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अमेरिका और इसराइल भीषण हमलों के बावजूद ईरान की सत्ता क्यों नहीं बदल पाए

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Source :- BBC INDIA

21 मार्च को तेहरान में आयोजित अमेरिका-इसराइल विरोधी प्रदर्शन के दौरान नारे लगाती एक महिला

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    • Author, सरबास नाज़री
    • पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंंग
  • 27 मार्च 2026, 12:31 IST

  • पढ़ने का समय: 6 मिनट

अमेरिका और इसराइल के भीषण हमलों के बावजूद ईरान की सत्ता ने आंतरिक सुरक्षा पर अपनी पकड़ ढीली नहीं होने दी है. लोगों के मन में लीडरशिप के प्रति गहरी असंतुष्टि के बावजूद लड़ाई के दौरान बड़े पैमाने पर प्रदर्शन नहीं हुए हैं.

कुछ विशेषज्ञ इसे युद्ध शुरू होने के बाद बने दमनकारी माहौल से जोड़ कर देखते हैं. जनवरी में हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों का ईरानी सत्ता ने जिस तरह से दमन किया उसके बाद से वहां लोगों के बीच डर फैला है.

सरकार ने चेकपोस्ट, भारी सुरक्षा तैनाती और रोज़ाना गिरफ्तारियों के ज़रिये नियंत्रण और कड़ा कर दिया है.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, असहमति जताने वालों और यहां तक कि उन लोगों को भी निशाना बनाया जा रहा है जिन पर विदेशी मीडिया को युद्ध से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो देने का आरोप है.

लगभग पूरी तरह इंटरनेट बंद होने से लोगों की संगठित होने की क्षमता और सीमित हो गई है. कम्युनिकेशन, समन्वय और सूचना के प्रवाह पर रोक लगाकर विरोध आयोजित करने वाले नेटवर्क काफी हद तक टूट गए हैं.

वहीं, सरकार समर्थक लोगों को सीमित कनेक्टिविटी देकर सरकार का नैरेटिव ईरान से बाहर तक पहुंचाया जा रहा है.

नतीजा यह है कि सरकार का विरोध न सिर्फ़ जोखिम भरा है, बल्कि लोगों को संगठित करना भी बेहद मुश्किल हो गया है-ख़ासकर युद्ध के समय, जब लोग अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं.

नैरेटिव को कैसे नियंत्रित किया जा रहा है?

कई बड़े नेताओं और अधिकारियों के मारे जाने के बाद भी ईरान में सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ

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इन सभी तरीक़ों के साथ-साथ सरकार युद्ध की धारणा को भी प्रभावित करने की कोशिश कर रही है. अधिकारियों ने इस संघर्ष को इस्लामिक रिपब्लिक के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि ईरान की संप्रभुता पर हमला बताया है.

यह फ़र्क अहम है. सरकार से असंतुष्ट लोग भी बाहरी हमले के समय राष्ट्रवादी भावनाओं से प्रभावित हो सकते हैं. इसे अक्सर ‘रैली-अराउंड-द-फ़्लैग’ प्रभाव कहा जाता है-जो जून 2025 के 12 दिनों के युद्ध में भी देखा गया था.

इससे फ़िलहाल सरकार-विरोधी लामबंदी की संभावना कम होती दिखती है.

सरकारी मीडिया इस नैरेटिव को लगातार मज़बूत कर रहा है-नागरिकों की मौत पर ज़ोर देते हुए और अपने हमलों को डिफ़ेंसिव (रक्षात्मक) बताकर.

साथ ही, सरकार समर्थक रैलियां और प्रदर्शन ‘नियंत्रण, स्थिरता और मज़बूती’ की इमेज पेश करते हैं.

झटके झेलने के लिए बना सिस्टम

लड़ाई में लोगों के उत्साह को बनाए रखने के लिए अधिकारी लगातार सरकार समर्थक प्रदर्शन आयोजित करवा रहे हैं

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टॉप लीडरशिप पर हमलों के बावजूद व्यवस्था के न ढहने की वजह इसकी संरचना है. ईरान का सिस्टम किसी एक व्यक्ति पर आधारित नहीं, बल्कि धार्मिक, सैन्य, राजनीतिक और आर्थिक संस्थाओं के नेटवर्क पर टिका है.

सत्ता कई संस्थाओं में बंटी है- जैसे सेना, धार्मिक नेतृत्व और सुरक्षा एजेंसियां, जिससे किसी शीर्ष नेता के हटने पर भी सिस्टम चलता रहता है.

उत्तराधिकार की औपचारिक और अनौपचारिक व्यवस्थाएं भी निरंतरता बनाए रखने में मदद करती हैं.

इस मज़बूती के केंद्र में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) है. यह सिर्फ़ सेना नहीं, बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा ताकत भी है, जिसकी देशभर में गहरी पकड़ है.

वरिष्ठ कमांडरों के मारे जाने के बावजूद यह संगठन काम करता रहा है और अंदर-बाहर दोनों मोर्चों पर चीज़ों को, लोगों की प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित कर रहा है.

सबसे अहम बात-अब तक सेना या सुरक्षा तंत्र में किसी बड़े पैमाने पर टूट या बग़ावत के संकेत नहीं मिले हैं, जो आमतौर पर किसी शासन के गिरने का बड़ा संकेत होता है.

युद्ध में ‘बचे रहना’ ही रणनीति

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SOURCE : BBC NEWS