Source :- LIVE HINDUSTAN
संक्षेप:
पिछले 15 वर्षों से सत्ता में काबिज शेख हसीना के लिए जुलाई 2024 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन काल बन गया। देखते ही देखते यह आंदोलन राष्ट्रव्यापी जनविद्रोह में बदल गया।
भारत का पड़ोसी देश बांग्लादेश इस समय अपने इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। अगस्त 2024 में छात्र-नेतृत्व वाले एक व्यापक जनआंदोलन के बाद पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से बेदखल होना पड़ा था। अब, 12 फरवरी को होने वाले राष्ट्रीय चुनाव देश में लोकतंत्र की बहाली की दिशा में पहला बड़ा कदम हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की देखरेख में हो रहे इन चुनावों पर न केवल बांग्लादेश, बल्कि भारत की भी पैनी नजर है।
यह चुनाव केवल राजनीतिक सत्ता के हस्तांतरण का जरिया नहीं है, बल्कि यह एक नए बांग्लादेश के निर्माण का परीक्षण भी है। आंकड़ों के लिहाज से यह एक विशाल लोकतांत्रिक अभ्यास है। देश भर में लगभग 43,000 मतदान केंद्रों पर 13 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के लिए सुरक्षा और निष्पक्षता सुनिश्चित करना अंतरिम सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
भारत-बांग्लादेश संबंधों का उतार-चढ़ाव
भारत के लिए बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति में रुचि केवल पड़ोस के कारण नहीं, बल्कि गहरे ऐतिहासिक और रणनीतिक कारणों से है। 1947 के विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान बना यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से भारत के बीचों-बीच स्थित था। 1971 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हस्तक्षेप के बाद बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उभरा और भारत उसे मान्यता देने वाला पहला देश था।
संबंधों में हमेशा उतार-चढ़ाव रहे। शेख हसीना की अवामी लीग को आम तौर पर भारत का करीबी माना जाता रहा है, जबकि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और जमात-ए-इस्लामी को लेकर भारतीय नीति-निर्माताओं के मन में अक्सर आशंका रही है, क्योंकि उनका झुकाव पाकिस्तान की ओर और विचारधारा इस्लामी मानी जाती है।
शेख हसीना का निष्कासन
पिछले 15 वर्षों से सत्ता में काबिज शेख हसीना के लिए जुलाई 2024 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के खिलाफ शुरू हुआ छात्र आंदोलन काल बन गया। देखते ही देखते यह आंदोलन राष्ट्रव्यापी जनविद्रोह में बदल गया। अल जज़ीरा की रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षा बलों की कार्रवाई में लगभग 1,400 लोग मारे गए।
अराजकता के माहौल में 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को सैन्य हेलीकॉप्टर से भारत भागना पड़ा। वह वर्तमान में दिल्ली में सुरक्षित शरण लिए हुए हैं। बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने उन्हें विरोध प्रदर्शनों में हिंसा के लिए दोषी ठहराया है और उनकी गैर-मौजूदगी में मृत्युदंड की सजा सुनाई है। बांग्लादेश सरकार ने भारत से उनके प्रत्यर्पण की औपचारिक मांग की है, जिसने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है।
अल्पसंख्यकों पर हमले
शेख हसीना के सत्ता छोड़ने के बाद बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं। एसोसिएटेड प्रेस (AP) के अनुसार, बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद ने अगस्त से दिसंबर 2024 के बीच सांप्रदायिक हिंसा की 2,000 से अधिक घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया है।
भारत के विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने संसद को सूचित किया कि 5 अगस्त 2024 से 23 मार्च 2025 तक अल्पसंख्यक-संबंधी 2,400 से अधिक घटनाएं सामने आई हैं। हाल ही में 27 वर्षीय हिंदू गार्मेंट कर्मचारी दीपू चंद्र दास की लिंचिंग और उसके बाद उसके शव को पेड़ से लटकाकर जलाने की घटना ने अंतरराष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया।
इन घटनाओं के कारण भारत और बांग्लादेश के राजनयिक संबंध ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। दोनों देशों ने कुछ समय के लिए वीजा सेवाएं तक निलंबित कर दी थीं। यहां तक कि क्रिकेट के मैदान पर भी इसका असर दिखा, जब बांग्लादेश ने भारत द्वारा सह-मेजबानी किए गए टी-20 विश्व कप का बहिष्कार किया।
चुनाव में भारत एक प्रमुख मुद्दा
चुनाव प्रचार के दौरान BNP ने भारत के साथ संबंधों, सीमा पर हिंसा और तीस्ता नदी जल बंटवारे जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है। BNP के चेयरमैन तारिक रहमान अपनी पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। हालांकि, उन्होंने घरेलू दर्शकों के लिए सुलह का रुख अपनाया है और कहा है कि उनकी पार्टी प्रतिशोध नहीं, बल्कि न्याय और मानवता की राजनीति में विश्वास करती है। दूसरी ओर, जमात-ए-इस्लामी भी मैदान में है और उसने अपने घोषणापत्र में भारत सहित अन्य पड़ोसी देशों के साथ शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने का वादा किया है, लेकिन पाकिस्तान का उल्लेख न करना चर्चा का विषय बना हुआ है। जमात ने पहली बार एक हिंदू उम्मीदवार को भी मैदान में उतारा है।
भारत का रुख
बदलती परिस्थितियों को देखते हुए, भारत ने भी अपना रुख बदला है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ढाका में BNP के तारिक रहमान से मुलाकात की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत पत्र सौंपा। यह मुलाकात संकेत देती है कि भारत बांग्लादेश में लोकतांत्रिक परिवर्तन के बाद नए संबंधों की शुरुआत के लिए तैयार है।
लगभग 44% पंजीकृत मतदाता 18 से 37 वर्ष की आयु के बीच हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि युवा पीढ़ी इस चुनाव का भविष्य तय करेगी। देश अब लोकतंत्र की बहाली, गार्मेंट निर्यात उद्योग को पुनर्जीवित करने और भारत के साथ संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
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