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महाभारत से ये 3 सबक हर मां-बाप को लेने चाहिए, काबिल बच्चे की परवरिश में आएंगे काम!

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Source :- LIVE HINDUSTAN

बच्चों को सही दिशा देने के लिए सिर्फ प्यार काफी नहीं होता, सही समय पर अनुशासन, भावनात्मक जुड़ाव और सही मार्गदर्शन भी उतना ही जरूरी है। अगर इन तीन चीजों का संतुलन बिगड़ जाए तो बच्चे का व्यवहार भी गलत दिशा में जा सकता है।

महाभारत सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह रिश्तों, फैसलों और परवरिश की गहरी समझ भी देता है। पेरेंटिंग कोच पुष्पा शर्मा बताती हैं कि अगर महाभारत की कहानियों को ध्यान से समझा जाए तो आज के माता-पिता अपनी पेरेंटिंग को और बेहतर बना सकते हैं। उस समय की गलतियां आज भी घर-घर में दोहराई जा रही हैं, बस रूप बदल गया है। पुष्पा शर्मा के अनुसार, बच्चों को सही दिशा देने के लिए सिर्फ प्यार काफी नहीं होता, सही समय पर अनुशासन, भावनात्मक जुड़ाव और सही मार्गदर्शन भी उतना ही जरूरी है। अगर इन तीन चीजों का संतुलन बिगड़ जाए तो बच्चे का व्यवहार भी गलत दिशा में जा सकता है।

जब प्यार में अनुशासन खो जाता है

पेरेंटिंग कोच पुष्पा शर्मा कहती हैं कि पेरेंट्स का अंधा प्यार कभी-कभी बच्चों के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है। महाभारत में धृतराष्ट्र अपने बेटे की गलतियों को जानते हुए भी अनदेखा करते रहे। उन्होंने कभी सख्ती नहीं दिखाई और ना ही गलत कामों पर रोक लगाई। इसका परिणाम यह हुआ कि उनके बेटे में जिद, अहंकार और गलत फैसले लेने की आदत बढ़ती गई, जिसका नतीजा महाभारत जैसे बड़े युद्ध में तब्दील हुआ।

हर पेरेंट्स को एक बात समझनी चाहिए कि बच्चे को हर बार बचाना या उसकी हर जिद पूरी करना उसे मजबूत नहीं बल्कि कमजोर बनाता है। अगर बच्चा गलती करता है तो उसे नजअंदाज न करें। एक्सपर्ट कहती हैं कि बच्चों को जिम्मेदारी सिखाने के लिए जरूरी है कि आप सही समय पर ‘ना’ कहना सीखें। यही असली पेरेंटिंग है।

इमोशनल दूरी बच्चों को अकेला कर देती है

पेरेंटिंग कोच के अनुसार, बच्चों की सिर्फ जरूरतें पूरी करना ही पेरेंटिंग नहीं है। उन्हें आपका समय और इमोशनल सपोर्ट भी चाहिए होता है। महाभारत में कर्ण का जीवन इसका उदाहरण है। उन्हें हमेशा अपनेपन की कमी महसूस हुई। यही कारण था कि उनके अंदर एक खालीपन बना रहा। आज भी कई बच्चे यही कहते हैं कि उनके माता-पिता उनके लिए सब कुछ करते हैं, लेकिन उन्हें समझते नहीं हैं।

आपको यह समझना होगा कि बच्चा आपकी बात तभी मानेगा जब वह आपसे जुड़ा हुआ महसूस करेगा। उसके साथ रोज थोड़ा समय बिताएं, उसकी बातें बिना टोके सुनें और उसे यह एहसास दिलाएं कि आप उसके साथ हैं। पुष्पा शर्मा सलाह देती हैं कि आप अपने बच्चे के साथ दोस्त जैसा व्यवहार करें, ताकि वह अपनी बातें छुपाने के बजाय आपके साथ शेयर करे। यही इमोशनल प्रेसेंस बच्चे को गलत रास्ते पर जाने से बचाती है।

गलत संगत से बचाने के लिए बनें सही गाइड

किशोरावस्था में दोस्त बच्चों के जीवन पर बहुत गहरा असर डालते हैं। महाभारत में दुर्योधन के फैसलों पर उसके मामा शकुनि का प्रभाव साफ दिखाई देता है। अगर उस समय सही मार्गदर्शन मिलता तो शायद कई गलतियां रोकी जा सकती थीं। आज के समय में 13 से 17 साल की उम्र में बच्चों पर पीयर प्रेशर सबसे ज्यादा होता है। इस उम्र में आपको बच्चे की जिंदगी में एक गाइड की तरह मौजूद रहना चाहिए।

इसका मतलब यह नहीं कि आप हर समय शक करें, बल्कि समझदारी से उसके दोस्तों और उसकी गतिविधियों के बारे में जानकारी रखें। पुष्पा शर्मा कहती हैं कि अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा गलत संगत से बचे तो पहले खुद उसके भरोसेमंद बनें, तभी वह आपके गाइडेंस को स्वीकार करेगा।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN