Source :- LIVE HINDUSTAN
प्रेमानंद जी महाराज ने भी अपने कई प्रवचनों में महिलाओं के अधिकारों और उनके कर्तव्यों की बात की है। एक सशक्त महिला की भूमिका क्या होती है और असल मायनों में आत्मनिर्भर होना किसे कहते हैं, महाराज जी के विचारों में इसकी अद्भुत व्याख्या देखने को मिलती है।
एक महिला की इस समाज में क्या भूमिका होनी चाहिए, उसके क्या अधिकार हैं, ये सब हमेशा से ही चर्चा का विषय रहा है। फेमिनिज्म यानी महिलाओं के अधिकार और समानता को ले कर बेशक आज ज्यादा डिबेट होती हो, लेकिन ये नया बिल्कुल भी नहीं है। समाज जितना जागरूक हुआ है उतना ही महिलाओं की सशक्त भूमिका पर भी जोर दिया गया है। आध्यात्मिक गुरु श्री प्रेमानंद जी महाराज ने भी अपने कई प्रवचनों में महिलाओं के अधिकारों और उनके कर्तव्यों की बात की है। एक सशक्त महिला की भूमिका क्या होती है और असल मायनों में आत्मनिर्भर होना किसे कहते हैं, महाराज जी के विचारों में इसकी अद्भुत व्याख्या देखने को मिलती है। आइए जानते हैं प्रेमानंद जी महाराज के महिलाओं से जुड़े ऐसी ही विचारों के बारे में।
1) महिलाएं केवल शरीर नहीं, एक विचार और शक्ति हैं, जो समाज को सही दिशा देने का काम करती हैं।
2) हर महिला में एक शक्ति है। यही शक्ति उसे अपनी पहचान बनाने में मदद करती है। इसी शक्ति की वजह से दुनिया में बड़े बदलाव आते हैं।
3) जिस समाज में महिलाओं को समान अधिकार मिलते हैं, वहां समाज की उन्नति निश्चित ही होती है। ऐसे समाज की तरक्की में कोई बाधा नहीं आती।
4) महिलाओं को अपने अधिकार के लिए लड़ना आना चाहिए। जो महिला अपने हक के लिए आवाज उठाती हैं, समाज में बदलाव भी वही ला पाती हैं।
5) महिलाओं का शिक्षित होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उनका आत्मविश्वासी होना भी है। क्योंकि एक महिला की सबसे बड़ी शक्ति उसका आत्मविश्वास ही होती है।
6) जो महिला आगे बढ़ने के सपने देखती है और अपने उस सपने को पूरा करने के लिए जी जान से मेहनत करती है। सफलता की नई परिभाषा ही वही गढ़ती है।
7) एक महिला को अपनी शिक्षा को ही सबसे बड़ा गहना मानना चाहिए। क्योंकि वास्तव में एक शिक्षा ही है जो महिला के जीवन को बदलने में उसकी मदद कर सकती है।
8) महिलाएं पुरुषों से श्रेष्ठ इसलिए भी हैं क्योंकि वे हर परिस्थिति में अपना धैर्य और साहस बनाए रखती हैं। यही उनकी असली ताकत है जो एक समाज को भी ज्यादा मजबूत बनाती है।
9) नारी को कमजोर समझना सबसे बड़ी मूर्खता है। क्योंकि नारी के अंदर अपार शक्ति और सामर्थ्य छिपी होती है। किसी भी मायनों में उन्हें पुरुषों से कम समझना एक बड़ी भूल के सिवा कुछ नहीं है।
10) एक महिला अपना पूरा जीवन अपने परिवार और समाज के लिए समर्पित कर देती है। असल मायनों में देखें तो महिलाएं किसी संत से कम नहीं हैं। उनकी असली ताकत और सामर्थ्य यही है कि वे अपने से ज्यादा दूसरों के विषय में सोच पाती हैं।
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