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क्रूड ऑयल: 2008 जैसा लग सकता है बड़ा झटका, क्या असली संकट अभी बाकी है?

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Source :- LIVE HINDUSTAN

Oil Crisis: तेल के दाम दिख रहे हैं कम, लेकिन असल में महंगाई ज्यादा है। पेट्रोल, डीजल की कीमतें इससे भी ज्यादा तेजी से बढ़ रही हैं। अगर युद्ध लंबा खिंचा, तो तेल की कीमतें 2008 के रिकॉर्ड 147 डॉलर प्रति बैरल को भी पार कर सकती हैं। जानिए ईरान युद्ध के बीच क्या है असली कहानी?

ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध को शुरू हुए अब तीन हफ्ते हो चुके हैं, लेकिन तेल बाजार की असली कहानी वो नहीं है, जो आम लोग देख रहे हैं। कागज पर दिखने वाले तेल के दाम और असल में बिक रहे तेल की कीमतों के बीच बड़ा फर्क पैदा हो गया है, जिसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है।

ब्रेंट क्रूड 50% उछला, लेकिन असली मार उससे भी ज्यादा

ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड करीब 50% बढ़कर 112 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है। इसकी बड़ी वजह है होर्मुज स्ट्रेट का लगभग बंद होना और मिडिल ईस्ट में ऊर्जा ठिकानों पर हमले।

पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल की कीमतें ज्यादा तेजी से बढ़ रहीं

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक अब असली समस्या यहां से शुरू होती है। पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल जैसे असली इस्तेमाल वाले ईंधन की कीमतें इससे भी ज्यादा तेजी से बढ़ रही हैं। यानी जो आंकड़े दिख रहे हैं, असली महंगाई उससे कहीं ज्यादा है।

एशिया में तेल के लिए मची होड़

एशिया, जो दुनिया का सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता क्षेत्र है, वहां रिफाइनरियां दूर-दराज के देशों से महंगे दामों पर तेल खरीदने को मजबूर हैं। इसका असर अब जमीन पर दिखने लगा है। ट्रकिंग कंपनियों की लागत बढ़ रही है, शिपिंग सेक्टर में ईंधन खरीद कम हो रही है और एयरलाइंस ने साफ कह दिया है कि महंगे जेट फ्यूल का बोझ अब यात्रियों को उठाना पड़ेगा।

अमेरिका की कोशिशें भी पड़ रही कम

फ्यूचर मार्केट (जहां कागज पर ट्रेडिंग होती है) और असली तेल की कीमतों में अंतर की एक वजह अमेरिका की दखल भी है। अमेरिका ने कीमतों को काबू में रखने के लिए अपने भंडार से तेल जारी किया है, लेकिन इसका असर सीमित नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि फ्यूचर मार्केट और असली बाजार अब पूरी तरह अलग दिशा में चल रहे हैं, जो एक बड़े सप्लाई शॉक का संकेत है।

2008 जैसा बड़ा झटका लग सकता है

वॉल स्ट्रीट की बड़ी कंपनियों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचा, तो तेल की कीमतें 2008 के रिकॉर्ड 147 डॉलर प्रति बैरल को भी पार कर सकती हैं। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार, यह अब तक का सबसे बड़ा सप्लाई संकट बनता जा रहा है, क्योंकि फारस की खाड़ी से रोजाना करीब 1.7 करोड़ बैरल तेल प्रभावित हो रहा है।

हर सेक्टर पर असर, आम आदमी की जेब पर सीधा वार

अब असर हर जगह दिखने लगा है। अमेरिका में पेट्रोल 4 डॉलर प्रति गैलन के करीब पहुंच गया है और डीजल 5 डॉलर पार कर चुका है। जर्मनी में लोग महंगे दामों के कारण हीटिंग ऑयल सिर्फ जरूरत पर ही खरीद रहे हैं।

शिपिंग कंपनियां फ्यूल सरचार्ज बढ़ा रही हैं और कई जगहों पर उड़ानें तक रद्द करनी पड़ रही हैं। ट्रांसपोर्ट कंपनियों का कहना है कि उनके खर्च का करीब 30% हिस्सा सिर्फ ईंधन पर जा रहा है।

असली संकट अभी बाकी है?

मिडिल ईस्ट में जंग अभी खत्म होने के संकेत नहीं दे रही है और होर्मुज स्ट्रेट खुलने को लेकर भी कोई स्पष्टता नहीं है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा संकट और गहर सकता है। ऑयल मार्केट की असली कहानी आंकड़ों से कहीं ज्यादा गंभीर है। अगर हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले दिनों में महंगाई और बढ़ सकती है और इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN