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7 घंटे पहले
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लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने मोदी सरकार के ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर तीखा हमला किया है. यह परियोजना 81 हज़ार करोड़ रुपये की है.
राहुल गांधी ने कहा, ”ये हमारे जीवनकाल में देश की प्राकृतिक और जनजातीय विरासत के ख़िलाफ़ सबसे बड़े घोटालों और सबसे गंभीर अपराधों में से एक है.”
यह परियोजना भारत के सुदूर दक्षिण-पूर्वी इलाक़ो में स्थित ग्रेट निकोबार आईलैंड में विकसित की जा रही है. इस योजना के तहत ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट, टाउनशिप और पावर प्लांट का निर्माण किया जाएगा.
सरकार इसे ख़ासकर हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की स्थिति मज़बूत करने के लिहाज़ से रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बता रही है.
लेकिन आलोचकों का कहना है कि इस परियोजना से पर्यावरण को भारी नुक़सान हो सकता है.
उनका कहना है कि इससे शॉम्पेन और निकोबारी जनजातियों पर गंभीर असर पड़ सकता है.
राहुल गांधी ने कहा, लाखों पेड़ काटे जाएंगे
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राहुल गांधी ने सरकार के इस प्रोजेक्ट की आलोचना करते हुए एक वीडियो संदेश में कहा, ”सरकार इसे एक ‘प्रोजेक्ट’ कहती है. लेकिन मैंने जो देखा, वह प्रोजेक्ट नहीं है. यहां लाखों पेड़ों को काटने के लिए उन्हें चिह्नित किया गया है. यह 160 वर्ग किलोमीटर में फैले वर्षावन को ख़त्म करने का फ़ैसला है. यह उन समुदायों की अनदेखी है, जिनके घर उनसे छीन लिए गए हैं.”
उन्होंने ग्रेट निकोबार आईलैंड के जंगलों का दौरा करते हुए कहा कि वहां के पेड़ लोगों की “यादों से भी पुराने” है.
उन्होंने यह भी कहा कि यहां के जंगल पीढ़ियों से पले-बढ़े हैं और यहां रहने वाले खूबसूरत लोगों से उनके हक़ की चीज छीनी जा रही है.
उन्होंने कहा, ”इस द्वीप पर रहने वाला हर एक व्यक्ति इस परियोजना के ख़िलाफ़ है, लेकिन उनसे इस परियोजना के बारे में पूछा ही नहीं गया है. उन्हें यह भी नहीं पता कि उनकी ज़मीन के बदले उन्हें क्या मुआवजा मिलेगा. और अब मुझे समझ में आ रहा है कि सरकार मुझे यहां आने क्यों नहीं देना चाहती थी और मुझे यहां पहुंचने से रोकने के लिए सरकार ने इतना बड़ा प्रयास क्यों किया.”
राहुल गांधी ने इसे “खुलेआम लूट” बताया और कहा कि द्वीप के निवासियों ने उनसे इस मुद्दे को संसद में उठाने के लिए कहा है.
उन्होंने कहा, “मैं खुशी से ऐसा करूंगा. यह बात पूरे देश को बताई जानी चाहिए, ख़ासकर युवाओं को, क्योंकि यह उनका भविष्य है.”
मंगलवार को राहुल गांधी निकोबार ज़िले के कैंपबेल बे पहुंचे थे, जहां उन्होंने परियोजना के ख़िलाफ़ विरोध कर रहे आदिवासी नेताओं से मुलाक़ात की.
कुछ आदिवासी समुदायों ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार ने पारदर्शिता नहीं बरती, पर्यावरणीय जोखिमों को नज़रअंदाज़ किया और आदिवासी अधिकारों की लगातार अनदेखी की.
हिंद महासागर में चीन को जवाब?
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दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस परियोजना का विरोध करने पर राहुल गांधी को घेरा है.
बीजेपी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, ”भारत का सामरिक हथियार, और राहुल गांधी कर रहे हैं विरोध. अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर मोदी सरकार 92,000 करोड़ रुपये का ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ बना रही है.”
”यह सिर्फ एक बंदरगाह नहीं, यह भारत की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा है. यह हिंद महासागर में भारत की ताक़त का एलान है, यह चीन को सीधा जवाब है. लेकिन, चीन नहीं चाहता यह प्रोजेक्ट बने, और हैरानी की बात यह है कि राहुल गांधी भी नहीं चाहते.”
बीजेपी ने लिखा, ”जब देश आगे बढ़ने की बात करता है, तो कांग्रेस रोड़े अटकाती है, जब भारत मज़बूत होने की बात करता है, तो राहुल गांधी विरोध में खड़े हो जाते हैं. अब सवाल यह है कि आख़िर किसके इशारे पर हो रहा है यह विरोध? किसके हित में है भारत की सुरक्षा को कमजोर करना?”
बीजेपी नेता और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी इस सवाल पर राहुल गांधी को घेरा.
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, ”फिर सामने आया कांग्रेस का चीन-प्रेम. ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की समुद्री सुरक्षा और आर्थिक ताक़त का प्रतीक है,उसका विरोध करने के पीछे राहुल गांधी का टूलकिट एजेंडा उजागर हो गया है. सवाल यह है, जो प्रोजेक्ट चीन को कमजोर करे, वही कांग्रेस को क्यों खलता है.”
ग्रेट निकोबार का इलाक़े से सबसे अहम समुद्री मार्ग मलक्का स्ट्रेट है. जियोपॉलिटिकल तौर पर देखें तो ये बेहद अहम इलाक़ा है.
भारत और चीन दोनों के लिए हिंद महासागर में वर्चस्व कायम करना अहम रणनीतिक लक्ष्य है.
ख़ासकर ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को चीन की ‘मोतियों की माला’ (स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स) स्ट्रेटजी के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह परियोजना निवेश ला सकती है, व्यापार बढ़ा सकती है और भारत की समुद्री ताक़त को मजबूत कर सकती है. ठीक वैसे ही जैसे हॉन्गकॉन्ग ने चीन को मजबूती दी है.
क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट
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166 वर्ग किलोमीटर में फैली इस परियोजना में एक ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, एक बिजली संयंत्र, एक हवाई अड्डा और एक नया शहर बनेगा. ये इस इलाक़े को हिंद महासागर और स्वेज नहर और दूसरे अहम वैश्विक व्यापारिक मार्ग से जोड़ने के लिए डिजाइन किए गए हैं.
सरकार का कहना है कि दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग मलक्का स्ट्रेट के पास बन रही इस परियोजना से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा.
सरकार का अनुमान है कि 30 वर्षों में परियोजना पूरी होने तक द्वीप पर लगभग साढ़े छह लाख लोग रह रहे होंगे.
विशेषज्ञों का मानना है कि अरबों डॉलर की यह योजना क्षेत्र में चीन के बढ़ते असर के मुक़ाबले के लिए भारत के लक्ष्य का एक हिस्सा है.
प्रोजेक्ट से द्वीप की जनजातियों को कैसा ख़तरा?
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लेकिन इस योजना ने उन द्वीपवासियों के बीच चिंता पैदा कर दी है, जिन्हें अपनी ज़मीन, संस्कृति और जीवन शैली के खोने का डर है. उन्हें डर है कि यह परियोजना उन्हें विलुप्त होने के कगार पर पहुंचा सकती है.
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह दुनिया की कुछ सबसे अलग-थलग और कमजोर जनजातियों का घर है, जिनमें से पांच समूहों को “विशेष रूप से कमजोर” के रूप में वर्गीकृत किया गया है.
इनमें जारवा, उत्तरी सेंटिनली, ग्रेट अंडमानी, ओंगे और शॉम्पेन जनजातियां शामिल हैं.
जारवा और उत्तरी सेंटिनली जनजातियाँ काफ़ी हद तक बाहरी दुनिया से संपर्क में नहीं आई हैं, वहीं ग्रेट निकोबार द्वीप समूह के लगभग 400 शॉम्पेन लोगों को भी बाहरी दबावों के कारण अपनी जीवनशैली खोने के ख़तरा है
यह एक खानाबदोश जनजाति है, जिनमें से अधिकांश लोग जंगल के अंदरूनी हिस्सों में रहते हैं. उनकी संस्कृति के बारे में ज़्यादा कुछ पता नहीं है क्योंकि उनमें से बहुत कम लोगों का ही बाहरी दुनिया से संपर्क रहा है.
पर्यावरणविदों का कहना है कि इस परियोजना से पर्यावरण को बहुत अधिक कीमत चुकानी होगी.
भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने कहा है कि परियोजना के लिए द्वीप के कुल क्षेत्रफल का केवल 130 वर्ग किलोमीटर या 14 फ़ीसदी हिस्सा ही साफ किया जाएगा.
फिर भी यहां लगभग साढ़े नौ लाख से अधिक पेड़ हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है.
पर्यावरणविदों ने जताई चिंता
साल 2024 में 39 अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों (जीनोसाइड एक्सपर्ट्स) ने चेतावनी दी कि ये प्रोजेक्ट शोंपेन जनजाति के लिए डेथ सेंटेंस की तरह हो सकता है.
उनका कहना है कि इस प्रोजक्ट की वजह से यहां बाहरी आबादी बढ़ेगी जिससे बीमारियां फैल सकती हैं. और इस वजह से जनजातीय अस्तित्व पर ख़तरा हो जाएगा.
उन्होंने इसके पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव की बात कही थी.
इस प्रोजेक्ट के बारे में बात करते हुए इकोलॉजिस्ट माधव गाडगिल ने बीबीसी मराठी को बताया था, “सरकार हमेशा यह दावा करती है कि जंगल का केवल एक हिस्सा ही साफ़ किया जाएगा. लेकिन जो इन्फ्रास्ट्रक्चर आप बना रहे हैं, उससे ज़्यादा प्रदूषण पैदा होगा. उसका असर पूरे हैबिटेट पर पड़ेगा.”
इकोलॉजिस्ट का कहना है कि द्वीप के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित गलाथी बे पर इसका असर पड़ेगा, जो सदियों से विशाल लेदरबैक समुद्री कछुओं के अंडे देने (नेस्टिंग) का स्थान रहा है.
सोशल इकोलॉजिस्ट डॉक्टर मनीष चंडी ने बीबीसी मराठी को बताया था कि यह परियोजना ऐसे इलाक़े में प्रस्तावित है, जहां खारे पानी के मगरमच्छ, वॉटर मॉनिटर (छिपकली की एक प्रजाति), मछलियाँ और कई दुर्लभ पक्षी पाए जाते हैं.
लेकिन सरकार के एक बयान में कहा गया है कि इन प्रजातियों के अंडे देने और प्रजनन के स्थानों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा.
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