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ईरान को लेकर क्या अमेरिका और इसराइल यह मौक़ा चूकने नहीं देना चाहते थे?

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Source :- BBC INDIA

ट्रंप और नेतन्याहू

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अमेरिका और इसराइल का ईरान के साथ एक नए युद्ध में उतरने का फ़ैसला एक बेहद ख़तरनाक स्थिति पैदा कर रहा है. इसके क्या नतीजे होंगे, अनुमान लगाना मुश्किल है.

इसराइल ने अपने हमले को सही ठहराने के लिए ”प्री-एम्पटिव” यानी पहले से बचाव के लिए किया गया हमला बताया.

लेकिन हमले के दौरान मिले सुबूतों से यह नहीं लगता कि यह किसी आने वाले किसी फ़ौरी ख़तरे के जवाब में उठाया गया क़दम था. इसके बजाय यह एक सोचा-समझा अपनी पसंद से चुना गया युद्ध लग रहा है.

इसराइल और अमेरिका का आकलन है कि ईरान का इस्लामी शासन इस समय कमज़ोर स्थिति में है.

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ईरान गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है. इस साल की शुरुआत में प्रदर्शनकारियों पर की गई कड़ी कार्रवाई के बाद देश के भीतर असंतोष है.

पिछले साल के युद्ध में उसकी रक्षा व्यवस्था को भारी नुक़सान हुआ था.

संभव है कि उन्होंने निष्कर्ष निकाला हो कि यह ऐसा अवसर है जिसे गंवाया नहीं जाना चाहिए.

यह क़दम अंतरराष्ट्रीय क़ानून की पहले से डगमगाती व्यवस्था के लिए एक और झटका है.

अपने बयानों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू दोनों ने कहा कि ईरान उनके देशों के लिए ख़तरा है. ट्रंप ने तो इसे वैश्विक ख़तरा बताया है.

इस्लामी शासन निश्चित रूप से उनका कट्टर विरोधी है.

लेकिन अमेरिका और इसराइल की ताक़त की तुलना में ईरान की स्थिति कहीं कमज़ोर है. ऐसे में आत्मरक्षा के क़ानूनी तर्क को लागू करना कठिन दिखाई देता है.

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युद्ध एक राजनीतिक क़दम होता है. एक बार सशस्त्र संघर्ष शुरू हो जाए तो उसे नियंत्रित करना स्वाभाविक रूप से कठिन होता है. इसलिए नेताओं के सामने साफ़ और स्पष्ट लक्ष्य होना ज़रूरी है.

बिन्यामिन नेतन्याहू कई दशकों से ईरान को इसराइल का सबसे ख़तरनाक दुश्मन मानते रहे हैं.

उनके लिए यह ईरान के शासन और ईरान की सैन्य क्षमता को अधिक से अधिक नुक़सान पहुंचाने का मौका है.

इसी साल के अंत में नेतन्याहू को आम चुनाव का भी सामना करना है.

हमास के साथ पिछले दो साल के युद्ध से यह संकेत मिला है कि वे मानते हैं कि युद्ध के समय उनकी राजनीतिक स्थिति मज़बूत होती है.

डोनाल्ड ट्रंप के लक्ष्य समय-समय पर बदलते रहे हैं. जनवरी 2026 में उन्होंने ईरान में प्रदर्शनकारियों से कहा था कि मदद रास्ते में है.

उस समय अमेरिकी नौसेना का बड़ा हिस्सा वेनेज़ुएला के नेता को हटाने के अभियान में लगा हुआ था, इसलिए उनके पास सीमित सैन्य विकल्प थे.

अमेरिका ने पहले इस क्षेत्र में दो विमानवाहक पोत समूह और ज़मीन से मार करने वाली बड़ी सैन्य ताक़त झोंकी. इसके बाद ट्रंप ने ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं के ख़तरे पर ज़ोर दिया.

हालांकि पिछले साल की गर्मियों के युद्ध के बाद वे कह चुके थे कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम “पूरी तरह नष्ट” कर दिया गया है.

ईरानी शासन हमेशा से परमाणु हथियार बनाने की मंशा से इनकार करता रहा है.

लेकिन उसने यूरेनियम को ऐसे स्तर तक एनरिच किया है, जिसका परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में कोई सिविल इस्तेमाल नहीं है.

कम से कम ऐसा लगता है कि वह बम बनाने का विकल्प अपने पास रखना चाहता है.

अपने वीडियो संदेश में ट्रंप ने ईरानी जनता से कहा कि “आज़ादी की घड़ी” आ गई है.

नेतन्याहू ने भी कहा कि यह युद्ध ईरान की जनता को शासन बदलने का अवसर देगा. लेकिन ऐसा होगा ये बिल्कुल भी तय नहीं है.

केवल हवाई हमलों के कारण किसी शासन के गिरने का कोई उदाहरण नहीं है.

2003 में इराक़ के सद्दाम हुसैन को एक बड़े अमेरिकी नेतृत्व वाले ज़मीनी आक्रमण से हटाया गया था.

2011 में लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी को विद्रोही बलों ने हटाया, जिन्हें नेटो और कुछ अरब देशों की हवाई सहायता मिली थी.

दोनों ही मामलों में राज्य व्यवस्था टूट गई, गृहयुद्ध हुआ और हज़ारों लोग मारे गए. लीबिया आज भी अस्थिर है और इराक़ अब भी उस आक्रमण और उसके बाद हुई हिंसा के परिणामों से जूझ रहा है.

मान लीजिए कि केवल हवाई ताक़त से शासन गिराने का यह पहला उदाहरण बन भी जाए, तब भी इसकी गारंटी नहीं है कि उसकी जगह मानवाधिकारों का सम्मान करने वाली उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था आएगी.

विदेश में कोई विश्वसनीय वैकल्पिक सरकार तैयार नहीं बैठी है.

तेहरान में धमाके

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अमेरिका क्या ईरान को आंकने में चूक कर रहा है?

करीब आधी सदी में ईरानी शासन ने एक जटिल राजनीतिक व्यवस्था बनाई है, जो विचारधारा, भ्रष्टाचार और ज़रूरत पड़ने पर ताक़त के कठोर इस्तेमाल की रणनीति पर टिकी है.

जनवरी में उसने दिखाया कि वह प्रदर्शनकारियों को मारने के लिए तैयार है. उसकी सुरक्षा एजेंसियां सड़कों पर व्यवस्था को चुनौती देने वालों पर गोली चलाने के आदेश का पालन करती हैं.

अमेरिका और इसराइल ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे थे.

इसराइल अपनी रणनीति में टारगेटेड हत्याओं को प्रभावी मानता है.

पिछले दो वर्षों में उसने ग़ज़ा में हमास और लेबनान में हिज़्बुल्लाह के नेताओं और उनके कई सीनियर सदस्यों को मार दिया है.

लेकिन ईरान का इस्लामी शासन अलग है. वह किसी सशस्त्र संगठन का नहीं, बल्कि एक देश का संचालन करता है.

यह एक व्यक्ति पर निर्भर व्यवस्था नहीं है. अगर सर्वोच्च नेता मारे भी जाते हैं, तो उनकी जगह संभवतः कोई दूसरा धार्मिक नेता ले लेगा, जिसे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर का समर्थन मिलेगा.

यह कोर पारंपरिक सेना के साथ-साथ काम करती है और देश के भीतर और बाहर से आने वाले ख़तरों से शासन की रक्षा करने का विशेष दायित्व रखती है.

ट्रंप ने उन्हें हथियार डालने पर सुरक्षा और इनकार करने पर “निश्चित मौत” की चेतावनी दी.

लेकिन इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर के लिए यह प्रस्ताव आकर्षक नहीं लगता.

इस्लामी गणराज्य की विचारधारा और शिया इस्लाम में शहादत की भावना एक स्थायी तत्व है.

ट्रंप राजनीति और जीवन में लेन-देन की सोच को प्रमुख मानते हैं. जैसा कि उनकी किताब “द आर्ट ऑफ द डील” में इसका ज़िक्र है.

लेकिन ईरान के साथ वर्ताव करते समय विचारधारा और आस्था की ताक़त को भी समझना पड़ता है. इसे मापना कहीं अधिक कठिन है.

इस साल की शुरुआत से यह संकट गहराता गया और अमेरिका ने अपनी सैन्य तैयारी बढ़ानी शुरू की.

ऐसे संकेत थे कि ईरान का नेतृत्व युद्ध को लगभग अनिवार्य मान रहा था.

वे बातचीत में शामिल हुए यह जानते हुए कि पिछले साल भी बातचीत चल रही थी, जब इसराइल ने हमला किया और अमेरिका भी शामिल हुआ.

वे अमेरिका या इसराइल पर भरोसा नहीं करते. अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने ईरान परमाणु समझौते यानी जेसीपीओए, से अमेरिका को अलग कर लिया था.

इस समझौते ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाई थी और यह ओबामा प्रशासन की प्रमुख विदेश नीति उपलब्धि थी.

संकेत मिले थे कि ईरान शायद किसी नए समझौते का इंतज़ार कर सकता है. लेकिन अमेरिका उसकी मिसाइल परियोजना और क्षेत्रीय सहयोगियों को समर्थन पर भी कड़ी पाबंदियां चाहता था.

ईरान को ये नामंज़ूर था, क्योंकि इसे आत्मसमर्पण जैसा कदम माना गया.

उनके नेतृत्व के अनुसार अगर वे अपनी मिसाइलें और सहयोगियों को छोड़ देंगे तो शासन परिवर्तन का ख़तरा और बढ़ सकता है.

अब ईरान के नेता कर रहे होंगे कि इस युद्ध को कैसे झेला जाए, कैसे बचा जाए और इसके परिणामों को कैसे संभाला जाए. सऊदी अरब जैसे पड़ोसी देश इस अनिश्चितता और संभावित परिणामों से चिंतित होंगे.

मध्य पूर्व पहले से ही अस्थिर और हिंसक क्षेत्र है. ऐसे में नए और तीव्र युद्ध का भड़कना पूरे क्षेत्र और दुनिया की अस्थिरता को और गहरा कर सकता है.

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SOURCE : BBC NEWS