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आरा से लखनऊ तक अंग्रेज़ों को चुनौती देने वाले कुँवर सिंह की कहानी

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Source :- BBC INDIA

कुँवर सिंह पर लिखी किताब का कवर

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी
  • 19 फ़रवरी 2026, 11:36 IST

  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

फ़्रांसिस बुकानन ने अपनी किताब ‘एन अकाउंट ऑफ़ द डिस्ट्रिक्ट्स ऑफ़ बिहार एंड पटना’ में लिखा था, “सन 1812 में आरा शहर में कुल 2775 घर थे और औसतन एक घर में आठ लोग रहते थे.”

”उस हिसाब से शहर की कुल आबादी थी करीब 22 हज़ार. तब शहर में दो अच्छी सड़कें हुआ करती थीं. कलक्टर की एक कोठी थी और सर्जन का एक बंगला था. शहर के बीचोबीच एक जामा मस्जिद थी.”

25 जुलाई, 1857 को दानापुर में सिपाहियों ने विद्रोह किया था. उस दिन तक आरा शहर शांत था. रविवार की रात यानी 26 जुलाई की रात भी शहर में कोई हलचल नहीं थी, यहां तक कि सोमवार की सुबह भी.

प्रसन्न कुमार चौधरी अपनी किताब ‘1857, बिहार में महायुद्ध’ में लिखते हैं, “अचानक बाग़ी सिपाहियों ने आरा के पूर्वी कोने से शहर में प्रवेश किया. सैनिकों के साथ शहर के निम्न वर्ग के लोग भी शामिल हो गए. सिपाहियों ने जेल तक मार्चपास्ट किया और जेल का गेट खोल दिया.”

”पलक झपकते ही पाँच सौ क़ैदी जेल से मुक्त हो गए. इसके बाद विद्रोहियों ने ख़ज़ाने से करीब 85 हज़ार रुपए लूट लिए. 29 जुलाई को उन्होंने अहमद अली नाम के दारोगा को मार दिया. शाहाबाद के मजिस्ट्रेट ने सुना, रेलवे इंजीनियर बायल की कोठी घेरने वाले सिपाही चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे कि वे कुंवर सिंह के हुक्म का पालन कर रहे हैं.”

”बाग़ी सिपाहियों ने आरा पहुंचने के दूसरे दिन मुनादी पिटवाई, ‘ख़ल्के ख़ुदा, मुल्क देनदारों का, हुक्म बाबू कुँवर सिंह का, प्रजा अपना काम-काज जारी रखे. झगड़ा सिर्फ़ बादशाह यानी अंग्रेज़ों से है.”

27 जुलाई से 2 अगस्त तक यानी एक सप्ताह तक आरा पर बाग़ियों का क़ब्ज़ा रहा. इसके बाद मेजर आयर की सेना ने आरा पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया था.

शहर के सभी निवासियों से अपने हथियार जमा कराने का आदेश दिया गया और कुछ भारतीय सैनिकों को फांसी दे दी गई. कुँवर सिंह की हवेली और मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया.

जेबी मेल्सन और जेडब्ल्यू के जैसे इतिहासकार मानते हैं कि आज़ादी की लड़ाई में कुँवर सिंह के शामिल होने का कारण उनकी आर्थिक बदहाली थी जिसमें ब्रितानी सरकार मदद नहीं कर रही थी, लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इसके पीछे भारतीय सैनिकों और स्थानीय लोगों का दबाव था.

कुँवर सिंह का जन्म सन 1782 में जगदीशपुर में हुआ था. अपने पिता साहबज़ादा सिंह की मृत्यु के बाद सन 1826 में कुँवर सिंह गद्दी पर बैठे थे. वह जन्म से ही स्वतंत्र प्रकृति के थे, यहां तक कि अपने पिता साहबज़ादा सिंह से भी उनके विचार नहीं मिलते थे.

कुँवर सिंह घोड़ा चलाने में काफ़ी निपुण थे और बिगड़ैल से बिगड़ैल घोड़े को साध लेना उनके लिए आम बात होती थी. डुमरांव राज के बाद सबसे बड़ी ज़मींदारी कुँवर सिंह की थी जिसमें पीरो, नोनौर, बिहिया, भोजपुर और सासाराम शामिल थे. कुंवर सिंह की बहुत ज़मीन-जायदाद थी.

लोगों के बीच लोकप्रिय

कुंवर सिंह ने 13 अगस्त, 1857 से 22 अप्रैल, 1858 तक लगभग 9 महीने का लंबा मार्च किया था. अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बिहार में जब जन विद्रोह का बिगुल बजा, तो 75 साल के इस बुज़ुर्ग ने गज़ब की ऊर्जा दिखाई.

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कुँवर सिंह की माली हालत ख़राब थी लेकिन जनहित के कामों में धन देने के लिए उन्होंने कभी कंजूसी नहीं की.

केके दत्त अपनी किताब बायोग्राफ़ी ऑफ़ कुँवर सिंह एंड अमर सिंह में लिखते हैं, “कुँवर सिंह की उप-पत्नियों में एक थीं धरमन बीबी. धरमन बीबी के बारे में कहा जाता है कि वह भी कुँवर सिंह के साथ उनके मार्च में शामिल थीं. उनकी मृत्यु भी लॉन्ग मार्च के दौरान बांदा में हुई थी. धरमन बीबी के नाम पर कुँवर सिंह ने आरा और जगदीशपुर में दो मस्जिदें बनवाईं थीं.”

पटना के कमिश्नर रहे विलियम टेलर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था, “कुँवर सिंह एक उच्च ख़ानदान के उदार और लोकप्रिय ज़मींदार थे और उनकी रियाया उनसे बहुत स्नेह करती थी.”

नौ महीने लंबा मार्च

1857 के विद्रोह के समय की एक तस्वीर

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कुँवर सिंह ने 13 अगस्त, 1857 से 22 अप्रैल, 1858 तक लगभग 9 महीने का लंबा मार्च किया था. अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बिहार में जब जन विद्रोह का बिगुल बजा, तो 75 साल के इस बुज़ुर्ग ने गज़ब की ऊर्जा दिखाई.

इस दौरान कुँवर सिंह के पीछे ब्रितानी फ़ौज लगी रही, लेकिन अंग्रेज़ उन्हें गिरफ़्तार करने में कामयाब नहीं हो सके. इस दौरान कुँवर सिंह के बाग़ियों ने मिलमैन, ली ग्रैंड, लुगार्ड और ब्रिगेडियर डगलस को बुरी तरह से पराजित किया.

के एंड मैलेसन अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन म्यूटिनी’ में लिखते हैं, ‘कुँवर सिंह युद्धकला में पारंगत थे. अगर वह रणनीतिकार भी हुए होते तो कुछ और बात होती.’

रीवा पहुंचे कुँवर सिंह

जगदीशपुर में लगातार जारी हमलों के बीच कुँवर सिंह ने सासाराम की तरफ़ कूच किया. वह पहले सासाराम से दस मील उत्तर नोखा पहुंचे. 20 अगस्त को वह रोहतास पहुंच गए. पटना के कमिश्नर ने उन्हें रोकने के लिए 150 सैनिकों को रोहतास भेजा. कुँवर सिंह के साथ तब एक हज़ार सैनिक, चार हाथी , 14 ऊँट और ढेरों घोड़े थे लेकिन उनके पास गोला-बारूद नहीं था.

दो सितंबर को कुँवर सिंह रीवां की तरफ़ बढ़ गए. वहाँ के राजा रघुराज सिंह उनके रिश्तेदार थे लेकिन वह अंग्रेज़ों के पक्षधर थे. जब कुँवर सिंह रीवां से आठ मील दूर रह गए तो रघुराज सिंह ने उन्हें पत्र लिखा कि वह राज्य की सीमा में प्रवेश न करें. लेकिन कुँवर सिंह ने उनकी बात नहीं मानी. रघुराज महल छोड़कर निकल गए. नौ सितंबर को नागपुर के डिप्टी कमिश्नर ने लिखा, “रीवां का राजा असहाय स्थिति में हो गया और जब विद्रोही पहुंचे तो वह उनका प्रतिरोध नहीं कर सका.”

कानपुर होते हुए लखनऊ पहुंचे

30 सितंबर को कुँवर सिंह बांदा पहुंचे. 20 अक्तूबर को वह कालपी के लिए रवाना हुए. वहाँ करीब एक माह रुककर उन्होंने ग्वालियर के विद्रोहियों का इंतज़ार किया. फिर उन्हें अक्तूबर के मध्य में कानपुर से 50 मील दूर और फिर 23 अक्तूबर को कानपुर से 36 मील दूर जालौन-कालपी मार्ग पर देखा गया. कानपुर में विद्रोही सेनाओं को हार का सामना करना पड़ा.

कानपुर की पराजय के बाद कुँवर सिंह लखनऊ गए, जहाँ वह मार्टिनियर कालेज के एक भवन में करीब डेढ़ महीना रहे. लखनऊ की बेगम हज़रत महल ने कुँवर सिंह के पास कीमती उपहार भेजे. इसमें दो तोपें, कई हाथी, पोशाकें और दस हज़ार रुपए नक़द थे.

तोप के गोले से हुए घायल

अंग्रेज़ भी कहा करते थे  कि ब्रिटिश शक्ति के लिए यह संयोग था कि कुँवर सिंह 75 साल के थे. अगर वे 40 साल के होते तो क्या होता (प्रतीकात्मक तस्वीर)

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फिर कुँवर सिंह का काफ़िला फ़ैज़ाबाद के रास्ते आज़मगढ़ की तरफ़ बढ़ा. 26 मार्च, 1858 को आज़मगढ़ पर विद्रोहियों ने कर्नल मिलमैन को हराकर कब्ज़ा कर लिया.

22 अप्रैल, 1858 के कुँवर सिंह एक हज़ार पैदल सैनिकों और कुछ घुड़सवारों के साथ वापस जगदीशपुर पहुंच गए.

सीई बकलैंड अपनी किताब ‘बंगाल अंडर लेफ़्टिनेंट गवर्नर्स’ में लिखते हैं, “जनरल लुगार्ड और डंबर की अंग्रेज़ पलटन उनका पीछा करती चली आ रही थी. यहाँ तक कि जिस गाँव में आधी रात तक कुँवर सिंह की सेना टिकी रहती, उसी गांव में सुबह डंबर की सेना पहुंच जाती. आगे गंगा का किनारा पड़ता था जहाँ से कुँवर सिंह पार उतरने वाले थे. अंग्रेज़ों ने सारी नावें डुबो दी थीं और ढिंढोरा पिटवा दिया था कि अगर किसी ने कुँवर सिंह की गंगा पार करने में मदद की तो वो अंग्रेज़ी सरकार के कोप का भाजन बनेगा.”

बकलैंड आगे लिखते हैं, “सुबह होते ही जब डंबर गंगा के किनारे पहुंचा तो देखा कि कुँवर सिंह पहले ही गंगा पार कर चुके हैं. उसने निशाना साधकर कुँवर सिंह के हाथी पर तोप का गोला छोड़ा, दो व्यक्तियों के साथ कुँवर सिंह भी आहत हुए. शरीर में ज़हर न फैले इसलिए उन्होंने कमर से तलवार निकाली और अपनी घायल बाँह काटकर गंगा में डाल दी. चार दिन बाद 26 अप्रैल, 1858 को कुँवर सिंह की आँखें हमेशा के लिए मुंद गईं.”

अंग्रेज़ों ने कुँवर सिंह की युद्ध कला से परेशान होकर उन्हें पकड़ने के लिए 25 हज़ार रुपए का पुरस्कार घोषित किया था लेकिन किसी को उन्हें पकड़वाने का साहस नहीं हुआ क्योंकि एक तो वह ख़ुद सतर्क रहते थे और दूसरे कोई भी उनसे शत्रुता नहीं रखता था.

इलाके से बाहर अंग्रेज़ों को ललकारा

डाक्टर सुभाष वर्मा अपनी किताब ‘कुँवर सिंह और 1857 की क्रांति’ में लिखते हैं, “1857 के विद्रोही नेताओं में कुँवर सिंह एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अंग्रेज़ों के हमले का इंतज़ार नहीं किया. उन्हें जहाँ भी अंग्रेज़ों की कमज़ोरी का पता चला, उन्होंने वहाँ हमला बोला. यही नहीं, कुँवर सिंह ने अपने क्षेत्र के बाहर भी अंग्रेज़ों को चुनौती दी, जबकि बाकी विद्रोही नेता अपने क्षेत्र तक सिमट कर रह गए.”

कुँवर सिंह को सावरकर ने अपनी किताब ‘द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस, 1857’ में गुरिल्ला युद्ध का सर्वश्रेष्ठ योद्धा माना है. छत्रपति शिवाजी के बाद गुरिल्ला युद्ध के महत्व को कुँवर सिंह ने ही सिद्ध किया था.

राम विलास शर्मा अपनी किताब ‘भारत में अंग्रेज़ी राज और मार्क्सवाद’ में लिखते हैं, “शिवाजी का अनुसरण करने वाले कुँवर सिंह ने कभी अपने सैनिकों को हताश नहीं होने दिया. उन्होंने उनमें अदम्य उत्साह, धैर्य और आत्मविश्वास पैदा किया. अंग्रेज़ भी कहा करते थे कि ब्रिटिश शक्ति के लिए यह संयोग था कि कुँवर सिंह 75 साल के थे. अगर वे 40 साल के होते तो क्या होता.”

सुरेश नीरव ने गगनांचल के 1857 के 150 वर्ष के विशेषांक में लिखा है, “जगदीशपुर के 75 वर्षीय कुँवर सिंह ने न केवल बिहार बल्कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तक जाकर पूरे एक वर्ष तक अंग्रेज़ी हुकूमत को अपनी तलवार का जौहर दिखाया और सिद्ध किया कि बहादुरी और देशभक्ति उम्र की मोहताज नहीं होती.”

जिस तरह से उन्होंने युद्ध संबंधी कला-कौशल, व्यूह रचना, दूरदर्शिता और जुझारुपन का परिचय दिया उसने उन्हें नाना साहब, लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे जैसे इतिहास पुरुषों की पंक्ति में ला खड़ा किया.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS