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दो पुरुषों से प्रेग्नेंट हुई महिला के जुड़वां बच्चे, जानिए मेडिकल साइंस इस बारे में क्या कहता है?

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Source :- BBC INDIA

गर्भवती महिला (सांकेतिक तस्वीर)

इमेज स्रोत, David Zorrakino/Europa Press via Getty Images

    • Author, सेंटियागो वेनेगास
    • पदनाम, बीबीसी मुंडो
  • 28 अप्रैल 2026, 10:31 IST

  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

साल 2018 में एक महिला अपने दो साल के जुड़वां बेटों के पिता के बारे में जानने के लिए कोलंबिया के नेशनल यूनिवर्सिटी में ‘लेबोरेटरी ऑफ़ पॉपुलेशन जेनेटिक्स एंड आइडेंटिफिकेशन’ पहुंचीं.

लेबोरेटरी ने बच्चों के पिता के बारे में जानने के लिए एक नियमित टेस्ट किया और फिर उसे दोहराया. इस टेस्ट का नतीजा इतना हैरान करने वाला था कि वे इसे पूरी तरह कन्फ़र्म करना चाहते थे.

इन जुड़वां बच्चों की मां तो एक ही थी, लेकिन इनके पिता अलग-अलग थे.

यह एक बेहद दुर्लभ मामला है, जिसे ‘हेटेरोपैटर्नल सुपरफ़ेकंडेशन’ कहा जाता है. दुनिया भर के साइंटिफ़िक लिटरेचर में अब तक ऐसे क़रीब 20 मामले ही सामने आए हैं.

नेशनल सेंटर फ़ॉर बायोटेक्नॉलॉजी इनफ़ॉर्मेशन के मुताबिक़ हेटेरोपैटर्नल सुपरफ़ेकंडेशन यानी दो या ज़्यादा एग्स का एक ही मेंस्ट्रुअल साइकिल में दो अलग-अलग पुरुषों के स्पर्म से फ़र्टिलाइज़ेशन होना, जिससे महिला ऐसे जुड़वां बच्चों का गर्भधारण करे जिनके अलग-अलग पिता हों.

हालांकि यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ सैद्धांतिक रूप से जानते थे कि ऐसा संभव है, लेकिन उन्होंने पहले कभी ऐसे किसी मामले को ख़ुद नहीं देखा था. इसने फौरन ही उनकी वैज्ञानिक जिज्ञासा को जगा दिया.

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मामले का पता कैसे चला

क्लिनिक में बैठी एक गर्भवती महिला

इमेज स्रोत, Drs Producoes via Getty Images

पितृत्व यानी पैटरनिटी का टेस्ट करने के लिए, कोलंबिया की नेशनल यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ़ जेनेटिक्स के वैज्ञान‍िक ‘माइक्रोसैटेलाइट मार्कर’ नाम की एक तकनीक का इस्तेमाल करते हैं.

आसान शब्दों में समझें तो इसमें बच्चे, मां और कथित पिता के डीएनए की तुलना की जाती है.

लैब के डायरेक्टर, प्रोफ़ेसर विलियम उसाक्वेन ने बीबीसी मुंडो को बताया, “हम हर व्यक्ति से 15 से 22 पॉइंट्स डीएनए सैंपल लेते हैं, जिन्हें ‘माइक्रोसैटेलाइट’ कहते हैं. उनकी जाँच करते हैं और उनकी एक-एक करके तुलना करते हैं.”

लेकिन यह प्रक्रिया सिर्फ़ डीएनए को एक शक्‍त‍िशाली माइक्रोस्कोप के नीचे रखने से कहीं ज़्यादा मुश्किल है.

उंगली में सूई चुभोकर खून के सैंपल लेने के बाद वैज्ञानिक डीएनए की छोटी मात्रा को दूसरे हिस्सों से अलग करने के लिए एक रासायनिक प्रक्रिया का सहारा लेते हैं.

वैज्ञानिक एक ऐसी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं, जिससे किसी व्यक्ति की जेनेटिक प्रोफ़ाइल को बारकोड जैसे फ़ॉर्मेट में देखना संभव हो जाता है (फ़ाइल फ़ोटो)

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फिर वे डीएनए को एम्प्लिफाई करने के लिए इसे ख़ास मशीन (इक्विपमेंट) में रखते हैं.

इससे बने लिक्विड को फ्लोरोसेंट डाई के साथ मिलाकर, विश्लेषण के लिए गए 15 से 22 माइक्रोसैटेलाइट पॉइंट्स को मार्क किया जाता है.

फिर इसे एक और मशीन से गुज़ारा जाता है जो हर सैंपल में माइक्रोसैटेलाइट को पढ़ती है और उन्हें एक न्यूमेरिकल सीक्वेंस में बदल देती है. इस प्रोसेस को इलेक्ट्रोफोरेसिस कहते हैं.

अंत में उन न्यूमेरिकल सीक्वेंस का इस्तेमाल करके यह पता लगाते हैं कि इसकी कितनी संभावना है कि जिस आदमी का टेस्ट किया गया है वही बच्चे का पिता है.

जब बच्चे का आधा जेनेटिक प्रोफ़ाइल माँ से और दूसरा आधा कथित पिता से मैच करता है, तभी यह तय होता है कि बच्चे के मां-बाप कौन हैं.

एक असाधारण नतीजा

सांकेतिक तस्वीर

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कोलंबिया में इन जुड़वा बच्चों के पिता के बारे में जानने के लिए वैज्ञानिकों ने माँ, दोनों बच्चों और टेस्ट के लिए आए कथित पिता के डीएन में मौजूद 17 माइक्रोसैटेलाइट्स का विश्लेषण किया.

उन्होंने पाया कि उस आदमी का डीएनए एक बच्चे से तो मेल खाता रहा है, लेकिन दूसरे बच्‍चे से नहीं. यह एक असाधारण नतीजा था.

उसाक्वेन का कहना है, “मैं 26 साल से इस लैब का डायरेक्टर हूँ. यह अब तक का पहला और एक मात्र ऐसा मामला है जो हमने देखा है.”

नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलंबिया के इंस्टीट्यूट ऑफ़ जेनेटिक्स में जेनेटिक्स की एक्सपर्ट और शोधकर्ता एंड्रिया काज़ेज़ कहती हैं, “हमने दूसरी रिपोर्टों से सुना था कि ऐसे मामले होते हैं, लेकिन दुनिया भर में इनकी संख्या बहुत कम होती है.”

इस मामले में प्रोटोकॉल का पालन करते हुए एक्सपर्ट्स की टीम ने शुरू से ही टेस्ट को दोहराया ताकि प्रोसेसिंग में हुई किसी भी संभावित ग़लती या सैंपल के आपस में बदल जाने की आशंका को ख़त्म किया जा सके. लेकिन नतीजा फिर से बिल्कुल एक जैसा आया.

क्यों दुर्लभ है ऐसा होना

टेस्ट में पता चला कि बच्चों के पिता अलग-अलग थे (सांकेतिक तस्वीर)

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अमेरिका के बाल्टीमोर में एक लैब के वैज्ञानिकों ने साल 2014 में प्रकाशित एक लेख में बताया कि 39 हज़ार पैटरनिटी टेस्ट के डेटाबेस में ‘हेटरोपैटर्नल सुपरफ़ेकंडेशन’ के सिर्फ़ तीन मामले ही सामने आए.

उसाक्वेन बताते हैं कि यह जैवि‍क घटना इतनी कम क्यों होती है?

उनका कहना है, “सबसे पहले, महिला के दो यौन साथी होने चाहिए. दूसरा, उसे बहुत कम समय के अंदर ही दोनों पुरुषों के साथ संबंध बनाने चाहिए. इसके अलावा, ‘पॉलीओव्यूलेशन’ भी होना चाहिए.”

पॉलीओव्यूलेशन का मतलब है कि एक ही माहवारी चक्र में दो या उससे ज़्यादा अंडे रिलीज़ हों.

उसाक्वेन का कहना है, “और आख़िर में दोनों अंडों का फर्टिलाइज़ होना भी ज़रूरी है. यह एक दुर्लभ घटना है. इसमें एक और दुर्लभ घटना जुड़ जाती है. फिर एक और दुर्लभ घटना… और फिर एक और दुर्लभ घटना.”

यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि अलग-अलग पिताओं वाले जुड़वां बच्चे कभी भी आइडेंटिकल (एक समान) नहीं हो सकते, क्योंकि आइडेंटिकल जुड़वां बच्चे एक ही अंडे और स्पर्म से बनते हैं.

निजता का मामला

एक महिला के एक ही समय में दो पार्टनर कैसे हो सकते हैं, वैज्ञानिकों के लिए एथिक्स की वजह से पूरी परिस्थिति बारे में पूछताछ करना संभव नहीं होता (सांकेतिक तस्वीर)

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जब कोई महिला एक से ज़्यादा अंडे रिलीज़ करती है और सिर्फ़ एक ही अंडा फर्टिलाइज़ होता है, तो ज़्यादातर मामलों में बाक़ी अंडे जल्दी ही पुराने होकर मर जाते हैं.

यह एक और वजह है कि ‘सुपरफ़ेकंडेशन’ इतना दुर्लभ क्यों है, क्योंकि दूसरे अंडे का फर्टिलाइज़ेशन, उसके (अंडे के) मरने से पहले ही हो जाना चाहिए.

अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन के मुताबिक़, अंडा रिलीज़ होने के बाद चौबीस घंटे से भी कम समय तक जीवित रहता है.

हालाँकि एंड्रिया काज़ेज़ बताती हैं कि ज़रूरी नहीं कि अंडे एक ही समय पर रिलीज़ हों.

उनका कहना है, “कभी-कभी ओवरी एक अंडा रिलीज़ करती है और दो या तीन दिन बाद दूसरा अंडा रिलीज़ करती है.”

वह आगे कहती हैं कि इससे अलग-अलग समय पर फर्टिलाइज़ेशन होने की संभावना बढ़ जाती है.

ऐसे बहुत कम मामले सामने आने की एक अन्य वजह यह है कि ज़्यादातर लोग पैटरनिटी टेस्ट नहीं करवाते हैं.

इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि भविष्य में यह घटना शायद उतनी असामान्य न रहे, “क्योंकि अब मॉलिक्युलर तरीके आसानी से उपलब्ध हैं और पैटरनिटी टेस्टिंग की लोकप्रियता भी बढ़ रही है.”

हालाँकि वैज्ञानिक ‘हेटरोपैटर्नल सुपरफ़ेकंडेशन’ के मामलों में गर्भधारण की परिस्थितियों को जानने में दिलचस्पी रखते हैं, लेकिन रिसर्च एथिक्स उन्हें टेस्ट करवाने वाले लोगों की निजी ज़िंदगी के बारे में पूछने से रोकते हैं.

उसाक्वेन बताते हैं, “पैटरनिटी टेस्ट हमेशा इसमें शामिल लोगों की गरिमा और निजता का पूरा सम्मान करते हुए ही किए जाते हैं.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS