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ईरान जंग के बीच कच्चे तेल की सप्लाई पर बड़ा असर, क्या है भारत की तैयारी

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Source :- BBC INDIA

मोदी

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इसराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग का आर्थिक असर अब और साफ़ नज़र आने लगा है. होर्मुज स्ट्रेट बंद होने और खाड़ी देशों की रिफ़ाइनरियों पर हो रहे हमलों से कच्चे तेल का संकट गहरा गया है.

शनिवार रात को ईरान की राजधानी तेहरान में एक बड़े तेल डिपो पर हमले के बाद कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया. सोमवार को एक ही ट्रेडिंग सेशन में कच्चे तेल की क़ीमतें 23 डॉलर तक चढ़ गईं थीं और अंत में यह 103 डॉलर प्रति बैरल पर थमीं.

दरअसल, बढ़ती अनिश्चितता के बीच ख़बर आई है कि जी-7 देश अपने स्ट्रैटेजिक तेल रिज़र्व से 300 से 400 मिलियन बैरल तेल जारी कर सकते हैं.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, जापानी वित्त मंत्री सतसुकी कतायामा ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने जी-7 देशों से अपने रिज़र्व को चरणबद्ध तरीक़े से खोलने को कहा है.

आईईए में 30 देश हैं, जिन्हें 90 दिनों की ज़रूरत का तेल भंडार रखना ज़रूरी होता है.

रॉयटर्स का कहना है कि जापान अपने अपनी कुल खपत के 95% के लिए आयात पर निर्भर है और उसके पास सबसे बड़ा तेल रिज़र्व है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि बहुत कम समय के लिए तेल का बढ़ा दाम, वैश्विक शांति के लिए बहुत छोटी सी क़ीमत है.

तेल के दामों पर नज़र रखने वाले द स्पेक्टेटर इंडेक्स के मुताबिक़, कच्चे तेल के दाम में 30%, ब्रेंट क्रूड ऑयल में 26%, हीटिंग ऑयल में 22% और पेट्रोल में 14% का उछाल आया.

एशिया के शेयर बाज़ारों में भी बड़ी गिरावट देखने को मिली. कारोबारी सत्र के दौरान दक्षिण कोरिया, जापान, वियतनाम, भारत और चीन के शेयर बाज़ार 1 से 6 फ़ीसदी तक लुढ़क गए.

ज़ाहिर है इस उथल-पुथल का असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ रहा है.

ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में भारत को रूसी तेल ख़रीदने की 30 दिन की मोहलत दी है, ये कहते हुए कि इससे तेल के दाम नियंत्रित करने में सहूलियत होगी.

अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने इस पर सफाई दी कि ‘यह अस्थायी कद़म है, जिसका मक़सद ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष के कारण कच्चे तेल के बाज़ार पर पड़ रहे दबाव को कम करना है.’

लेकिन बढ़ते संघर्ष ने कई देशों को एहतियाती क़दम उठाने पर मजबूर किया, जिसमें भारत और पाकिस्तान भी शामिल हैं.

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की बेटी और पाकिस्तान के पंजाब सूबे की मुख्यमंत्री मरियम नवाज़ ने कहा है कि सरकारी अधिकारियों को दी जाने वाली ईंधन सप्लाई में कटौती की जाएगी.

एक्स पर उन्होंने लिखा, “जब तक पेट्रोलियम संकट का समाधान नहीं हो जाता, प्रांतीय मंत्रियों के लिए आधिकारिक ईंधन आपूर्ति निलंबित रहेगी. मैंने सरकारी अधिकारियों के वाहनों के लिए पेट्रोल और डीज़ल भत्ते में तुरंत 50 प्रतिशत कटौती के आदेश भी दिए हैं.”

अनिश्चितता के बीच भारत पर असर

होर्मुज़ स्ट्रेट से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल होकर गुजरता है, लेकिन अब यह लगभग बंद है.

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विदेश नीति विशेषज्ञ हर्ष वी पंत ने बीबीसी हिन्दी के एक कार्यक्रम में कहा कि ‘जिस तरह के हालात हैं उसमें तेल के दाम बढ़ने तय हैं और वैश्विक महंगाई पर भी इसका असर होगा. आईएमएफ़ की ओर से बार बार कहा जाने लगा है कि अब कुछ भी हो सकता है और इसके लिए देशों को तैयार रहना चाहिए.’

उन्होंने कहा, “मौजूदा स्थिति में दुनिया की जो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं उन्हें भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है जबकि कमज़ोर अर्थव्यवस्थाएं चरमरा रही हैं. और ट्रंप का जो बयान है उससे यही लगता है कि या तो उन्हें दीर्घकालिक असर की कोई परवाह नहीं है या उन्हें इसकी समझ नहीं है.”

ऐसे में भारत की रणनीति क्या होगी, इस पर वो कहते हैं, “भारत अपने तेल आयात का डायवर्सिफ़िकेशन करता रहा है. जब यूक्रेन का युद्ध शुरू हुआ तो भारत ने रूस से भारी मात्रा में तेल लेना शुरू कर दिया, जबकि उसके पहले महज क़रीब 2 प्रतिशत ही तेल आयात करता था.

वो कहते हैं, “उस समय भारत ने ये सबक लिया था. लेकिन इस समय मजबूरी ये है कि संघर्ष के दायरे में पश्चिम एशिया आ गया है और यह वैश्विक तेल बाज़ार का केंद्र है तो ऐसे में इसका असर होना लाज़िमी है.”

उनके अनुसार, “एक समय कहा जा रहा था कि लैटिन अमेरिकी देश वेनेज़ुएला से तेल आयात होगा, लेकिन यह कितना हो पाता है, ये आने वाले समय में ही पता चलेगा.”

सरकार ने उठाना शुरू किए एहतियाती क़दम

एलपीजी

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रूस से तेल ख़रीद के लिए अमेरिका अब खुद कह रहा है लेकिन कई मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि रूसी तेल लेकर समंदर में फंसे तेल टैंकर पहले तो भारत की ओर बढ़ रहे थे लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल के दाम में उछाल आने पर अब इस पर प्रीमियम भी देना पड़ सकता है.

इसके बाद ख़बरें आ रही हैं कि कुछ तेल टैंकर दूसरे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों की ओर लौट हो रहे हैं.

ऐसे उहापोह वाले समय में भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं ज़ाहिर की जाने लगी हैं. अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि वैश्विक बाज़ार में अस्थिरता का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

भारत पर इस अनिश्चितता का असर अभी से दिखने लगा है. बीते शनिवार को ही इंडियन ऑयल ने रसोई गैस सिलेंडर के दाम में 60 रुपये और कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडर के दाम में 115 रुपये का इज़ाफ़ा करने की घोषणा की है.

और सोमवार को भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक बयान जारी कर ईंधन आपूर्ति की निगरानी की बात कही है.

मंत्रालय ने बयान में कहा है, ‘मौजूदा भू-राजनीतिक हालात के कारण ईंधन आपूर्ति में बाधा और एलपीजी की आपूर्ति पर दबाव को देखते हुए मंत्रालय ने तेल रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए हैं. अतिरिक्त उत्पादन का उपयोग घरेलू एलपीजी आपूर्ति के लिए किया जाएगा.’

मंत्रालय ने घरों के लिए एलपीजी आपूर्ति को प्राथमिकता दी है और जमाखोरी और कालाबाज़ारी रोकने के लिए 25 दिन का इंटर-बुकिंग अंतराल लागू किया है.

“आयातित एलपीजी से होने वाली आपूर्ति को अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों जैसे ज़रूरी गैर-घरेलू क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जा रही है. रेस्तरां, होटल जैसे दूसरे गैर-घरेलू क्षेत्रों को एलपीजी आपूर्ति से जुड़ी मांगों की समीक्षा के लिए तेल विपणन कंपनियों के तीन कार्यकारी निदेशकों की एक समिति बनाई गई है.”

भारत के पास कितना ऑयल रिज़र्व

तेल भंडार

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अमेरिकी दबाव के चलते भारत को रूसी तेल में कमी आई है हालांकि भारत सरकार का कहना है कि वो बाज़ार के अनुसार अपने ऊर्जा सुरक्षा की ज़रूरतों के आधार पर फैसले लेगी.

लेकिन इस बीच ऊर्जा मामलों के जानकारों ने भारत के ऑयल रिज़र्व को लेकर भी चिंता ज़ाहिर की है.

ऊर्जा मामलों के विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने बीबीसी के एक कार्यक्रम में कहा, “होर्मुज़ जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) से होकर हर दिन 137 जहाज निकलते थे, जबकि बीते कुछ दिनों में सिर्फ दो टैंकर ही निकल पाए. इस क्षेत्र से आने वाले तेल पर भारत, चीन, जापान और आशियान देशों की काफ़ी निर्भरता है. अब यहां दिक्कत चल रही है.”

ग़ौरतलब है कि भारत की जो घरेलू खपत है उसमें 90 प्रतिशत हिस्सा आयात होता है. इसलिए भारत पर दबाव है. हालांकि कभी भी भारत की ओर से नहीं कहा गया कि वो रूस से तेल नहीं खरीदेगा, ट्रंप के दावे के बावजूद.

नरेंद्र तनेजा कहते हैं, “चीन ने पिछले एक साल के अंदर ईरान से हर दिन 10 लाख बैरल तेल ख़रीदा है और उसे इसे अपने स्ट्रैटेजिक रिज़र्व और कॉमर्शियल रिज़र्व में जमा किया है. उन्होंने बीते 365 दिनों में तेल का इतना भंडार इकट्ठा कर लिया है कि आने वाले पांच महीनों में उन्हें इसकी कोई चिंता करने की ज़रूरत नहीं.”

“जहां तक भारत के तेल रिज़र्व की बात है तो यह दुनिया भर के 41 देशों से तेल आयात करता है, जिसमें अमेरिका भी शामिल है. आज हमारे पास जो स्ट्रैटेजिक रिज़र्व हैं, जो ज़मीन के अंदर होते हैं, वो है लगभग 25 दिन की ज़रूरत का. इसके अलावा जो टैंक फॉर्म्स होते हैं, रिफ़ाइनरीज़ में होते हैं, कॉमर्शियल होते हैं. इन सबको मिला लें तो हमारे पास आज 50 दिन का तेल है. लेकिन सारे टैंक को पूरी तरह खाली नहीं कर सकते तो वास्तविकता में हमारे पास 40 दिन का ही तेल है.”

आम लोगों पर असर

तेल

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ट्रंप ने भले ही कहा हो कि दामों में उतार-चढ़ाव बहुत थोड़े समय के लिए है लेकिन जैसे-जैसे युद्ध खिंचेगा इसका असर आम लोगों पर भी आना शुरू होगा.

नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि अभी हमें घबराने की ज़रूरत नहीं है. दरअसल, हमारे लिए चिंता ये नहीं है कि तेल उपलब्ध है कि नहीं, हमारी चिंता है कि क़ीमत क्या होगी. जब ईरान युद्ध शुरू हुआ तो तेल की क़ीमत 65 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं, जो अब बढ़ गई हैं.

“अभी तक सरकार ने क़ीमतें बांध रखी हैं, लेकिन युद्ध लंबा खिंचा तो सरकार की भी एक सीमा होगी. जब सरकार और कंपनियां हाथ खड़े कर दें तब सवाल उठेगा कि सरकार के पास क्या विकल्प होगा और उपभोक्ता के लिए क्या ख़बर आएगी.”

तनेजा आशंका जताते हैं, “अगर यह युद्ध 10 दिनों से आगे खिंचेगा तो स्थिति गंभीर हो सकती है और ये पूरी दुनिया के लिए होगी.”

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ब्रह्म चेलानी ने कहा है कि हो सकता है कि बम गिरना बंद हो जाएं लेकिन रिफ़ाइनरियों और तेल क्षेत्र को जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई होने में महीनों लग जाएंगे.

ब्रह्म चेलानी ने एक्स पर लिखा, “ईंधन डिपो और ईरान में दूसरी नागरिक सुविधाओं पर बमबारी करके अमेरिका और इसराइल उसी तरह की जवाबी कार्रवाई को न्योता दे रहे हैं, और साथ ही एक गहरे वैश्विक ऊर्जा संकट का जोखिम भी बढ़ा रहे हैं.”

“खाड़ी क्षेत्र के ऊर्जा ढांचे को पहले ही नुकसान पहुंच चुका है, जिसमें आने वाली मिसाइलों को रोकने की कोशिश के दौरान हुआ नुकसान भी शामिल है. उत्पादन और प्रसंस्करण में बाधा, सुविधाओं को नुकसान और आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव के कारण तेल और एलएनजी की ऊंची कीमतें कई महीनों तक बनी रह सकती हैं, यहां तक कि तब भी जब बमबारी रुक जाए.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS