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30 अप्रैल 2026, 12:20 IST
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सलीम ख़ान, सलीम वास्तिक बनकर दुनिया के सामने होते हुए भी ‘लापता’ थे.
वे कई साल से टीवी पर बहसों में दिख रहे थे, पॉडकास्ट में बोल रहे थे और सोशल मीडिया पर वीडियो बना रहे थे लेकिन पुलिस रिकॉर्ड में ‘भगोड़े’ थे.
दिल्ली पुलिस ने जब 24 अप्रैल को ग़ाज़ियाबाद के लोनी इलाक़े से उन्हें गिरफ़्तार किया तो मार्शल आर्ट में ब्राउन बेल्ट रहे 54 वर्षीय सलीम ख़ान बेहद कमज़ोर नज़र आ रहे थे.
उनकी कमर से पेशाब इकट्ठा करने की थैली बंधी हुई थी.
पिछले कुछ सालों में सलीम ख़ान ने इस्लाम छोड़कर एक्स-मुस्लिम की पहचान बना ली थी.
हालांकि ना उनका नाम बदला था और ना चेहरा लेकिन फिर भी ‘भगोड़े’ होने के बावजूद वे 26 साल तक पुलिस की गिरफ़्त से दूर रहे. इस दौरान वे इस्लाम को लेकर विवादित और आपत्तिजनक टिप्पणियां करके चर्चा में आए और हिंदुत्ववादी संगठनों के नज़दीक़ हो गए.
सलीम ख़ान पर फ़रवरी 2026 में हमला हुआ था और वो अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद कुछ दिन पहले ही ग़ाज़ियाबाद के लोनी के अशोक विहार में बने अपने नए मकान में रहने आए थे.
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की एंटी रॉबरी एंड स्नेचिंग सेल की टीम ने उन्हें यहीं से गिरफ़्तार किया.
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सलीम ख़ान 1995 में 13 साल के एक स्कूली छात्र के अपहरण और हत्या के मामले में अदालत से उम्र क़ैद की सज़ा मिलने के बाद नवंबर 2000 में ज़मानत पर जेल से निकले थे और तभी से ‘फ़रार’ चल रहे थे.
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक़, सलीम ख़ान दिल्ली के दरियागंज स्थित रामजस स्कूल में मार्शल आर्ट ट्रेनर थे और इसी स्कूल के छात्र की अपहरण के बाद हत्या की थी.
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक़, उन पर दिल्ली के गोकुलपुरी थाने में जनवरी 1995 में अपहरण और हत्या का मुक़दमा दर्ज हुआ था और अदालत ने उन्हें 1997 में उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई थी.
दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें नवंबर 2000 में अंतरिम ज़मानत दी थी. जेल से छूटने के बाद वो ‘लापता’ हो गए थे.
दिल्ली हाई कोर्ट ने साल 2011 में ‘भगोड़े’ सलीम ख़ान को हत्या और अपहरण के मामले में दी गई उम्रक़ैद की सज़ा को बरक़रार रखा था.
अब गिरफ़्तारी के बाद उन्हें फिर से तिहाड़ जेल भेज दिया गया है.
दिल्ली पुलिस ने सलीम को कैसे पकड़ा?

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दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की एक शाखा है एंटी रॉबरी एंड स्नेचिंग सेल.
लूटपाट, झपटमारी और अन्य संगठित अपराधों की रोकथाम के लिए बनाई गई ये टीम पैरोल या ज़मानत के बाद फ़रार अपराधियों को भी ट्रैक करती है.
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच के डीसीपी संजीव यादव के मुताबिक़, “दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की टीम वांछित अपराधियों, पैरोल पर फ़रार अपराधियों और अन्य ऐसे अपराधियों पर काम करती रहती है जो पकड़े नहीं गए हैं. इसी दौरान सलीम ख़ान के बारे में पता चला था कि ये दोषी अपराधी पैरोल पर फ़रार है.”
संजीव यादव के मुताबिक़, “जब सलीम के बारे में और जानकारी जुटाई गई तो पता चला कि ये अपनी जानकारी छुपाकर लोनी में रह रहा है. पुलिस टीम ने इस जानकारी को पुख़्ता किया और इसकी गिरफ़्तारी की.”
क्राइम ब्रांच की टीम से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक़ इस टीम ने सलीम ख़ान के मामले पर मध्य मार्च में काम करना शुरू किया था.
इस टीम को लीड कर रहे इंस्पेक्टर रॉबिन त्यागी के मुताबिक़, “इस मामले की फ़ाइल एक रूटीन फ़ाइल की तरह हमारे पास आई थी. हमारी टीम के दो सदस्यों ने मार्च में वांंछित अपराधी सलीम ख़ान के उत्तर प्रदेश के शामली ज़िले के नानुपुरा गांव का दौरा किया. सलीम ख़ान के परिजनों ने बताया कि वो मर चुके हैं.”
रॉबिन और उनकी टीम इससे पहले भी लंबे समय से फ़रार कई अपराधियों को पकड़ चुकी है. हाल ही में उन्होंने पत्नी की हत्या में वांछित 26 साल से फ़रार एक और अपराधी को पकड़वाया है.

क्राइम ब्रांच की ये टीम जब सलीम ख़ान के मामले की पड़ताल कर रही थी तो उन्हें उनका कोई मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं मिल रहा था. पुलिस की टीम मध्य मार्च में सलीम ख़ान के पैतृक स्थान उत्तर प्रदेश के शामली के नानुपुरा गई.
पुलिस नानूपुरा में उनके बारे में तफ़्तीश कर ही रही थी जब ‘स्थानीय सूत्र’ ने पुलिस को बताया कि ग़ाज़ियाबाद के लोनी में रहने वाले सलीम वास्तिक ही वांछित अपराधी सलीम ख़ान हैं.
जांच से जुड़े एक इंस्पेक्टर के मुताबिक़, “इस ह्यूमन इंटेलिजेंस के बाद हमारी टीम दिल्ली लौटी और हमने सलीम ख़ान और सलीम वास्तिक के बीच कड़ियां जोड़नी शुरू कीं.”
जांच टीम से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक़ पुलिस को कुछ दिनों की जांच में ही ये पक्के संकेत मिलने लगे थे कि सलीम वास्तिक ही सलीम ख़ान हैं लेकिन पुलिस उन्हें गिरफ़्तार करने पहुंचने से पहले हर जानकारी पुख़्ता करना चाहती थी और हर सबूत इकट्ठा करना चाहती थी.
1995 में जब गोकुलपुरी थाने में दर्ज मुक़दमे के तहत सलीम ख़ान को गिरफ़्तार किया गया था तब उनके फिंगरप्रिंट लिए गए थे.
जांच अधिकारियों के मुताबिक़ वांछित अपराधी सलीम ख़ान के फ़िंगर प्रिंट को जब सलीम वास्तिक के फ़िंगर प्रिंट से मिलाया गया तो ये मैच कर गए.
इसके बाद पुलिस ने लोनी के पते पर बना सलीम वास्तिक का आधार कार्ड हासिल किया.
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जांच अधिकारी के मुताबिक़, “सलीम वास्तिक के आधार कार्ड पर पिता का नाम नूर हसन था लेकिन पता लोनी का था. वहीं वांछित अपराधी सलीम ख़ान के पिता का नाम भी नूर हसन है. पिता का नाम एक अहम जानकारी थी जो मैच कर गई थी.”
इसके बाद पुलिस ने अदालत की फ़ाइलों की पड़ताल की तो पता चला कि सलीम ख़ान की पत्नी का नाम अफ़साना है और सलीम वास्तिक की पत्नी का नाम भी अफ़साना है.
पुलिस को अफ़साना की तरफ़ से तत्कालीन जज को 1998 में लिखा गया एक पत्र भी मिला जिसमें उन्होंने अपने पति को ‘कस्टडी पैरोल’ पर रिहा करने की गुज़ारिश की थी.
जांच के दौरान शामली ज़िले के एक जूडो- कराटे संस्थान से जारी हुआ एक पहचान पत्र अहम साबित हुआ.
इस पहचान पत्र पर युवा सलीम ख़ान की तस्वीर है जिसमें वो कराटे की मुद्रा में हैं.
ये तस्वीर सलीम वास्तिक की मौजूदा तस्वीरों से मैच कर रही थी.
पुलिस अधिकारी के मुताबिक़, “ह्यूमन इंटेलिजेंस, टेक्निकल इंवेस्टिगेशन और एक महीने की जांच के दौरान इकट्ठा किए गए सबूतों के आधार पर हम इस नतीजे पर पहुंच गए थे कि सलीम वास्तिक ही सलीम ख़ान हैं.”
जांच के दौरान पुलिस को ये भी पता चला था कि सलीम वास्तिक ने अपनी पुश्तैनी संपत्ति को बेचने का प्रयास भी किया था.
सलीम को गिरफ़्तार करने वाले पुलिस दल ने पिछले दो-तीन साल के दौरान दिए गए उनके दर्जनों साक्षात्कार देखे.
एक पुलिस अधिकारी कहते हैं, “सलीम ख़ान एक धर्म के बारे में बातें कर रहे थे, बार-बार बता रहे थे कि इस्लाम धर्म छोड़ने से पहले वो एक मौलवी थे. लेकिन उनके सभी साक्षात्कारों में साल 1995 से 2000 का हिस्सा ग़ायब था. उन्होंने अपने जीवन के बारे में हर तरह की बातें की लेकिन इस हिस्से पर कभी कोई टिप्पणी नहीं की. इससे भी हमें पता चला कि सलीम वास्तिक ही वांछित अपराधी सलीम ख़ान हो सकते हैं.”
जब पुलिस पकड़ने पहुंची तब सलीम वास्तिक ने क्या किया?
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सलीम वास्तिक को गिरफ़्तार करने वाली पुलिस टीम के अधिकारियों के मुताबिक़, जब पुलिस लोनी में उनके घर पहुंची तो सलीम वास्तिक ने शुरू में सलीम ख़ान होने से इनकार कर दिया.
वे बिलकुल सहज थे और उन्होंने भागने का कोई प्रयास नहीं किया. दिल्ली पुलिस स्थानीय लोनी पुलिस को साथ लेकर सबूतों की पूरी फ़ाइल लेकर पहुंची थी.
जांच अधिकारी के मुताबिक़, जब उन्हें उनका पुराना पहचान पत्र दिखाया गया तब भी उन्होंने सलीम वास्तिक होने से इनकार कर दिया.
पुलिस टीम के मुताबिक़ जब उनके सामने एक के बाद एक सबूत रखे गए तो उनका चेहरा उतर गया और उन्होंने मान लिया कि वो ही सलीम ख़ान हैं.
गिरफ़्तारी में शामिल रहे एक पुलिसकर्मी के मुताबिक़, जब सलीम को बताया गया कि उन्हें गिरफ़्तार किया जा रहा है तो उन्होंने कहा, “जो कर्म किए हैं वो भुगतने तो पड़ेंगे ही.”
सलीम ख़ान से कैसे बनें सलीम वास्तिक
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सलीम पिछले क़रीब एक दशक से ग़ाज़ियबाद के लोनी इलाक़े में रह रहे थे. ये उस इलाक़े से बहुत दूर नहीं है जहां उन्होंने अपहरण और हत्या की वारदात को अंजाम दिया था.
पुलिस के मुताबिक़, पूछताछ के दौरान सलीम ख़ान ने बताया कि ज़मानत पर फ़रार होने के बाद वो कुछ सालों तक अपने गांव नहीं लौटे, उन्होंने एक मदरसे से इस्लामी शिक्षा हासिल की और उसके बाद क़रीब दस साल पहले लोनी की नसबंदी कॉलोनी में महिलाओं के कपड़ों की एक दुकान खोली.
एक इंटरव्यू में सलीम ख़ान ने बताया था, “मैंने क़ुरान का अध्ययन किया है, इस्लामी शिक्षा हासिल की है और मैं हरियाणा के अंबाला में एक मजार पर 5-6 साल तक रहा हूं.”
हालांकि, सलीम ख़ान ने आधिकारिक रूप से अपनी पहचान नहीं बदली थी.
उन्होंने जो नए दस्तावेज़ बनवाए उनमें उनकी पत्नी और पिता का नाम असली ही था. अपने नाम के साथ उन्होंने ख़ान हटाकर वास्तिक जोड़ लिया.
अपने नाम के साथ वास्तिक लिखने के बारे में एक टीवी शो में सलीम ख़ान ने कहा था, “मुझे जीवन की वास्तविकता की पहचान हुई और मैं वास्तविकता पर चलने लगा और अपने नाम के साथ वास्तिक लगा लिया.”
पुलिस के मुताबिक़, पिछले 26 सालों में जब कभी भी पुलिस टीम उनके पैतृक आवास पर पहुंची उनके परिजनों ने यही बताया कि उनकी मौत हो चुकी है.
हालांकि उनकी मृत्यु का कोई प्रमाण कभी पेश ही नहीं किया गया.
सलीम ख़ान पिछले कुछ साल से ग़ाज़ियाबाद के लोनी इलाक़े के अमन गार्डन में रह रहे थे.
यूं तो सलीम ख़ान चर्चा में पिछले एक साल के दौरान आए जब उन्होंने अपना ख़ुद का यूट्यूब चैनल बनाकर इस्लाम को लेकर लगातार वीडियो पोस्ट करने शुरू किए.
लेकिन मीडिया में वे पिछले कई साल से नज़र आ रहे थे और एक्स-मुस्लिम के रूप में टीवी बहसों में शामिल हो रहे थे.
यूट्यूब पर ऐसे कई वीडियो उपलब्ध हैं जिनमें वो एक टीवी चैनल के ‘क्या कहता है इस्लाम’ शो में एक्स-मुस्लिम के रूप में शामिल होते रहे हैं.
ऐसा ही एक वीडियो अगस्त 2022 का है जिसमें सलीम वास्तिक इस्लाम के विरोध में तर्क देते हुए नज़र आ रहे हैं.
वे लगातार पॉडकास्ट में शामिल हो रहे थे, उत्तेजक और आपत्तिजनक बयान दे रहे थे.
इस दौरान यति नरसिंहानंद और पिंकी चौधरी जैसे हिंदूवादी कार्यकर्ताओं से भी उनका मेलजोल बढ़ा.
27 फ़रवरी 2026 को उनके लोनी स्थित आवास पर दो युवकों ने उन पर हमला किया. दिल्ली पुलिस के प्रेसनोट के मुताबिक़ ये हमला सोशल मीडिया पर उनकी गतिविधियों के कारण हुआ था.
यूपी पुलिस ने कुछ दिन बाद ही इन दोनों हमलावर युवकों को मुठभेड़ की अलग-अलग घटनाओं में मार दिया.
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इस हमले के बाद सलीम वास्तिक राष्ट्रीय स्तर पर सुर्ख़ियों में आ गए थे. कई हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता उनसे मिलने पहुंचे, राजनेताओं ने भी उनसे मुलाक़ात की. हमले की घटना के बाद यूपी पुलिस ने उन्हें निजी सुरक्षा कर्मी भी दे दिए थे.
वहीं, शामली में रहने वाले सलीम के परिजन झिझकते हुए बात करते हैं. स्थानीय पत्रकार पारस जैन से बात करते हुए उनके भाई मुज़फ़्फ़र हसन ने कहा, “हमारा उससे कोई वास्ता नहीं था, वो बहुत पहले गांव छोड़ गया था. हम उसके बारे में कोई जानकारी नहीं रखना चाहते, ग़लत काम का ग़लत नतीजा ही होता है.”
हालांकि, वे इस सवाल का जवाब नहीं देते कि सलीम ख़ान जब सलीम वास्तिक होकर सामने आए, चर्चित हो रहे थे तब उन्होंने पुलिस को उनके बारे में जानकारी क्यों नहीं दी.
मुजफ़्फ़र हसन ये स्वीकार करते हैं कि सलीम ख़ान पिछले कुछ सालों से ग़ाज़ियाबाद के लोनी में रह रहे थे.
यहां सलीम ख़ान को जानने वाले कई लोग ये कहते हैं कि उन्हें लगता था कि सलीम जेल से फ़रार नहीं है बल्कि सज़ा पूरी करके बाहर आ गए हैं.
सलीम के घर पर सन्नाटा

पुलिस के मुताबिक़ सलीम ख़ान की एक बेटी और एक बेटा है. वो अपनी पत्नी और बच्चों के साथ ही रह रहे थे.
लोनी के अशोक विहार मोहल्ले में एक पतली गली जहां ढलान में बदलकर ख़त्म होती है वहीं सलीम ख़ान का नया बना ऊंचा मकान नज़र आता है. मकान के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं.
इस गली में अधिकतर मज़दूर रहते हैं और ये यहां का सबसे ऊंचा मकान है. सलीम महीना भर पहले, अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद यहां रहने आए थे.
उनका पड़ोसियों से कोई ख़ास मेलजोल नहीं था लेकिन उनकी पत्नी की कभी-कभी आसपास की महिलाओं से दुआ-सलाम हो जाया करती थी.
सलीम ख़ान की गिरफ़्तारी से कुछ दिन पहले ही उनकी पत्नी ने बच्चों के साथ ये घर छोड़ दिया था.
पास रहने वाली एक महिला बताती हैं, “ये मकान पिछले एक साल से बन रहा था. पहले सलीम यहां कभी-कभी निर्माण कार्य देखने आते थे. उनकी पत्नी पिछले महीने ही उनके साथ यहां रहने आईं थीं.”
एक और महिला ने बताया, “कभी-कभी वो घर से निकलती थीं तो दुआ सलाम करती थीं. पति के इस्लाम के ख़िलाफ़ बोलने से वो बहुत ख़ुश नहीं थीं. वो ख़ुद नमाज़ पढ़ती थीं और इस्लाम पर चलती थीं.”
सलीम ख़ान का युवा बेटा भी उनके साथ ही रह रहा था. यहीं रहने वाले एक युवक के मुताबिक़, ”वो जुमे की नमाज़ पढ़ने पास की मस्जिद में जाता था, कई बार टोपी पहनकर बाहर निकलता था.”
इस मोहल्ले में अधिकतर ग़रीब मुसलमान रहते हैं. कुछ साल पहले तक यहां ज़मीन के रेट बहुत कम थे. ज़्यादातर लोग यूपी के आसपास के ज़िलों के हैं और मज़दूरी या छोटे मोटे काम करते हैं.
राज मिस्त्री रहीसुद्दीन ने कुछ दिन सलीम वास्तिक के मकान के निर्माण के दौरान काम किया था. वो बताते हैं, “हमले से पहले वो सेहतमंद थे. कभी-कभी आते थे. उनके साथ कई बार कार्यकर्ता भी होते थे.”
रहीसुद्दीन कहते हैं, “तीन चार महीने पहले एक दिन जब वे आए थे तब उनके साथ कुछ माइक वाले यूट्यूबर भी थे. वो इस्लाम और कुरान को लेकर बहुत कुछ बोल रहे थे. तब मुझे पता चला कि ये यूट्यूबर हैं और इस्लाम के ख़िलाफ़ बोलते रहते हैं.”
हमले के बाद जब सलीम वास्तिक यहां रहने पहुंचे तो उनसे मिलने कई हिंदुत्ववादी कार्यकर्ता और स्थानीय नेता पहुंचे.
रईसुद्दीन कहते हैं, “जब बड़ी-बड़ी गाड़ियां यहां आई, कई धर्मगुरू यहां आए और उनके घर के बाहर पुलिसवाले तैनात हुए तो हमें लगा कि कोई बड़ा आदमी रहने आ गया.”
कुछ स्थानीय हिंदुत्ववादी युवा भी उनसे जुड़ गए थे. ऐसे ही एक युवा ने अपना नाम न ज़ाहिर करते हुए बीबीसी से कहा, “जब से मुझे पता चला है कि उन्होंने एक बच्चे को मारा था तब से मेरे मन में उनके लिए बहुत ग़ुस्सा है. अब वो या उनका परिवार दोबारा यहां रहने आया तो आसपास के लोग ही नहीं रहने देंगे.”
देवा नाम के एक और युवा ने कहा, “वो बड़ी-बड़ी बातें करते थे. कई कार्यकर्ता उनसे आकर मिलते थे, लेकिन जब से उनके पुराने कांड के बारे में पता चला है, कोई उनके बारे में बात नहीं करना चाहता.”
पीड़ित परिवार का हाल

31 साल पहले अपहरण और हत्या की घटना ने दिल्ली के ख़जूरी इलाक़े के शेरपुर चौक के पास रहने वाले पीड़ित परिवार की ज़िंदगी को पूरी तरह बदल दिया है.
सीताराम की हार्डवेयर की दुकान उनके पुराने घर में शिफ्ट हो गई है.
सलीम का नाम लेते ही वो कहते हैं, “पिछले 31 सालों में इन आंखों से पानी नहीं ख़ून बहा है. मेरा 13 साल का बेटा मार दिया. आज वो ज़िंदा होता तो मुझे इस बुढ़ापे में दुकान पर खड़ा नहीं होना पड़ता. मैं सलीम की शक्ल को कभी भूल सकता हूं क्या?”
सलीम की दोबारा गिरफ़्तारी को लेकर उनकी प्रतिक्रिया मिश्रित है. वो दावा करते हैं कि उन्हें पता ही नहीं था कि सलीम ज़मानत के बाद फ़रार हो गए थे.
सलीम की दोबारा गिरफ़्तारी पर उन्हें कैसे लगा? इस सवाल पर उनके चेहरे की प्रतिक्रिया से ज़ाहिर होता है कि उनकी ख़ुशी डर में बदल गई है.
कुछ पल के लिए उनकी आंखों में आई चमक आंसुओं में बदल जाती है. वो कहते हैं, “मैं रोया बैठा हूं, मेरा 31 साल पुराना घाव हरा हो गया है. मैंने किसी तरह अपना वक़्त काट लिया है, अब मैं कहां रोउंगा और कहां जाउंगा.”
डर ज़ाहिर करते हुए वो कहते हैं, “वो बड़ा आदमी बन गया है. 26 साल वो जेल से बाहर रहा, पुलिस उसे पकड़ नहीं सकी. सरकार उसे सुरक्षा दे रही है, बड़े-बड़े हिंदुत्ववादी उसका समर्थन कर रहे हैं. हमें पता भी नहीं था कि वो जेल से भाग गया है, लेकिन अब हमें डर लग रहा है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
SOURCE : BBC NEWS



