे और संवर्धित किया जाए तो इससे कई परमाणु हथियारों के लिए ज़रूरी सामग्री तैयार हो सकती है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक़, ईरान के रणनीतिक यूरेनियम भंडार का बड़ा हिस्सा इस्फ़हान परमाणु परिसर में भूमिगत ठिकानों और गहरी सुरंगों में रखा गया है. ख़ुफ़िया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि कुछ संवर्धित यूरेनियम नष्ट हुई सुरंगों के मलबे के नीचे दबा हुआ है.
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख रफ़ाएल ग्रॉसी ने कहा कि निगरानी उपकरणों तक पहुंच नहीं होने और युद्ध जैसी परिस्थितियों की वजह से एजेंसी संघर्ष शुरू होने के बाद से इन भंडारों की मात्रा या मौजूदा स्थिति की व्यावहारिक पुष्टि लगभग नहीं कर सकी है.
अमेरिका और इसराइल इन भंडारों को सबसे बड़ा ख़तरा मानते हैं, क्योंकि अगर यह मात्रा नष्ट हो जाती है तो ईरान की परमाणु क्षमता दोबारा बहाल करने में लंबा समय लगेगा और उसका ‘न्यूक्लियर ब्रेकआउट’ समय काफ़ी बढ़ जाएगा.
डोनाल्ड ट्रंप कई मौकों पर ज़ोर दे चुके हैं कि अमेरिका इन भंडारों को ‘किसी भी रूप में’ अपने नियंत्रण में लेगा.
रिपोर्ट्स के मुताबिक़ अमेरिकी प्रस्तावों में यह सामग्री पूरी तरह अमेरिका या किसी तीसरे देश को सौंपने, पूरी तरह निष्क्रिय करने या ईरानी ज़मीन से पूरी तरह हटाने की बात शामिल है.
हालांकि, वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक़, अपने हालिया जवाब में ईरान ने अपने कुछ भंडार को कम स्तर पर लाने और कुछ हिस्सा किसी तीसरे देश को भेजने की इच्छा जताई है.
शर्त यह है कि अगर बातचीत विफल हो जाए या अमेरिका दोबारा समझौते से बाहर निकल जाए, तो वह सामग्री ईरान को वापस दी जाए.
3- होर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण
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दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा समुद्री मार्ग माने जाने वाला होर्मुज़ स्ट्रेट ईरान और अमेरिका के बीच तीसरा बड़ा विवादित मुद्दा बन चुका है.
इस रणनीतिक समुद्री रास्ते से दुनिया के 20 फ़ीसदी से ज़्यादा कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस की आवाजाही होती है.
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पिछले दो महीनों के घटनाक्रम दिखाते हैं कि होर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण ईरान के लिए एक रणनीतिक हथियार बन सकता है.
अमेरिका इसके पूरी तरह और निगरानी के साथ खुले रहने को किसी भी संभावित समझौते की पूर्व शर्त मानता है, जबकि तेहरान इसे आख़िरी दबाव वाले हथियार की तरह इस्तेमाल करता दिख रहा है.
इस अहम रास्ते के लगातार बंद रहने या बाधित होने और ऊर्जा क़ीमतों में बढ़ोतरी से वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता को बड़ा ख़तरा हो सकता है.
अमेरिका होर्मुज़ स्ट्रेट को खुला रखने को ‘अंतरराष्ट्रीय शिपिंग की आज़ादी’ का उदाहरण मानता है और ईरान की तरफ़ से किसी भी धमकी या पाबंदी को अस्वीकार्य कहता है.
अमेरिकी रुख़ है कि इस मुद्दे का समाधान सैन्य और अंतरराष्ट्रीय गारंटी के साथ, परमाणु वार्ता से अलग किया जाना चाहिए.
ईरानी मीडिया के मुताबिक़, अमेरिकी प्रस्ताव के जवाब में ईरान ने “जंग ख़त्म करने और फ़ारस की खाड़ी और होर्मुज़ स्ट्रेट में समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने” पर ज़ोर दिया है.
साथ ही, ईरानी राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व ने होर्मुज़ स्ट्रेट पर नियंत्रण को अपनी रेड लाइन बताया है.
तेहरान ने दबाव और प्रतिबंध हटाने के बदले कारोबारी जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही की गारंटी देने की पेशकश की है, लेकिन वह नियंत्रण और ख़तरों का जवाब देने का अधिकार अपने पास रखना चाहता है.
अमेरिका के साथ तनाव और बढ़ते प्रतिबंधों के अलग-अलग दौर में ईरान कई बार चेतावनी दे चुका है कि गंभीर ख़तरे की स्थिति में वह होर्मुज़ स्ट्रेट से तेल आपूर्ति रोक सकता है.
हालांकि, पहले ऐसी बातें ज़्यादातर दबाव बढ़ाने के लिए कही जाती थीं और मामला पूरी तरह बंद करने तक नहीं पहुंचा. लेकिन हालिया जंग के बाद स्थिति और संवेदनशील हो गई है.
4- ‘एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस’ और क्षेत्र में ईरान की भूमिका
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क्षेत्र में ईरान समर्थित समूहों की गतिविधियां भी तेहरान और अमेरिका के बीच बड़ा विवादित मुद्दा हैं. अमेरिका का कहना है कि ईरान लेबनान के हिज़्बुल्लाह, यमन के हूती और इराक़ के कुछ शिया मिलिशिया समूहों को वित्तीय, सैन्य और प्रशिक्षण सहायता देता है.
उसके मुताबिक़, इस नेटवर्क के ज़रिये प्रभाव बढ़ाकर ईरान ने इसराइली और अमेरिकी हितों के साथ ही उनके फ़ोर्स के लिए गंभीर ख़तरा पैदा किया है.
दूसरी तरफ़, तेहरान इन समूहों को ‘एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस’ का हिस्सा बताता है.
उसका कहना है कि ये स्वतंत्र तत्व हैं, जो इसराइल और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी के ख़िलाफ़ अभियान चलाते हैं.
अक्तूबर 2023 में ग़ज़ा जंग शुरू होने के बाद अलग-अलग मोर्चों पर इन समूहों के हमले बढ़ गए. इनमें लेबनानी सीमा पर हिज़्बुल्लाह और इसराइल के बीच झड़पें, लाल सागर में हूती हमले और इराक़ व सीरिया में अमेरिकी ठिकानों पर इराक़ी सशस्त्र समूहों की कार्रवाई शामिल है.
अमेरिका लगातार मांग करता रहा है कि ईरान इन समूहों को मिलने वाली सैन्य सहायता कम करे और अमेरिकी व इसराइली हितों के ख़िलाफ़ उनकी गतिविधियां रोके.
हालिया जंग और तनाव के दौरान भी इन समूहों की गतिविधियों का मुद्दा उठा, लेकिन ऐसा लगता है कि परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज़ स्ट्रेट के उलट यह मुद्दा अभी तत्काल बातचीत का हिस्सा नहीं बना है.
5- मिसाइल कार्यक्रम
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ईरान का मिसाइल कार्यक्रम दोनों देशों के बीच सबसे अहम और संवेदनशील विवादित मुद्दों में से एक है.
पिछले दो दशकों में ईरान ने बैलिस्टिक और क्रूज़ मिसाइलों का बड़ा ज़खीरा तैयार किया है. इसमें कम दूरी की मिसाइलों से लेकर लगभग दो हज़ार किलोमीटर तक मार करने वाली मिसाइलें शामिल हैं.
ईरान ने भूमिगत ठिकानों और ‘मिसाइल सिटीज़’ का नेटवर्क भी बनाया है.
ईरान इस कार्यक्रम को अपनी रक्षा और प्रतिरोध रणनीति का अहम स्तंभ मानता है, ख़ासतौर पर ऐसी स्थिति में जब उसकी वायुसेना और उन्नत रक्षा प्रणालियां अमेरिका और इसराइल की तुलना में कहीं ज़्यादा सीमित हैं.
दूसरी तरफ़, अमेरिका और उसके सहयोगी कहते हैं कि ईरान का मिसाइल भंडार, ड्रोन तकनीक और अधिक सटीक मिसाइलों के विकास के साथ मिलकर इसराइल, क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों और अरब देशों के लिए सीधा ख़तरा पैदा करता है.
हालिया जंग के दौरान ईरान ने इसराइल, क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों और खाड़ी के अरब देशों, ख़ासतौर पर संयुक्त अरब अमीरात में सैकड़ों मिसाइल और ड्रोन दागे.
इनमें से कुछ हमले रोक दिए गए, लेकिन कुछ में जान-माल का नुक़सान हुआ.
हालांकि हालिया जंग और उससे पहले की 12 दिन की जंग में ईरान की सैन्य और मिसाइल सुविधाओं को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया, लेकिन ईरान के पास बची मिसाइलों, मोबाइल लॉन्चरों और भंडार को लेकर सटीक जानकारी अब भी मौजूद नहीं है.
यही अस्पष्टता अमेरिका और इसराइल की बड़ी चिंता बनी हुई है.
हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, परमाणु कार्यक्रम के विपरीत यह मुद्दा हालिया अमेरिकी प्रस्तावों का केंद्रीय हिस्सा नहीं रहा है.
दूसरी तरफ़, ईरान का कहना है कि मिसाइल कार्यक्रम आत्मरक्षा के उसके अधिकार का हिस्सा है और इस पर बातचीत नहीं होगी.
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