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रणजीत सिंह की पेशावर जीत, जिसके बाद अफ़ग़ानों के हमले बंद हो गए

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Source :- BBC INDIA

महाराजा रणजीत सिंह

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    • Author, वक़ार मुस्तफ़ा
    • पदनाम, पत्रकार, शोधकर्ता
  • 16 मार्च 2026, 11:46 IST

  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

मार्च 1823 में, वसंत के मौसम की बारिश देर से हुई और सिंधु नदी में पानी का स्तर कम हो गया था.

इसलिए महाराजा रणजीत सिंह ने हुंड गांव के पास उसी ऐतिहासिक घाट से नदी पार करने का फ़ैसला किया, जहां से उनसे पहले कई विजेता गुजर चुके थे.

ओलाफ़ कारो ने अपनी पुस्तक ‘द पठान्स’ में बताया है कि 18वीं शताब्दी के मध्य से शासन करने वाले दुर्रानी अफ़ग़ानों ने 1818 में मुल्तान और अगले साल कश्मीर के साथ ही सिंधु नदी के पूरब में अपना सारा नियंत्रण खो दिया था और लाहौर से शासन करने वाले सिख शासक रणजीत सिंह ने नदी के अफ़ग़ानिस्तान वाले हिस्से पर मजबूत पकड़ बना ली थी.

अगले दो साल में, रणजीत सिंह ने अपनी स्थिति को और मजबूत किया. उन्होंने डेरा ग़ाज़ी ख़ान और डेरा इस्माइल ख़ान को भी अपने राज्य में शामिल कर लिया और हसन अब्दाल के उत्तर में स्थित हजारा जनजातियों को अपने अधीन कर लिया, जो कश्मीर जाने वाले रास्तों में से एक पर कब्ज़ा जमाए हुए थे.

दुर्रानी सत्ता के लिए इस चुनौती का जवाब देना ज़रूरी था.

ओलाफ़ कारो के अनुसार, 1822 में अफ़ग़ान गवर्नर अज़ीम खान बराकज़ई भगोड़े सिख सरदार जय सिंह अटारीवाला के साथ खैराबाद पर हमला करने और रणजीत सिंह को सिंधु नदी के पार धकेलने के लिए पेशावर आए थे, लेकिन आंतरिक समस्याओं के कारण अभियान शुरू होने से पहले ही उन्हें वापस लौटना पड़ा.

जब महाराजा रणजीत सिंह ने चढ़ाई की

कारो ने लिखा है, “रणजीत सिंह ने अज़ीम खान यार मोहम्मद ख़ान से टैक्स की मांग की. यार मोहम्मद ने उन्हें बहुमूल्य घोड़े भेंट करके उनकी नाराज़गी को फ़िलहाल के लिए टाल दिया. बाद में, रणजीत सिंह को ख़बर मिली कि अज़ीम ख़ान पेशावर लौट रहे हैं, जबकि यार मोहम्मद ने महाराजा के ग़ुस्से से बचने के लिए स्वात में यूसुफ़जई लोगों के पास शरण लिए हुए हैं.”

इस पर रणजीत सिंह ने मार्च 1823 में अजीम ख़ान के ख़िलाफ़ फिर से चढ़ाई कर दी.

कारो लिखते हैं कि कबायली समूह सिंधु नदी के यूसुफ़जई तट पर इकट्ठा हुए और सिख घुड़सवारों को चुनौती देते हुए नारे लगाए.

ये सुनकर सिख सैनिक आक्रोशित हो गए और उन्होंने अपने घोड़ों को नदी में उतार दिया. वे आधा तैरते और आधा चलते हुए नदी पार कर गए, हालांकि कई सैनिक और जानवर तेज़ धारा में बह गए.

‘इसके बाद रणजीत सिंह अपनी मुख्य सेना के साथ संगठित रूप से आगे बढ़े. उन्होंने नावें इकट्ठा कीं और तोपों को हाथियों के ज़रिए नदी पार कराया. इसी दौरान यूसुफ़जई और खट्टक सेनाएं भी लगभग बीस हज़ार की संख्या में इकट्ठी हो गईं. उनका नेतृत्व सैयद अकबर शाह कर रहे थे, जो बनिर में पीर बाबा के वंशज थे.’

ऐतिहासिक जंग

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कारो लिखते हैं कि अज़ीम खान बराकज़ई काबुल से अपने सैनिकों के साथ पेशावर से मुख्य सड़क से आगे बढ़े थे. लेकिन नदी पार करने के बजाय, उन्होंने मुख्य सड़क पर लगभग पांच किलोमीटर पूर्व में उस स्थान पर डेरा डाला जो अब नौशेरा छावनी है.

‘इस लड़ाई का नाम वर्तमान नौशेरा छावनी के नाम पर नहीं रखा गया था, क्योंकि उस समय वहां कोई छावनी नहीं थी, बल्कि लांदई नदी के उत्तरी तट पर स्थित नौखर नामक प्राचीन गांव या कस्बे के नाम पर रखा गया था. चूंकि इस लड़ाई की सबसे भीषण झड़प पीर साब की पहाड़ी के आसपास हुई थी, इसलिए इसे कभी-कभी उस नाम से भी याद किया जाता है.’

अलेक्जेंडर गार्डनर ने अपनी किताब ‘सोल्जर एंड ट्रैवलर: मेमॉयर्स ऑफ़ अलेक्जेंडर गार्डनर, कर्नल ऑफ़ आर्टिलरी इन द सर्विस ऑफ़ महाराजा रणजीत सिंह’ में लिखा है कि भारी हमलों के बावजूद, रणजीत सिंह की सेना सिंधु नदी को पार करने में कामयाब रही.

इसके बाद कबायली की सेना पीर साब पहाड़ी पर पीछे हट गई, जहाँ उसने अपनी ताक़त जुटाई. उसे उम्मीद थी कि अज़ीम ख़ान की दुर्रानी सेना और तोपखाना मदद के लिए पहुंचेंगे. लेकिन अज्ञात कारणों से, अज़ीम ख़ान ने तुरंत काबुल नदी पार करके कबीले के लोगों से मिलने का प्रयास नहीं किया.

वो आगे लिखते हैं कि ‘रणजीत सिंह ने अपनी तोपें और पैदल सेना को कबायली सेना के ख़िलाफ़ केंद्रित किया और एक छोटी टुकड़ी को नदी के दाहिने (दक्षिणी) किनारे पर अज़ीम ख़ान को रोकने के लिए भेजा.

जब रणजीत सिंह खुद मैदान में उतरे

रणजीत सिंह (फ़ाइल फोटो)

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कारो लिखते हैं कि कबालियों और सिख अकालियों के बीच भयंकर आमने-सामने की लड़ाई से शुरुआत हुई. अमृतसर के धार्मिक समूह के नेता फूला सिंह मारे गए और सिख घुड़सवार सेना कबायली पैदल सेना पर ज़्यादा असर नहीं डाल सकी, क्योंकि वे मैदान में बिखरे हुए पथरीले टीलों के बीच अच्छी तरह से तैनात थे.

‘लड़ाई का रुख़ सिखों के ख़िलाफ़ मुड़ने लगा. यूसुफ़जई और उनके लड़ाकों के समूहों ने असाधारण वीरता का परिचय देते हुए प्रशिक्षित सिख पैदल सेना को पीछे धकेल दिया.’

वो लिखते हैं कि ‘कबायली सेना ने उत्साहपूर्वक आगे बढ़ना शुरू किया, लेकिन महाराजा की सेना की गोरखा बटालियन ने उन्हें एक तरफ़ रोक दिया. इस बटालियन ने स्क्वॉयर फ़ॉर्मेशन बनाकर आगे बढ़ रहे कबायली समूहों पर लगातार गोलीबारी की. दूसरी ओर, सिख तोपखाने ने भी नदी के उस पार से प्रभावी ढंग से गोलाबारी की, जिससे कबायली सेना का बढ़ना रुक गया.’

कबायली लोग इन पथरीली पहाड़ियों के बीच पीछे हट गए और सिखों ने फिर से संगठित होकर पीर साब की महत्वपूर्ण चोटी पर कब्ज़ा करने के तीन प्रयास किए, लेकिन हर बार उन्हें पीछे धकेल दिया गया.

कारो लिखते हैं कि ‘चौथी कोशिश में पहाड़ी पर विजय प्राप्त हुई और वह भी केवल इसलिए क्योंकि महाराजा रणजीत सिंह खुद, बचे हुए गोरखा सैनिकों और अपने घुड़सवार अंगरक्षकों का नेतृत्व करते हुए, मैदान में उतरे और उनका हौसला बढ़ाया.’

वो लिखते हैं कि इस अवसर पर कबायलियों को हुए नुकसान का अंदाज़ा नौशेरा के पास विशाल कब्रिस्तानों को देखकर लगाया जा सकता है.

रणजीत सिंह का पेशावर पर कब्ज़ा

 बाला हिसार का किला

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कारो के अनुसार, इस दौरान नदी के दूसरी ओर मौजूद अज़ीम ख़ान ने न तो नदी पार करने का प्रयास किया और न ही सिख तोपखाने के प्रभाव को कम करने के लिए कोई ठोस कदम उठाए, हालांकि उसकी सेना दक्षिणी तट पर थी. उसी शाम अज़ीम ख़ान पीछे हट गए. वह युद्ध में मुश्किल से ही शामिल हुए और इस बात का कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है.

जोनाथन एल ली अपनी पुस्तक ‘अफ़ग़ानिस्तान: 1260 से वर्तमान तक का इतिहास’ में लिखते हैं कि कुछ लोगों का मानना ​​है कि, अज़ीम ख़ान को विश्वास था कि उनका भाई सिखों के कहने पर पेशावर पर वापस कब्ज़ा करने आ रहा था, जबकि बाकी लोग इसे कायरता या सिख हमले से घिर जाने के डर के रूप में बताते हैं.

कारो ने लिखा, “नौ साल बाद अलेक्जेंडर बर्न्स को पेशावर में बताया गया कि अज़ीम ख़ान को अपने खजाने की लूट का डर था या फिर उत्तरी तट पर अकाली दल के सदस्यों की चीखों से उनके सैनिक सतर्क हो गए थे. उन्होंने इन चीखों को नई सेना का आक्रमण समझा.”

अज़ीम ख़ान युद्ध के कुछ ही समय बाद लेकिन बिना किसी चोट के मर गए.

कारो लिखते हैं कि इस मृत्यु के साथ ही बीस ज़िंदा भाइयों के बीच बची हुई एकता का आख़िरी सूत्र भी मिट गया.

अज़ीम के सौतेले भाई यार मोहम्मद ने काबुल में अज़ीम का स्थान लिया और बाद में 1826 में अफ़ग़ानिस्तान के शासक बने और पेशावर के शासक बने.

अलेक्जेंडर गार्डनर अपनी पुस्तक ‘सोल्जर एंड ट्रैवलर: मेमॉयर्स ऑफ़ अलेक्जेंडर गार्डनर, कर्नल ऑफ़ आर्टिलरी इन द सर्विस ऑफ़ महाराजा रणजीत सिंह’ में लिखते हैं कि ‘रणजीत सिंह ने दुर्रानी सत्ता के बचे-खुचे अवशेषों को नष्ट करते हुए पेशावर को तबाह कर दिया और ख़ैबर दर्रे पर भी नियंत्रण कर लिया ताकि उस रास्ते से दुर्रानी सेना की कोई सहायता न आ सके.’

कारो लिखते हैं कि बाला हिसार के किले पर गोलाबारी हुई और उसके भीतर मौजूद खूबसूरत महल को लूट लिया गया. किले के नीचे स्थित बगीचे में लगे पेड़ों को काट दिया गया और कुंडों का पानी गंदा कर दिया गया और उनकी घुड़सवार सेना ने पेशावर के चारों ओर मीलों तक फैले बुखारा बेर, आड़ू, खुबानी और नाशपाती के शानदार बाग़ों को नष्ट कर दिया.

अंग्रेज़ों का आगमन

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हालांकि, वी. नालवा ने अपनी पुस्तक ‘हरि सिंह नालवा’ में लिखा है कि सिख सेना के कमांडर हरि सिंह नालवा ने जल्द ही इस किले का पुनर्निर्माण शुरू कर दिया था.

रणजीत सिंह की यह विजय उनकी विजयों की पराकाष्ठा साबित हुई. उनका साम्राज्य अब पश्चिम में ख़ैबर दर्रे से लेकर उत्तर में कश्मीर और दक्षिण में मुल्तान तक फैला हुआ था.

कारो के अनुसार, रणजीत सिंह वहां ज़्यादा देर नहीं रुके. उन्होंने यार मुहम्मद की अपने पक्ष में की गई आत्मसमर्पण की याचिका स्वीकार कर ली और दक्षिण की ओर लौट गए.

‘महाराजा रणजीत सिंह अब पेशावर के साथ-साथ कोहाट, बन्नू और डेरा जाट को नाममात्र को नियंत्रण में लाने में सफल हो गए थे, लेकिन उनकी सेनाएं लगातार कबायलियों के ख़िलाफ़ भयंकर लड़ाइयों में लगी रहती थीं, यहां तक ​​कि उन क्षेत्रों में भी जहां दुर्रानी गवर्नरों ने उनकी अधीनता स्वीकार कर ली थी.’

राजमोहन गांधी की पुस्तक ‘पश्तूनों के अहिंसक राजा’ से पता चलता है कि उनके बाद उत्तर भारत के धार्मिक नेता सैयद अहमद आए. वे 1827 में पेशावर पहुंचे. उनके आंदोलन का केंद्र चारसद्दा था.

उनकी पुस्तक में लिखा है कि ‘सैयद अहमद ने पेशावर के गवर्नर पर उन्हें ज़हर देने की कोशिश का आरोप लगाया और खुद पेशावर पर हमला कर दिया. इस हमले में यार मुहम्मद ख़ा मारे गए. यदि फ़्रांसीसी जनरल वेंचुरा के नेतृत्व में सिखों की टुकड़ी वहां मौजूद न होती, तो यार मुहम्मद के छोटे भाई सुल्तान मुहम्मद ख़ान के लिए पेशावर को बचाना संभव नहीं होता.’

सैयद अहमद ने एक बार फिर पेशावर पर हमला किया. बराकज़ई पराजित हुए और सैयद अहमद ने 1830 की गर्मियों के अंत में दो महीने तक पेशावर पर कब्ज़ा बनाए रखा, लेकिन 1831 में बालाकोट में सिखों के हमले में उनकी मौत हो गई.

1849 में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने सिखों को हरा दिया और पेशावर सहित पंजाब पर कब्ज़ा कर लिया, जो पहले रणजीत सिंह के नियंत्रण में था.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS