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असम चुनाव: महिलाओं को दिया गया ‘बिहू तोहफ़ा’ हिमंत के लिए कारगर साबित होगा?

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Source :- BBC INDIA

मामोनी दास

गुवाहाटी से तक़रीबन दो घंटे की दूरी पर है कामरूप ग्रामीण ज़िले का रंगिया शहर. यहां के एक कस्बे में बने आधे कच्चे-पक्के से मकान में 55 साल की मामोनी दास रहती हैं.

मामोनी के पति एक बैट्री रिक्शा चालक हैं. हफ़्ते में मुश्किल से पांच से छह सौ रुपए की कमाई होती है. कुल मिलाकर परिवार रोज़ाना के ख़र्चे के लिए भी संघर्ष करता है, इसके बावजूद मोमिना के मन में इस बार बिहू को लेकर अलग ही उत्साह है.

वह कहती हैं, ”थोड़ा इस बार शॉपिंग अच्छे से होगा, बाज़ार वगैरह करेंगे, बच्चों और नाती-पोती को कपड़ा लाएंगे…इस बार खुलकर खर्च कर पाएंगे.”

मामोनी के ऐसा कहने के पीछे की वजह है – नौ हज़ार रुपए, जो बीते 10 मार्च को उनके खाते में क्रेडिट हुए हैं. उन्हें ये रक़म असम सरकार की तरफ़ से दी गई है और इसको पाने वाली वह इकलौती महिला नहीं हैं.

असम सरकार का दावा है कि ‘अरुणोदय योजना’ के तहत बीते 10 मार्च को, यानी चुनाव की घोषणा से महज़ पांच दिन पहले प्रदेश की 40 लाख महिलाओं के बैंक खाते में कुल 3600 करोड़ रुपए पहुंचाए गए.

लाभार्थी महिलाओं ने क्या बताया

डालिमी बोडो

गुवाहाटी के एक सब्ज़ी बाज़ार में हमने दर्जनों महिलाओं से बात की.

इन महिलाओं ने हमें बताया कि अरुणोदय योजना के तहत दो हफ़्ते पहले, उन्हें भी सरकार से नौ हज़ार रुपए की आर्थिक मदद मिली है.

एक महिला कहती हैं, ”जो पैसे मिले उससे थोड़ा घर का काम करवाए हैं, मुर्गी और सुअर भी ख़रीदे हैं…उनको पाल रहे हैं.”

वहीं दूसरी महिला का कहना है, ”अरुणोदय का पैसा घर के कुछ ज़रूरी सामान ख़रीदने में काम आए.”

योजना के प्रभाव पर मामोनी की भी एक राय है.

वह कहती हैं, ”पहले महिलाओं के पास इतने पैसे नहीं होते थे, अब तो जो अरुणोदय मिलता है उससे पॉकेट खर्च भी होता है. पति के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता. कोई बिंदी ही ख़रीदना हो या श्रृंगार की कोई छोटी चीज़ तो पति लोग से मांगना पड़ता था. अब ये चीज़ें हम खुद ख़रीद सकते हैं.”

योजना से जुड़ी महिलाओं तक पहुंची नौ हज़ार-नौ हज़ार की इस राशि के एक हिस्से को हिमंत बिस्वा सरमा ने, सरकार की तरफ़ ने महिलाओं को दिया गया ‘बिहू तोहफ़ा’ बताया है.

पर दूसरी ही तरफ़ वह महिला लाभार्थियों से बीजेपी के लिए वोट करने की अपील भी करते हैं.

वह कहते हैं, ”इस बार हमने सोचा कि अरुणोदय मिलने वाली महिलाओं का बिहू उत्सव पिछली बार के मुकाबले ज़्यादा अच्छा होना चाहिए. इस वजह से हमने फैसला किया कि हम आपको इस बार 9 हज़ार रुपए देंगे. तो वोट किसको देंगे? पक्का बीजेपी को देंगे न?”

चुनाव से ठीक पहले प्रदेश की 40 लाख महिलाओं के खाते में 3600 करोड़ की राशि के भुगतान को विपक्ष चुनावी फ़ायदे के लिए उठाया गया क़दम बता रहा है.

दिसपुर सीट से कांग्रेस उम्मीदवार और नेता मीरा बोरठाकुर गोस्वामी सवाल उठाती हैं, ”हमने देखा कि बिहार में कैसे महिलाओं को चुनाव से पहले 10 हज़ार रुपए बांटे गए. तो ये सत्ता पक्ष के चुनाव जीतने का फ़ॉर्मूला बनता जा रहा है. सरकार महिलाओं को 1200 रुपए देकर वोट ख़रीदने का काम कर रही है और ये बात अब लोगों को समझ आने लगी है. इसलिए इस बार…लोग बीजेपी के ख़िलाफ़ ही मतदान करेंगे.”

अरुणोदय-बड़ा चुनावी दांव?

विजय गुप्ता

अरुणोदय योजना की शुरुआत साल 2020 में हुई थी. तब प्रदेश में एनडीए की सरकार ही थी लेकिन मुख्यमंत्री सरबानंद सोनेवाल थे. योजना के तहत वंचित तबके की महिलाओं को 830 रुपए प्रति महीने मिलते थे.

साल 2021 में जब हिमंत बिस्वा सरमा मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने कुछ सालों बाद प्रति माह मिलने वाली इस राशि को 830 से बढ़ाकर 1250 कर दिया और नई महिला लाभार्थियों को भी योजना से जोड़ते चले गए.

मार्च महीने में सरकार ने कहा कि अब राज्य की 40 लाख महिलाओं तक इस स्कीम का फ़ायदा पहुंचता है.

लेकिन 1250 से सीधे नौ हज़ार रुपए का कैश ट्रांसफ़र एक बड़े इलेक्शन दांव से जोड़कर देखा जा रहा है. हालांकि सेंट्रल गुवाहाटी से बीजेपी के उम्मीदवार और पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता इससे इनकार करते हैं.

बीबीसी न्यूज़ हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा, ”अरुणोदय कोई नई स्कीम नहीं है. राज्य में साल 2020 से ही हम इसे चला रहे हैं. पहले इसका लाभ प्रदेश की 24 लाख महिलाओं को मिलता था. हमने इसे 40 लाख करने का फ़ैसला किया, पर नए लोगों को जोड़ने की एक प्रक्रिया होती है, वेरिफ़िकेशन किया जाता है इसलिए दो महीने के लिए पुराने लोगों को होने वाली मासिक भुगतान पर रोक लगानी पड़ी और फिर जब सारी प्रक्रिया पूरी हो गई तो दो महीने की बकाया राशि के साथ ही हमारी सरकार ने महिलाओं को एडवांस पैसे क्रेडिट किए.”

दरअसल, मार्च महीने में महिलाओं को मिले 9 हज़ार रुपये के पीछे का गणित ये है कि सरकार ने इस साल दो महीने के लिए अरुणोदय के भुगतान पर रोक लगा दिया था.

मार्च के महीने में जब पैसे क्रेडिट किए गए…तो महिलाओं को दो महीने की बकाया राशि तो दी ही गई, दो महीने की एडवांस रकम और अतिरिक्त चार हज़ार रुपए, बिहू गिफ़्ट बताकर सरकार की तरफ़ से दिए गए.

असम में अन्य योजनाएं

नीलिमा दास

हिमंत बिस्वा सरमा सरकार की यह फ़्लैगशिप अरुणोदय योजना आज असम की राजनीति के केंद्र में है.

वह इसे अपनी ‘बड़ी उपलब्धि’ बताते हैं और दावा करते हैं कि महिलाओं को केंद्र में रखकर शुरू किया गया ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफ़र का ये मॉडल असम से ही शुरू हुआ था.’

हालांकि अरुणोदय अकेली ऐसी कैश ट्रांसफ़र योजना नहीं है जिसे असम सरकार महिलाओं को केंद्र में रखकर चला रही है.

महिलाएं छोटा कारोबार शुरू कर सकें, इसके लिए सरकार ने बीते साल महिला उद्यमिता रोज़गार योजना की शुरुआत की थी.

इसके तहत महिलाओं को अपना छोटा व्यवसाय या रोज़गार का साधन स्थापित करने के लिए सरकार की तरफ़ से 10 हज़ार रुपये की शुरुआती मदद दी जा रही है.

इस योजना का लाभ पाने वाली जितनी भी महिलाओं से हमने बात की, उनमें से ज़्यादातर ने इन पैसों को मुर्गी, बकरी या फिर सुअर पालन से जुड़े व्यवसाय में निवेश किया है.

दूसरी तरफ़ आर्थिक रूप से कमज़ोर छात्राओं के लिए सरकार ने निजुत मोइना और जिबोन प्रेरणा जैसी योजनाएं चलाई हुई हैं. इसके तहत हाई स्कूल से लेकर पोस्ट ग्रेजुएशन तक छात्राओं को हर महीने आर्थिक सहायता मुहैया कराई जाती है.

हाई स्कूल के दौरान एक हज़ार रुपए प्रति महीने, ग्रेजुएशन में 1250 रुपए प्रति माह और पोस्ट ग्रेजुएशन में 2500 रुपये हर महीने की मदद दी जाती है.

लेकिन कांग्रेस का कहना है कि इन कैश बेनेफ़िट योजनाओं से राज्य पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है. फिर भी सरकार ने इन योजनाओं को चुनाव जीतने का ‘टूल’ बना लिया है.

क्या कहते हैं जानकार

रत्ना भराली तालुकदार

पिछले सालों के कुछ चुनावों को देखें तो महिलाओं को केंद्र में रखकर शुरू किए गए कैश बेनेफ़िट स्कीम्स बेशक चुनाव जीतने का एक ट्रायड एंड टेस्टेड फ़ॉर्मूला बन गए हैं. पर इस फ़ॉर्मूले का प्रयोग केवल बीजेपी शासित राज्यों में हो रहा है, यह भी कहना ग़लत होगा.

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार गृह लक्ष्मी योजना चलाती है लेकिन अब चूंकि असम में सरकार एनडीए की है और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा हैं, तो क्या उन्हें इन योजनाओं का कोई चुनावी लाभ मिलेगा?

इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार रत्ना भराली तालुकदार कहती हैं, ”एक हद तक इसका लाभ हिमंत को मिलेगा क्योंकि ग्रामीण महिलाएं इस स्कीम से खुश हैं. उनके हाथ में पैसे आ रहे हैं और इसका प्रभाव बेशक चुनाव पर पड़ेगा लेकिन महिलाओं के दृष्टिकोण से देखें तो इस योजना का उन पर कोई लॉन्ग टर्म इम्पैक्ट मैं नहीं देखती.”

“सवाल उठता है क्यों? तो अरुणोदय के तहत मिलने वाले पैसे पूरी तरह अन-प्रोडक्टिव पैसे हैं. यानी इन पैसों के बदले महिलाओं को कुछ नहीं करना पड़ता. तरुण गोगोई के कार्यकाल में भी महिलाओं को केंद्र में रखकर योजनाएं चलाई जाती थीं, लेकिन उन योजनाओं के तहत महिलाओं को पैसे के बदले रोज़गार के अवसर दिए जाते थे, जिसका प्रभाव दीर्घकालिक होता है.”

वो कहती हैं, “असम जैसे ग़रीब राज्य में एक के बाद एक कैश बेनेफ़िट स्कीम चलाना कोई समझदारी भरा फ़ैसला नहीं है. सरकार के पास पैसे नहीं हैं, पूरा काम लोन पर हो रहा है.”

कांग्रेस की घोषणाओं का इंतज़ार

असम कांग्रेस

वहीं वरिष्ठ पत्रकार परेश मालाकार भी मानते हैं कि हिमंत को इन योजनाओं का चुनावी फ़ायदा ज़रूर मिलेगा.

लेकिन वह यह भी कहते हैं, ”हमें कांग्रेस की घोषणाओं का इंतज़ार करना चाहिए. हमें देखना चाहिए कि वह हिमंत की योजनाओं का काट क्या निकालते हैं. तो प्रभाव कितना होगा, यह इस पर भी निर्भर करता है कि प्रतिद्वंद्वी दल अपनी तरफ़ से क्या घोषणाएं कर रहा है.”

हालांकि असम कांग्रेस भी महिला केंद्रित योजनाओं को अपने मैनिफ़ेस्टो का हिस्सा बनाने के बारे में विचार कर रही है. लेकिन ये योजनाएं कैसी होंगी, इनमें महिलाओं के लिए क्या होगा ये व़क्त आने पर ही पता चलेगा.

दूसरी तरफ़ हिमंत की इन कैश बेनेफिट स्कीम्स के प्रभाव की बात करें तो इसने प्रदेश की महिलाओं और युवाओं को तत्काल राहत तो दी है, लेकिन ज़मीन पर रोज़गार, बुनियादी सुविधाओं के अभाव और महंगाई जैसे मुद्दों को लेकर नाराज़गी भी दिखती है.

कुछ महिलाएं ये भी कहते सुनाई देती हैं कि, ”सरकार एक हाथ से अरुणोदय देकर दूसरे हाथ से गैस के दाम बढ़ा देती है. अरुणोदय का पूरा पैसा तो एक गैस सिलेंडर खरीदने में चला जाता है.”

ऐसे हालात में कैश बेनेफिट्स वाली ये स्कीम्स आख़िरकार किसके लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद साबित होंगी, यही सवाल अब बहस के केंद्र में है.

असम में आगामी नौ अप्रैल को मतदान होने हैं, नतीजे 4 मई को आएंगे.

बात जहां तक महिला मतदाताओं की है तो चुनाव में उनकी भागीदारी भी लगातार मज़बूत रही है.

2021 विधानसभा चुनाव में कुल 2.33 करोड़ मतदाताओं में करीब 1.16 करोड़ महिलाएं थीं.

वहीं वोटिंग के दौरान कई चरणों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों के बराबर या उससे अधिक रहा था, जो राज्य की चुनावी राजनीति में उनकी बढ़ती निर्णायक भूमिका को दर्शाता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

SOURCE : BBC NEWS