Source :- BBC INDIA

जर्मनी इस समय कुशल कामगारों की कमी से लगातार जूझ रहा है.
एक तरफ़ बुज़ुर्ग कर्मचारी रिटायर हो रहे हैं, और दूसरी तरफ़ उनकी जगह लेने के लिए पर्याप्त युवा उम्मीदवार नहीं मिल रहे. इस समस्या से निपटने के लिए यह भारत से आने वाले कामगारों को अब पहले से ज़्यादा मौक़ा दे रहा है.
हैंडिर्क फ़ॉन उंगर्न स्टर्नबर्ग के लिए इसकी शुरुआत फरवरी 2021 में उनके इनबॉक्स में आए एक ईमेल से हुई. यह ईमेल भारत से आया था.
संदेश का सार कुछ यूँ था: “हमारे पास बहुत से युवा और मेहनती लोग हैं, जो व्यावसायिक प्रशिक्षण लेना चाहते हैं, और हम जानना चाहते हैं कि क्या आपकी इसमें दिलचस्पी है.”
उस समय स्टर्नबर्ग दक्षिण पश्चिम जर्मनी में फ़्राइबर्ग चैंबर ऑफ़ स्किल्ड क्राफ़्ट्स में काम कर रहे थे. यह एक व्यापारिक संगठन है, जो राजमिस्त्रियों और कारपेंटर्स से लेकर कसाइयों और बेकर्स तक, कुशल कामगारों और उन्हें काम देने वाली कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है.
यह ईमेल बिल्कुल सही समय पर आया था.
स्टर्नबर्ग कहते हैं, “हमारे पास बहुत से ऐसे नियोक्ता थे, जो बेहद परेशान थे, क्योंकि उन्हें काम करने के लिए कोई मिल नहीं रहा था. इसलिए हमने इसे आज़माने का फ़ैसला किया.”
उनकी पहली कॉल स्थानीय कसाई संघ के प्रमुख को गई. पूरे जर्मनी में कसाइयों की हालत ख़ास तौर पर ख़राब थी. यह ऐसा क्षेत्र था, जो तेज़ी से गिरावट में जा रहा था.
2002 में जहाँ 19,000 छोटे परिवार इसे चला रहे थे, वहीं 2021 तक उनकी संख्या घटकर 11,000 से भी कम रह गई थी. नियोक्ताओं के लिए युवा लोगों को अप्रेंटिसशिप के लिए तैयार करना लगभग नामुमकिन हो गया था.
कसाई संघ के प्रमुख योआखिम लेडरर कहते हैं, “कसाई का काम बहुत मेहनत वाला होता है. और पिछले करीब 25 सालों से युवा दूसरे रास्ते पकड़ रहे हैं.”
‘मैं दुनिया देखना चाहती थी’

भारत में, उस शुरुआती ईमेल को भेजने वाली रोज़गार एजेंसी ‘मैजिक बिलियन’ ने 13 युवाओं को भर्ती करने में सफलता पाई. ये सभी 2022 की शरद ऋतु में जर्मनी पहुंचे और स्विट्ज़रलैंड की सीमा से लगे छोटे कस्बों में कसाई की अप्रेंटिसशिप शुरू की. वे अपने समय का एक हिस्सा कॉलेज में भी बिताते थे.
उनमें एक 21 साल की एक लड़की भी थी, जिसने अपना नाम न छापने की गुज़ारिश की. अपने साथ आए ज़्यादातर लोगों की तरह, उसने भी पहली बार भारत से बाहर कदम रखा था.
वह आज भी अपने उस समय के उत्साह को याद करती हैं, “मैं दुनिया देखना चाहती थी. मैं अपना जीवन स्तर बहुत ऊंचा करना चाहती थी. मैं अच्छी सामाजिक सुरक्षा चाहती थी.”
वह जर्मनी के सुदूर दक्षिण पश्चिम में बसे वाइल आम राइन शहर में काम करने आई थीं, जो स्विट्ज़रलैंड और फ्रांस दोनों की सीमाओं से सटा हुआ है.
तीन साल बाद हालात काफ़ी बदल चुके हैं. फ़ॉन उंगर्न स्टर्नबर्ग अब उस चैंबर में काम नहीं करते.
अब उन्होंने ‘मैजिक बिलियन’ की अदिति बनर्जी के साथ मिलकर अपनी खुद की रोज़गार एजेंसी ‘इंडिया वर्क्स’ शुरू कर ली है, ताकि और ज़्यादा युवा भारतीय कामगारों को जर्मनी लाया जा सके.
शुरुआत के 13 लोगों से बढ़कर अब जर्मनी की कसाई दुकानों में 200 युवा भारतीय काम कर रहे हैं.
जर्मनी ने बढ़ाया इंटर्नशिप कोटा

जर्मनी इस समय जनसांख्यिकीय संकट से गुज़र रहा है. 2024 की एक स्टडी के मुताबिक़, अर्थव्यवस्था को हर साल 2,88,000 विदेशी कामगारों को आकर्षित करने की ज़रूरत है. बर्टेल्समान फ़ाउंडेशन थिंक टैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, वरना 2040 तक कामकाजी आबादी में 10% की गिरावट आ सकती है.
बेबी बूमर पीढ़ी के आख़िरी लोग रिटायरमेंट की ओर बढ़ रहे हैं लेकिन उनकी जगह लेने के लिए पर्याप्त युवा जर्मन मौजूद नहीं हैं और इसकी वजह है कम जन्म दर. लेकिन भारत में बहुत सारे युवा मौजूद हैं.
बनर्जी कहती हैं, “भारत ऐसा देश है, जहां 25 साल से कम उम्र के 60 करोड़ लोग हैं. हर साल सिर्फ़ 1.2 करोड़ लोग ही वर्कफ़ोर्स में आते हैं. यानी यहां श्रम शक्ति की बहुत ज़्यादा उपलब्धता है.”
इंडिया वर्क्स इस साल 775 युवा भारतीयों को अप्रेंटिसशिप शुरू करने के लिए जर्मनी लाने की तैयारी कर रहा है. वे जिन पेशों में काम करेंगे, उनकी रेंज काफ़ी बड़ी है. इनमें सड़क बनाने वाले मज़दूर, मैकेनिक, पत्थर तराशने वाले और बेकर्स शामिल हैं.
2022 में भारत और जर्मनी के बीच माइग्रेशन और मोबिलिटी पार्टनरशिप एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर होने के बाद से कुशल भारतीय कामगारों के लिए जर्मनी में काम करना आसान हो गया है. फिर 2024 के आख़िर में जर्मनी ने यह एलान किया कि वह भारतीय नागरिकों के लिए कुशल कामगार वीज़ा का कोटा 20,000 सालाना से बढ़ाकर 90,000 कर देगा.
जर्मनी के आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक़, 2024 में देश में 1,36,670 भारतीय कामगार थे, जबकि 2015 में यह संख्या सिर्फ़ 23,320 थी.
‘भारत में नौकरी मिलना मुश्किल था’

इंडिया वर्क्स के ज़रिये जर्मनी में नौकरी पाने वाले युवा भारतीय अपनी किस्मत किसी नए देश में आज़माने के लिए लगभग एक जैसी वजहें बताते हैं- भारत में नौकरी ढूंढने में मुश्किलें, यूरोप में मिलने वाली ज़्यादा तनख़्वाह, और ज़िंदगी में अपने दम पर आगे बढ़ने की चाह.
मसलन, 20 साल के ईशु गरिया को ही देखिए. भारत में स्कूल पूरा करने के बाद वह यूनिवर्सिटी की डिग्री और कंप्यूटर से जुड़ी नौकरी के बारे में सोच रहे थे. लेकिन उनका कहना है, “मैं नहीं चाहता था कि इस डिग्री पर पैसे बर्बाद करूं और फिर किसी कंपनी में कम तनख़्वाह पर काम ढूंढता फिरूं.”
वो दिल्ली से सटे एक इलाके में रहते थे. ईशू ने इस को ज़िंदगी छोड़कर जर्मनी के ब्लैक फ़ॉरेस्ट इलाके के एक गांव को अपना नया ठिकाना बना लिया, जहां वह एक बेकरी में अप्रेंटिस हैं. उनकी शिफ़्ट रात तीन बजे तक चलती है और सर्दी से बचने के लिए वह हुड वाली मोटी जैकेट पहने रहते हैं. इसके बावजूद वह ख़ुश हैं.
वह कहते हैं, “यहाँ सैलरी काफ़ी अच्छी है. इसलिए मैं अपने परिवार की आर्थिक मदद कर पाऊंगा.”
और उन्हें जर्मनी के ग्रामीण इलाक़े की साफ़ हवा भी बहुत पसंद है.
25 साल के अजय कुमार चंदपाका हैदराबाद से जर्मनी आए हैं. उन्होंने फ़्राइबर्ग शहर के बाहर एक गांव में स्थित ट्रांसपोर्ट कंपनी ‘स्पेडीशन डोल्ड’ के साथ काम शुरू किया है. उनके पास मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री है.
वह कहते हैं, “भारत में मेरे लिए नौकरी हासिल कर पाना बहुत मुश्किल था. इसलिए मैंने सोचा कि आउसबिल्डुंग मेरे लिए बेहतर विकल्प होगा.” आउसबिल्डुंग जर्मन भाषा में ट्रेनिंग या अप्रेंटिसशिप को कहते हैं.
‘भारतीय कर्मचारियों ने कारोबार बचा लिया’

लेडरर, जिन्होंने शुरुआती बैच के दो लोगों को रखा था, अब अपने यहां सात युवा भारतीयों को काम पर रख चुके हैं. उनका कहना है कि इन नए कर्मचारियों ने उनका कारोबार बचा लिया है.
वह कहते हैं, “35 साल पहले जब मैंने शुरुआत की थी, तो 10 किलोमीटर के दायरे में मेरी जैसी आठ दुकानें थीं. आज मैं अकेला ही बचा हूं. भारत के बिना आज मेरा कारोबार चल ही नहीं पाता.”
वाइल आम राइन के टाउन हॉल में, सड़क के उस पार, शहर की मेयर डायना श्टॉकर भी भारत से कामगार रखने की तैयारी में हैं. वह जर्मनी की कंज़र्वेटिव क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी से हैं. नगर पालिका ने दो युवा पुरुषों की पहचान की है, जो इस साल के आख़िर में जर्मनी आएंगे और किंडरगार्टन टीचर के रूप में काम करेंगे.
वह कहती हैं, “हम पूरे जर्मनी में टीचर्स ढूंढ रहे हैं, लेकिन वे मिलने वाकई बहुत मुश्किल है.”
श्टॉकर पहले जर्मन बुंडेस्टाग की सदस्य रह चुकी हैं और 2024 में मेयर चुनी गईं. वे मानती हैं कि जर्मनी को हर क्षेत्र में युवा प्रतिभा ढूंढने में भारी दिक़्क़त हो रही है और इसका सिर्फ़ एक ही समाधान है.
वह कहती हैं, “हमें विदेशों की ओर देखना होगा. यही एकमात्र रास्ता है.”
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