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3 घंटे पहले
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ईरान में एक अमेरिकी फ़ाइटर जेट के मार गिराए जाने के बाद लापता क्रू सदस्य को अमेरिकी सेना ने एक जटिल ऑपरेशन में बचा लिया है.
अमेरिकी मीडिया के मुताबिक़ इस मिशन में अमेरिकी सेना के स्पेशल फ़ोर्सेज़ के कई अमेरिकी लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर भी शामिल थे.
रविवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एलान किया कि अमेरिकी एयर फ़ोर्स के एक अफ़सर को अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशंस फ़ोर्सेज़ ने बचा लिया है.
ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, “हमने ईरान के पहाड़ों के काफ़ी अंदर से गंभीर रूप से घायल और बेहद बहादुर एफ़-15 क्रू सदस्य को बचा लिया है.”
लापता एयरमैन को तलाशने के लिए अमेरिकी और ईरानी सैन्य बलों के बीच सर्च एंड रेस्क्यू मिशन की दो दिनों तक होड़ लगी रही.
पिछले सप्ताह शुक्रवार को ख़बर आई कि दक्षिणी ईरान के ऊपर उड़ रहे एक एफ़-15 लड़ाकू विमान को मार गिराया गया.
इस विमान में एक वेपन्स सिस्टम्स ऑफ़िसर और एक पायलट सवार थे. इस एफ़-15ई स्ट्राइक ईगल में सवार अमेरिकी सेना के ये दोनों अधिकारी विमान से इजेक्ट करने में कामयाब रहे. पायलट को उसी दिन बचा लिया गया था, लेकिन दूसरा क्रू सदस्य लापता था.
और ईरान ने इस क्रू मेंबर को ज़िंदा पकड़ने के लिए 66 हज़ार डॉलर (क़रीब 62 लाख रुपये) का इनाम भी घोषित किया था.
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क्रू मेंबर को तो बचा लिया गया लेकिन इसमें अमेरिकी सेना को सैन्य उपकरणों के मामले में भारी क्षति उठानी पड़ी. ईरान की सेना का दावा है कि इस ऑपरेशन के दौरान अमेरिका के दो सी-130 सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान और दो ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर नष्ट कर दिए गए.
यह रेस्क्यू ऑपरेशन बहुत अहम माना गया, क्योंकि इस्लामी क्रांति के दौर में ईरान में अमेरिकी नागरिकों के बंधक बनाए जाने का एक इतिहास रहा है.
साल 1980 में अमेरिका ने तेहरान में अपने दूतावास में फंसे नागरिकों को निकालने के लिए ऑपरेशन ईगल क्लॉ नाम से एक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया था, हालांकि इसे नाकामी का सामना करना पड़ा था.
ईरान बंधक संकट
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फ़रवरी 1979 में ईरान में हुई इस्लामी क्रांति के दौरान रज़ा शाह पहलवी को सत्ता से हटा दिया गया था और आयतुल्लाह ख़ुमैनी के नेतृत्व में धार्मिक निज़ाम ने सत्ता संभाली.
मार्च तक अमेरिका ने तेहरान स्थित अपने दूतावास और कुछ कॉर्पोरेट दफ़्तरों में न्यूनतम स्टाफ़ को छोड़कर ज़्यादातर अमेरिकियों को देश से बाहर निकाल लिया था.
यूएस डिपार्टमेंट ऑफ़ वॉर के एक लेख के मुताबिक़, इस्लामी क्रांति के बाद से कई सप्ताह के दौरान अमेरिका ने अपने 54,000 सैनिकों और नागरिकों को ईरान से बाहर निकाला था.
निर्वासित ईरान के शाह को अमेरिका के राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने 22 अक्तूबर, 1979 को कैंसर का इलाज कराने के लिए अमेरिका आने की अनुमति दे दी, इससे अमेरिका के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा और भड़क गया और चार नवंबर को हज़ारों लोगों की भीड़ ने अमेरिकी दूतावास और अन्य दफ़्तरों पर हमला बोल दिया और 66 अमेरिकियों को बंधक बना लिया.
नवंबर के मध्य तक 13 अमेरिकियों को छोड़ दिया गया, लेकिन 53 को बंदी बनाए रखा गया.
उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के प्रशासन ने इस बंधक संकट का कूटनीतिक हल निकालने की काफ़ी कोशिश की लेकिन जब कोई सफलता नहीं मिली तो अप्रैल 1980 में एक सैन्य रेस्क्यू ऑपरेशन को मंज़ूरी दी गई जिसका नाम था ऑपरेशन ईगल क्लॉ.
ऑपरेशन ईगल क्लॉ
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हालांकि बंधकों की रिहाई के लिए बातचीत के अलावा सैन्य विकल्प पर भी विचार किया जा रहा था और एक समय तो राष्ट्रपति कार्टर ने ये भी धमकी दी थी कि ‘अगर ईरान ने किसी बंधक को मारने की जुर्रत की तो अमेरिका ईरान पर हमला बोल देगा.’
हालांकि अमेरिकी सेना को पहले से लग रहा था कि यह ऑपरेशन बहुत जटिल साबित होने वाला है और ज़रा सी ग़लती से पूरा ऑपरेशन एक दुखद घटनाक्रम में बदल सकता है.
राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने इस अभियान को अंजाम देने की अनुमति दी. विदेश मंत्री साइरस वैंस को लगा कि यह अभियान विफल हो जाएगा, इसलिए उन्होंने कुछ दिनों बाद इस्तीफ़ा दे दिया.
योजना के अनुसार, वायु सेना के तीन एमसी-130 परिवहन विमानों में 132 आर्मी रेंजर्स और डेल्टा फ़ोर्स के सैनिक सवार होने थे और वायु सेना के तीन ईसी-130 विमानों में आपूर्ति और ईंधन ले जाया जाना था. ये विमान ओमान के मसिराह द्वीप से उड़ान भरकर तेहरान से 200 मील दक्षिण-पूर्व में स्थित एक दूरस्थ नमक के मैदान, जिसे डेज़र्ट वन नाम दिया गया था, उस पर उतरने वाले थे.
हमलावर दस्ते में 120 डेल्टा फ़ोर्स ऑपरेटर, 12 रेंजर्स और 15 ईरानी और अमेरिकी फ़ारसी बोलने वाले शामिल थे.
इस दस्ते को, अरब सागर में तैनात यूएसएस निमिट्ज़ एयरक्राफ़्ट कैरियर से आने वाले आठ आरएच-53डी हेलीकॉप्टरों से मिलना था. ईंधन भरने के बाद, ये हेलीकॉप्टर डेल्टा फ़ोर्स को तेहरान से 65 मील (104.6 किलोमीटर) दूर एक पहाड़ी जगह, डेज़र्ट टू, तक ले जाना था जहां उन्हें छिपना था.
अगली रात, सीआईए एजेंट्स को ट्रकों के साथ डेज़र्ट टू पहुंचना था और वहां से अमेरिकी दूतावास की ओर कूच करना था. मुख्य हमला दस्ता दूतावास पर धावा बोलकर बंधकों को छुड़ाता, जबकि अन्य सैनिक इलाक़े की बिजली सप्लाई बंद कर देते ताकि ईरान की ओर से कार्रवाई धीमी हो जाए.
बचाए गए बंधकों को पास के एक फ़ुटबॉल स्टेडियम, शाहिद शिरूदी स्टेडियम में ले जाने की योजना थी, जहां से हेलीकॉप्टर से उन्हें दक्षिण में 35 मील (56.3 किलोमीटर) दूर स्थित मंजरियेह एयरफ़ील्ड ले जाया जाता.
अंत में, अमेरिकी सेना के रेंजर्स एयरफ़ील्ड पर क़ब्ज़ा कर लेते और सी-141 ट्रांसपोर्ट विमानों का इंतज़ार करते, जो बंधकों को सुरक्षित इलाके में ले जाते.
गड़बड़ी कहां हुई?
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ऑपरेशन शुरू होने के बाद एमसी-130 विमान डेज़र्ट वन में सही सलामत पहुंच गया. लेकिन इसके बाद हालात काबू से बाहर होने लगे.
डेज़र्ट वन के पास से गुज़र रही एक बस को रोका गया और उसके यात्रियों को हिरासत में लिया गया. बाद में एक ईंधन टैंकर गुज़रा जो रुका नहीं तो अमेरिकी सैनिकों ने उसे एंटी-टैंक हथियार से उड़ा दिया, जिससे आसपास का इलाक़े में आग के बड़े गोले से उजाला जैसा हो गया. इन हालात में एक पिकअप ट्रक ने दूर से ही अपना रास्ता बदल दिया.
उधर, हेलीकॉप्टर धूल भरी आंधी, जिसे हबूब कहा जाता है, में फंस गए और उनकी दृश्यता इतनी कम हो गई कि आठ में से दो हेलीकॉप्टर वापस लौट गए और एक तकनीकी ख़राबी के कारण बेकार हो गया.
आख़िरकार, सिर्फ पांच हेलीकॉप्टर बचे, जिससे कमांडरों के बीच मतभेद हुआ और करीब ढाई घंटे की चर्चा के बाद मिशन रद्द कर दिया गया और हिरासत में लिए गए बस यात्रियों को छोड़ दिया गया.
अब हमलावर दस्ते को एमसी-130 पर वापस ले जाने की चुनौती थी, ताकि हेलीकॉप्टरों में ईंधन भरा जा सके और वे निमित्ज़ पर लौट सकें.
लेकिन सबसे बड़ा हादसा तब हुआ जब एक हेलीकॉप्टर सी-130 विमान से टकरा गया, जिससे दोनों में विस्फोट हो गया और आठ लोगों (सी-130 के पांच और आरएच-53डी के तीन मरीन सदस्यों) की मौत हो गई.
कमांडरों ने बाकी हेलीकॉप्टरों को वहीं छोड़ देने और सभी को ईसी-130 में सवार होने और मसीराह को तुरंत छोड़ देने का आदेश दिया.
अगले दिन व्हाइट हाउस ने मिशन की नाकामी का एलान किया.
ईरानी टेलीविज़न पर इस मलबे की तस्वीरें दुनिया को दिखाई गईं और बंधकों को अलग-अलग जगहों पर बांट दिया गया ताकि भविष्य में ऐसा ऑपरेशन न हो सके.
ऑपरेशन ईगल क्लॉ के सबक़
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हालांकि ऑपरेशन ईगल क्लॉ नाकाम रहा, लेकिन 24 अप्रैल 1980 की घटनाओं ने अमेरिकी स्पेशल ऑपरेशंस के तरीके को पूरी तरह बदल दिया.
पिछले साल एक समारोह में, एयर फ़ोर्स के कर्नल जेफ़ मैकमास्टर ने कहा कि इस ऑपरेशन के बाद होलोवे रिपोर्ट आई, जिसमें मिशन की कमियों की जांच की गई. इसमें योजना, कमांड और अलग-अलग सेवाओं के तालमेल में खामियां बताई गईं.
उन्होंने कहा कि इस रिपोर्ट का अमेरिकी सेना पर गहरा असर पड़ा और इससे यूनाइटेड स्टेट्स स्पेशल ऑपरेशंस कमांड का गठन हुआ.
यह भी माना जाता है कि इस नाकाम ऑपरेशन का असर जिमी कार्टर के चुनाव पर पड़ा और वह रोनाल्ड रीगन से हार गए.
कैसे छुड़ाए गए बंधक
बीबीसी नॉर्थ अमेरिका संवाददाता सिमी जोलासो की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, ईरान ने अमेरिकी राजनयिकों को 444 दिन तक बंधक बनाकर रखा था.
बंधकों को छुड़ाने के एवज़ में अमेरिका ने तब ईरान पर से कुछ प्रतिबंध हटाए थे. साथ ही 8 अरब डॉलर की ईरानी संपत्ति को अनफ़्रीज़ किया था. यह घटना अमेरिका पर एक गहरी राजनीतिक चोट छोड़ गई थी.
इसके बाद भी ऐसे कई वाक़ये हुए, जब अमेरिका ने अपने लोगों को छुड़ाने के लिए कई बड़े-बड़े क़दम उठाए. कई बार तो अमेरिकी कैदियों की रिहाई के लिए किए गए फ़ैसलों पर विवाद भी हुआ.
साल 2014 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा की सरकार ने अपने सैनिक बोवे बर्गडाहल को छुड़ाने के लिए पांच तालिबान कैदियों को छोड़ा था. बर्गडाल को तालिबान ने 2009 में अफ़ग़ानिस्तान में पकड़ लिया था.
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