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आरएसएस नेता के ‘पाकिस्तान के साथ संवाद’ वाले बयान पर पाकिस्तान में ऐसी प्रतिक्रिया

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Source :- BBC INDIA

आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत को 'पाकिस्तान के साथ संवाद के दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिएं'

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भारत की अहम हस्तियों की ओर से आईं हाल की दो टिप्पणियों ने भारत-पाकिस्तान संबंधों के भविष्य पर चर्चा को फिर से ज़िंदा कर दिया है.

दोनों ने ये संकेत दिया है कि संवाद के रास्ते खुले रखना महत्वपूर्ण है.

आरएसएस के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत को “पाकिस्तान के साथ संवाद के दरवाज़े पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिएं.” हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आतंकवाद के प्रति कड़े रुख़ में कोई नरमी नहीं बरतनी चाहिए.

होसबाले के बयान के बाद पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल (सेवानिवृत्त) मनोज नरवणे ने भी संपर्क बनाए रखने के विचार का समर्थन किया.

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि “सीमा के दोनों ओर आम लोग रहते हैं” और उनकी रोज़मर्रा की चिंताएं समान हैं.

उन्होंने कहा कि लोगों के बीच संपर्क बने रहने चाहिए क्योंकि इससे संबंधों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है.

इसके जवाब में, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इन टिप्पणियों को ‘सकारात्मक’ बताया और कहा कि तनावपूर्ण संबंधों के बीच संवाद को एक विकल्प के रूप में स्वीकार करना स्वागत योग्य है.

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पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा, “हमें उम्मीद है कि भारत में समझदारी की आवाज़ मज़बूत होगी. पिछले कई महीनों से, बल्कि वर्षों से जो युद्ध भड़काने वाली बयानबाज़ी और आक्रामकता देखने को मिल रही है, वह ख़त्म होगी और इस तरह की और आवाज़ों के लिए रास्ता साफ़ करेगी. बेशक, अब देखना यह है कि भारत में इन बातों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है या नहीं.”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि पाकिस्तान बैकचैनल संपर्कों को लेकर किसी भी अटकल पर टिप्पणी नहीं करेगा.

उन्होंने कहा, “अनौपचारिक बातचीत या बैकचैनल के बारे में- मुझे कोई जानकारी नहीं है और मैं इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता. अगर मुझे इस पर टिप्पणी करनी होती तो फिर कोई बैकचैनल नहीं रहेगा. बैकचैनल या अनौपचारिक बातचीत, नाम अपने आप में स्पष्ट है.”

पाकिस्तान में आरएसएस को व्यापक रूप से एक कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी संगठन के रूप में देखा जाता है, जो भारत की सत्तारूढ़ राजनीतिक व्यवस्था के साथ क़रीब से जुड़ा हुआ है.

पाकिस्तान की ओर से प्रतिक्रियाएं

भारत में पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त अब्दुल बासित का कहना है कि पाकिस्तान को इस बयान से बहुत उत्साहित नहीं होना चाहिए

बीबीसी से बात करते हुए, भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने इस बयान के अधिक अर्थ निकालने को लेकर सावधान रहने की सलाह दी.

उन्होंने कहा, “पाकिस्तान को इससे बहुत उत्साहित नहीं होना चाहिए.”

उन्होंने कहा, “जहाँ तक भारत के साथ संबंधों को सामान्य करने का सवाल है, यह याद रखना ज़रूरी है कि भारत जम्मू-कश्मीर पर अब भी अडिग है. मैं इस विवाद को हमेशा के लिए सुलझाने के लिए भारत की ओर से कोई प्रतिबद्धता नहीं देखता.”

बासित ने कहा कि इस्लामाबाद को “द्विपक्षीय संवाद की ऐसी एक और प्रक्रिया से बचना चाहिए, जो भारत को कश्मीर के अपने विलय को और मज़बूत करने में मदद करती है.”

उनके अनुसार, दोनों देश बैकचैनल कूटनीति के ज़रिए बातचीत कर सकते हैं, लेकिन ‘कश्मीर और आतंकवाद’ पर चर्चा केंद्र में बनी रहनी चाहिए.

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वह यह भी तर्क देते हैं कि आरएसएस का यह बयान, “अपनी वैश्विक छवि को चमकाने के लिए पहले से सोचा-समझा लगता है” और इसका उद्देश्य ऐसे समय में पाकिस्तान की प्रतिक्रिया को परखना भी हो सकता है, जब उनके मुताबिक भारत “पाकिस्तान और अमेरिका के बढ़ते आपसी तालमेल से असहज महसूस कर रहा है.”

पाकिस्तान और अमेरिका के बीच हाल में संबंधों में आई गर्मजोशी के संकेतों के साथ-साथ अमेरिका चीन संबंधों का ज़िक्र करते हुए, बासित कहते हैं, “चीन-अमेरिका शिखर बैठक भी एक तरह से भारत की तुलना में पाकिस्तान के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद है. क्वॉड भी ख़तरे में पड़ सकता है.”

ध्यान देने योग्य है कि ‘क्वॉड’- अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया का एक समूह है- जिसे आम तौर पर चीन के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव का मुक़ाबला करने के प्रयासों के हिस्से के रूप में देखा जाता है.

भारत की इन वरिष्ठ हस्तियों के इन बयानों पर राजनेताओं, विश्लेषकों और टिप्पणीकारों की ओर से सावधानी भरी लेकिन काफ़ी हद तक सकारात्मक प्रतिक्रियाएं आई हैं.

पाकिस्तान में आरएसएस की छवि को देखते हुए, कई लोगों ने अप्रत्याशित बताया. कई राजनेताओं और पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रियाएं साझा कीं.

पूर्व वित्त मंत्री असद उमर ने इन टिप्पणियों को एक महत्वपूर्ण घटना बताते हुए लिखा, “भारत के महत्वपूर्ण लोगों की ओर से पाकिस्तान के साथ फिर से जुड़ने की बात करते देखना अच्छा है.”

होसबाले और पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल मनोज नरवणे, दोनों की टिप्पणियों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि “दक्षिण एशिया में रहने वाले लगभग दो अरब लोगों” के हित के लिए “पाकिस्तान और भारत के बीच मतभेदों का समाधान होना बेहद ज़रूरी है.”

पाकिस्तान के पूर्व सूचना मंत्री फ़वाद चौधरी ने इस बयान को “रुख़ में स्वागत योग्य बदलाव” बताया और कहा कि बातचीत की शुरुआत भी “दोनों देशों की आर्थिक संभावनाओं को बदल सकती है.”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर संबंध सुधरते हैं तो “हिन्दू और मुस्लिम- दोनों तरह के अतिवादी कमज़ोर पड़ेंगे.”

पाकिस्तानी राजनेता मुशाहिद हुसैन सैयद ने इसे “ताज़गी भरा सकारात्मक बयान” बताते हुए स्वागत किया और लोगों के बीच संपर्क की अपील की सराहना की. उन्होंने इसे “समय की ज़रूरत” बताया.

राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार रज़ा रूमी ने इन टिप्पणियों को “वास्तव में उत्साहजनक” बताया, ख़ासकर “लोगों के बीच संपर्क, संवाद, वीज़ा और शांति स्थापित करने में नागरिक समाज की भूमिका” के संदर्भ को.

उन्होंने कहा, “अब देखना यह है कि क्या भारतीय सरकार उस वैचारिक ताक़त की सलाह मानती है, जिसके सहारे उसकी सत्ता कायम है.”

वरिष्ठ पत्रकार कामरान यूसुफ़ ने कहा कि इन टिप्पणियों से यह संकेत मिलता है कि “सीमा के उस पार कुछ समझ और सोच विकसित हो रही है कि भारत का मौजूदा रुख़ टिकाऊ नहीं है.”

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आरएसएस की प्रभावशाली भूमिका के बावजूद भारत के भीतर प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत सीमित रही है.

हालांकि, कुछ पर्यवेक्षक इस बयान से बहुत अधिक अर्थ निकालने को लेकर अब भी सतर्क बने हुए हैं. पत्रकार शहज़ाद इक़बाल ने कहा कि “भारतीय विदेश नीति में तत्काल बदलाव के कोई संकेत नहीं हैं” और निकट भविष्य में दोनों देशों के संबंधों में बदलाव की संभावना कम है.

पूर्व शिक्षा मंत्री शफ़कत महमूद ने भी सावधानी बरतने की सलाह दी और कहा कि भारत से आने वाली ऐसी आवाज़ों का स्वागत करते समय पाकिस्तान का विदेश कार्यालय “स्वाभाविक रूप से सतर्क” रहा है, क्योंकि “अतीत में ऐसी कई पहलें किसी नतीजे पर नहीं पहुंचीं.”

हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि “अगर भारत में गंभीरता का इरादा दिखाई देता है”, तो उसे पाकिस्तान में सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने की संभावना है.

तनावपूर्ण द्विपक्षीय संबंध

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दत्तात्रेय होसबाले की इन टिप्पणियों को कुछ लोगों ने पाकिस्तान के साथ संपर्क की संभावना के संकेत के रूप में देखा लेकिन कई पाकिस्तानी विश्लेषकों और पूर्व राजनयिकों के लिए ये आश्चर्यजनक थीं.

यह प्रतिक्रिया पाकिस्तान में आरएसएस के प्रति लंबे समय से बनी उस धारणा को दर्शाती है, जिसमें उसे एक ऐसे वैचारिक प्रेरक के रूप में देखा जाता है जो आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाता है और जिसे अक्सर भारत पाकिस्तान संबंधों, ख़ासकर जम्मू-कश्मीर जैसे विवादित मुद्दों पर, कठोर रुख़ से जोड़ा जाता है.

इन टिप्पणियों का समय भी इनके महत्व को और बढ़ाता है. पाकिस्तान और भारत के बीच द्विपक्षीय संबंधों को हाल के वर्षों में अपने सबसे निचले स्तरों में से एक माना जाता है.

औपचारिक संवाद ठप पड़ा हुआ है, कूटनीतिक संपर्क बेहद सीमित हैं और दोनों ओर सार्वजनिक बयानबाज़ी लगातार अधिक टकरावपूर्ण होती जा रही है.

हाल ही में, दोनों देशों ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की वर्षगांठ पर अपनी-अपनी जीत के दावों के साथ अलग-अलग कहानियां पेश कीं, जिससे दोनों पक्षों के बीच गहरे पैठे अविश्वास की झलक मिलती है.

यह ध्यान देने योग्य है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध कभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुए, बल्कि 2019 के बाद से लगातार बिगड़ते गए हैं.

फ़रवरी 2019 में भारत द्वारा पाकिस्तान में किए गए हवाई हमलों के बाद और उसी साल अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और जम्मू कश्मीर का पुनर्गठन कर उसे केंद्र शासित क्षेत्र बनाने के बाद, दोनों देशों के संबंध लगातार तनाव में बने रहे.

अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुए हमले के बाद संबंध और ख़राब हो गए, जिसके बाद मई 2025 में दोनों देशों के बीच चार दिनों का सैन्य टकराव हुआ.

तब से औपचारिक कूटनीति बेहद सीमित रही है. सीमाएं बंद हैं, क्रिकेट संबंध निलंबित हैं, व्यापार रुका हुआ है और सिंधु जल संधि पर भी दबाव बना हुआ है.

निष्कर्ष क्या हैं?

पूर्व भारतीय सेना प्रमुख जनरल (सेवानिवृत्त) मनोज नरवणे ने भी पाकिस्तान से संपर्क बनाए रखने के विचार का समर्थन किया है

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कुछ पर्यवेक्षकों ने होसबाले के बयान को आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता की ओर से संवाद की ज़रूरत को स्वीकार करने के एक दुर्लभ संकेत के रूप में देखा है तो वहीं अन्य ने इसे ठोस नीति बदलाव के रूप में समझने को लेकर चेतावनी दी है.

पाकिस्तान में हो रही प्रतिक्रियाओं पर उस लंबे ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ का भी असर है, जिसमें आरएसएस को देखा जाता है.

इसी धारणा से यह भी तय होता है कि उसके सार्वजनिक बयानों को कैसे पढ़ा जाता है, जिसमें पाकिस्तान के साथ संवाद पर हाल की टिप्पणियां भी शामिल हैं. इन पर प्रतिक्रियाएं सावधानीपूर्ण रुचि से लेकर तत्काल किसी नीति बदलाव को लेकर संदेह तक फैली हुई हैं.

पूर्व विदेश सचिव और राजनयिक जलील अब्बास जिलानी भारत के साथ तनाव के बीच पाकिस्तान का पक्ष प्रस्तुत करने वाले कूटनीतिक प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे. उन्होंने कहा कि इन टिप्पणियों को पाकिस्तान में सकारात्मक रूप से देखा जा रहा है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, “हमने पाकिस्तान के साथ संवाद को लेकर आरएसएस के महासचिव के बयान को देखा है. उनके बयान के साथ-साथ पूर्व भारतीय सेना प्रमुख के बयान की भी पाकिस्तान में सकारात्मक व्याख्या की जा रही है.”

”पाकिस्तान लगातार यह कहता रहा है कि दो परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसियों के लिए युद्ध कोई विकल्प नहीं है और इसके क्षेत्र के लिए विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं. पाकिस्तान और भारत को अपने विवादों का समाधान शांतिपूर्ण संवाद के ज़रिए करना चाहिए. हमें उम्मीद है कि दत्तात्रेय होसबाले की टिप्पणियों के बाद भारत सरकार जम्मू-कश्मीर सहित मुद्दों के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में आगे बढ़ेगी.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS