Source :- LIVE HINDUSTAN
बांग्लादेश चुनाव में बीएनपी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। जमात और उसके गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा है। इस गठबंधन के झंडे़ तले ही शेख हसीना को हटाने में अहम भूमिका निभाना वाले नाहिद इस्लाम की पार्टी भी लड़ रही थी, वह भी केवल 5 सीट जीत पाई है।
बांग्लादेश में शेख हसीना के जाने के बाद पहली बार चुनाव संपन्न हो चुके हैं। खालिदा जिया के निधन से उभरी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी लगभग दो दशक के बाद एक बार फिर से सत्ता का स्वाद चखने वाली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक बीएनपी और उसके सहयोगियों ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए 212 सीटों पर जीत हासिल की है। अभी तक आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं हुए हैं, लेकिन बीएनपी ने जीत का ऐलान कर दिया है और दूसरी तरफ जमात ने भी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है। इस नतीजों के बीच सबका ध्यान शेख हसीना को सत्ता से हटाने वाले छात्र नेताओं की तरफ भी है, जिनकी पार्टी का हाल इस चुनाव में बुरा रहा।
अगस्त 2024 में शेख हसीना की मजबूत सरकार को घुटनों पर लाने वाले छात्र नेता बांग्लादेश की जनता का भरोसा जीतने में नाकामयाब रहे। जमात के साथ गठबंधन में मिलकर चुनाव लड़ने वाली नेशनल सिटीजन पार्टी का प्रदर्शन काफी निराशाजनक रहा। शेख हसीना को सत्ता से हटाने के बाद इन छात्र नेताओं ने जोश और लोकप्रियता के साथ चुनावी मैदान में मोर्चा संभाला था, लेकिन इनकी यह लोकप्रियता वोट में नहीं बदली। स्थानीय मीडिया के अनुसार एनसीपी जिन 30 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, वह उनमें से केवल 5 को जीतने में कामयाब रही, जो बाकी पार्टियों की तुलना में काफी खराब स्तर है।
विशेषज्ञों के मुताबिक हसीना विरोधी आंदोलन का नेतृत्व करने वाले नाहिद इस्लाम समेत इन छात्र नेताओं के खराब प्रदर्शन के पीछे कई कारण रहे। यह एक संगठन के तौर पर एकजुट नहीं रह पाए और कई पार्टियों के साथ बिखर गए। इनकी संगठनात्मक मजबूती बीएनपी के सामने कुछ भी नहीं थी। जैसे- जैसे इनका चुनावी अभियान आगे बढ़ा, बांग्लादेशी युवाओं ने देश में स्थिरता और शासन की उम्मीद में बीएनपी का दामन थाम लिया। इस बदलाव ने एनसीपी के युवा आधार को भी काफी झटका दिया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक आवामी लीग के वोटर्स ने भी बीएनपी की तरफ अपने झुकाव का प्रदर्शन किया। यह वोटर भी आवामी लीग के जाने के लिए इन्हीं को जिम्मेदार मानते थे, ऐसे में नए चेहरों पर लोगों का भरोसा कम था। रही सही कसर एनसीपी ने जमात के साथ आकर पूरी कर दी। हादी की मौत के बाद एनसीपी ने जमात के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया।
जमात की छवि एक पाकिस्तान सपोर्टर के तौर पर बनी हुई है। दूसरी तरफ जमात का इतिहास भी सही नहीं है। जमात के साथ जाने से एनपीसी के एक धड़े ने खुद को इससे अलग कर लिया, जिसकी वजह से यह और भी ज्यादा कमजोर हो गई।
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