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पाकिस्तान के यूएई को क़र्ज़ चुकाने से रिश्तों में दरार की अटकलें क्यों तेज़ हो गई हैं?

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Source :- BBC INDIA

यूएई के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नाह्यान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़

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लंबे समय से पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच बेहद करीबी संबंध रहे हैं. लेकिन हाल के दिनों में इन रिश्तों पर सवाल उठने लगे हैं.

इन अटकलों की शुरुआत पाकिस्तान के हालिया फैसले से हुई, जिसमें उसने यूएई को जमा क़र्ज़ राशि लौटाने का निर्णय लिया.

इससे पहले ऐसी जमा राशि लौटाने की समय सीमा आगे बढ़ा दी जाती थी.

दोनों पक्षों ने सार्वजनिक तौर पर किसी भी मतभेद से इनकार किया है. पाकिस्तान ने तनाव की अटकलों को खारिज करते हुए कहा है कि रिश्ते मजबूत बने हुए हैं.

लेकिन इस राशि को लौटाने का समय और उसका आकार पाकिस्तान के मीडिया में नई अटकलों को बढ़ा रहा है.

अटकलों की शुरुआत

पाकिस्तानी रुपये

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पाकिस्तान-यूएई संबंधों में संभावित तनाव की अटकलों को तब बल मिला, जब तीन अप्रैल को मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि पाकिस्तान अप्रैल में यूएई का क़र्ज़ लौटा रहा है.

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने रिपोर्ट किया कि यह राशि करीब 3.5 अरब डॉलर है, जो पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग पांचवां हिस्सा है.

इससे पाकिस्तान की बाहरी वित्तीय स्थिति को लेकर चिंता बढ़ी. चार अप्रैल को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर इस घटनाक्रम की पुष्टि की.

मंत्रालय ने कहा कि यूएई की जमा राशि द्विपक्षीय समझौतों के तहत रखी गई थी, जो पाकिस्तान की आर्थिक स्थिरता के लिए अबू धाबी के समर्थन को दिखाती है. मंत्रालय ने कहा कि अब इसकी मियाद पूरी हो चुकी है और इसे स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के जरिए वापस किया जाएगा.

हालांकि, बयान में लौटाई जाने वाली राशि का ज़िक्र नहीं किया गया.

भुगतान के समय और राशि को लेकर संभावित तनाव पर चर्चा शुरू हुई, लेकिन न पाकिस्तान और न ही यूएई ने किसी तनाव का संकेत दिया.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इसे “सामान्य वित्तीय प्रक्रिया” बताया और मतभेद की अटकलों को “भ्रामक” कहा. मंत्रालय ने यूएई के साथ पाकिस्तान के मजबूत संबंधों को दोहराया.

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

शहबाज़ शरीफ़ और मोहम्मद बिन सलमान (फ़ाइल फोटो)

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क़र्ज़ वापसी का मुद्दा इसलिए अहम है, क्योंकि पाकिस्तान अपने सात अरब डॉलर के अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) कार्यक्रम के तहत बाहरी वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करने के लिए द्विपक्षीय जमा राशियों पर काफ़ी हद तक निर्भर है.

इस कार्यक्रम के तहत पाकिस्तान को पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखने के लिए चीन, सऊदी अरब और यूएई जैसे प्रमुख साझेदारों से करीब 12.5 अरब डॉलर की वित्तीय गारंटी और रोलओवर बनाए रखना होता है.

कर्ज़ का रोलओवर एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें मियाद पूरी कर चुके ऋण को चुकाने के बजाय उसे नई शर्तों या नई अवधि के साथ आगे बढ़ा दिया जाता है.

यह पहले की व्यवस्था से अलग था, क्योंकि ऐसी जमा राशियों को आमतौर पर हर साल आगे बढ़ाया जाता था.

इस भुगतान मुद्दे ने शुरुआत में पाकिस्तानी मीडिया में चिंता बढ़ाई कि मध्य पूर्व संघर्ष से जुड़ी आपूर्ति बाधाओं के बीच इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार कमजोर हो सकता है.

मीडिया का क्या है कहना?

डॉलर

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कुछ क्षेत्रीय विशेषज्ञों और मीडिया संस्थानों ने संकेत दिया है कि मतभेद सामने आ रहे हैं, जबकि कुछ पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टों ने अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों का हवाला देते हुए बढ़ते तनाव की बात कही है.

क़तर आधारित अखबार अल-अरबी अल-जदीद में प्रकाशित एक टिप्पणी में कहा गया कि ऐसे संकेत हैं कि यूएई पाकिस्तान को “आर्थिक रूप से दबाकर और वित्तीय नुकसान पहुंचाकर कड़ी सज़ा” देने की कोशिश कर रहा है. इसमें खास तौर पर सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य नज़दीकी का ज़िक्र किया गया.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि एक अन्य संभावित कारण पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ़ की हालिया टिप्पणियां हो सकती हैं, जिनमें उन्होंने इसराइल की कड़ी आलोचना करते हुए उसे कथित तौर पर “दुष्ट” और “मानवता के लिए अभिशाप” बताया था.

इस बीच, यूएई71 वेबसाइट में ‘द डिप्लोमैट’ पत्रिका की एक रिपोर्ट का जिक्र किया गया. इसमें पाकिस्तान-यूएई संबंधों में भरोसे की कमी की ध्यान दिलाया गया है.

इस रिपोर्ट में पाकिस्तानी पत्रकार मुहम्मद फैसल ने तर्क दिया कि ईरान युद्ध ने दोनों देशों के संबंधों में “दरारों को उजागर कर दिया है”, जबकि “अंदर ही अंदर असंतोष कई सालों से बढ़ रहा था.”

उन्होंने कहा कि इसकी एक वजह पाकिस्तान का यूएई के बजाय सऊदी अरब को प्राथमिकता देना है, जो क्षेत्रीय वर्चस्व की यूएई की इच्छा के ख़िलाफ़ जाता है.

ईरान युद्ध पर पाकिस्तान के रुख को लेकर यूएई के सोशल मीडिया यूजर्स की आलोचना का जिक्र करते हुए, पाकिस्तानी पत्रकार टॉम हुसैन ने हांगकांग के साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में एक रिपोर्ट लिखी.

इस रिपोर्ट में कहा कि इस्लामाबाद के इनकार के बावजूद “सोशल मीडिया प्रतिक्रिया इस बात की पुष्टि करती दिख रही है कि यूएई का मियाद पूरी कर चुकी जमा राशि वापस लेने का फैसला सिर्फ आर्थिक जरूरत के कारण नहीं था”.

आगे क्या हो सकता है?

स्टेट बैंक आफ़ पाकिस्तान का लोगो (फ़ाइल फोटो)

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13 अप्रैल को द डिप्लोमैट में पाकिस्तानी पत्रकार मोहम्मद फ़ैसल के लेख में कहा गया कि “वक़्त के साथ पाकिस्तान और यूएई, दोनों को बदलते क्षेत्रीय परिदृश्य में अपने रिश्तों का फिर से मूल्यांकन करना होगा.”

10 अप्रैल को डॉन में प्रकाशित एक लेख में कहा गया कि एशिया और पश्चिम देशों में पुराने गठबंधन टूट रहे हैं, जबकि नई साझेदारियां फ़िलहाल अस्थिर हैं.

लेख में यह भी कहा गया कि यूएई का खाड़ी देशों से दूरी बनाना और क़र्ज़ वापसी की मांग करना यह दिखाता है कि ग्लोबल साउथ पश्चिमी पूंजीवादी व्यवस्था के मुकाबले वैचारिक रूप से एकजुट नहीं है.

इस बीच, 15 अप्रैल को पाकिस्तान ऑब्जर्वर में प्रकाशित एक लेख में, बिना सीधे तनाव का जिक्र किए, कहा गया कि पाकिस्तान और यूएई के संबंधों के लिए “अधिक रणनीतिक और संतुलित दृष्टिकोण” की ज़रूरत है.

लेख में कहा गया कि “पाकिस्तान को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह यूएई को दूर जाने या भारत के साथ बहुत अधिक नज़दीकी बढ़ाने की स्थिति में न पहुंचने दे, जिससे पाकिस्तान की रणनीतिक जगह सीमित हो जाए.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS