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9 घंटे पहले
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भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) नेता अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा की ओर से 2020 में दिए गए भाषणों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस मामले में उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज़ करने के लिए कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है.
संज्ञेय अपराध (कॉग्निज़ेबल ऑफ़ेंस) का मतलब ऐसे अपराध से होता है जिसमें पुलिस को बिना वारंट के गिरफ़्तारी करने और बिना अदालत की अनुमति के जांच शुरू करने का अधिकार होता है.
इन भाषणों के ख़िलाफ़ दर्ज शिकायतों में इन्हें हेट स्पीच कहा गया था. इन शिकायतों में कहा गया था कि उन्होंने जनवरी 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोगों को निशाना बनाते हुए नफ़रती भाषण दिए थे.
सीपीएम नेता बृंदा करात और केएम तिवारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए बुधवार, 29 अप्रैल को जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरकरार रखा. हाई कोर्ट ने कहा था कि बीजेपी नेताओं के बयान न तो सांप्रदायिक हिंसा भड़काते हैं और न ही सार्वजनिक अव्यवस्था पैदा करते हैं.
लाइव लॉ के मुताबिक़ अदालत ने अपने आदेश में कहा, “रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री में कथित भाषण, 26 फरवरी 2020 की स्टेटस रिपोर्ट और निचली अदालतों के तर्क शामिल हैं. इन पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद हम इस निष्कर्ष से सहमत हैं कि इस मामले में कोई संज्ञेय अपराध बनता नहीं है.”
वृंदा करात की याचिका में इन दोनों नेताओं की ओर से दिए गए भाषणों का ज़िक्र किया गया था.
26 अगस्त 2020 को ट्रायल कोर्ट ने वर्मा और ठाकुर के ख़िलाफ़ शिकायत यह कहते हुए ख़ारिज कर दी थी कि सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना यह कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है.
इसके बाद 13 जून 2022 को दिल्ली हाई कोर्ट ने भी करात और तिवारी की एफ़आईआर दर्ज कराने की मांग ख़ारिज कर दी थी.
हाई कोर्ट ने कहा था कि “बयान किसी विशेष समुदाय के ख़िलाफ़ नहीं थे और न ही उन्होंने हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने के लिए लोगों को उकसाया.”
अनुराग ठाकुर और परवेश वर्मा ने क्या कहा था
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दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान जो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे उनमें रिठाला में आयोजित एक सभा में 27 जनवरी 2020 को अनुराग ठाकुर एक चुनावी सभा में नारे लगवाते नज़र आ रहे थे जिसमें वो कहते हैं, “देश के गद्दारों को…” और लोग नारा लगाते हैं- “गोली मारो…को.”
इसके बाद अनुराग ठाकुर मंच से कहते दिखते हैं, “पीछे तक आवाज़ आनी चाहिए. गिरिराज जी को सुनाई दे.”
अनुराग ठाकुर पर ये आरोप लगे कि उन्होंने शाहीन बाग में प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ ये भाषण दिया था.
एक अन्य मंत्री, परवेश वर्मा के वीडियो में उन्हें ये कहते देखा गया था कि भाजपा की जीत के कुछ ही घंटों के भीतर प्रदर्शनकारियों को “भगा दिया जाएगा”, और यह भी कहा कि अगर उन्हें अनियंत्रित छोड़ दिया गया तो वे “बलात्कार और हत्या” करेंगे.
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वहीं 2022 में परवेश वर्मा के भाषण की एक क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो रही थी.
इसमें परवेश वर्मा ये कहते हुए दिखे, ” “जहां-जहां ये आपको दिखाई दें, मैं कहता हूं कि अगर इनका दिमाग़ ठीक करना है, इनकी तबीयत ठीक करनी है तो एक ही इलाज है, वो है संपूर्ण बहिष्कार.”
इसके बाद उन्होंने सभा में शामिल लोगों से पूछा, “आप इस बात से सहमत हो? हाथ खड़ा करके बोलो सहमत हो?”
बारिश में छाता लेकर खड़े और बैठे लोग इस क्लिप में हाथ खड़े करते नज़र आते हैं.
फिर परवेश वर्मा कथित तौर पर कहते हैं, “और मेरे साथ बोलो हम इनका संपूर्ण बहिष्कार करेंगे. हम इनके दुकान, रेहड़ियों से कोई सामान नहीं खरीदेंगे. हम इनको कोई मज़दूरी नहीं देंगे.”
बाद में एआईएमआईएम प्रमुख असदउद्दीन ओवैसी ने इसी क्लिप को ट्वीट करके कहा था, “भाजपा-आरएसएस सांसद देश की राजधानी में, खुली सभा में मुसलमानों का बहिष्कार करने की शपथ ले रहे हैं.”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हेट स्पीच से निपटने के लिए मौजूदा क़ानून पर्याप्त’
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इन याचिकाओं में हेट स्पीच को लेकर अलग से क़ानून बनाने की मांग की गई थी.
हालांकि अदालत ने यह भी माना कि ऐसे अपराधों से निपटने के लिए आपराधिक कानून में पहले से पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं. अगर किसी बदलाव की जरूरत है तो यह फैसला संसद को करना चाहिए.
बेंच ने कहा कि आपराधिक क़ानून का मौजूदा ढांचा जिसमें पहले की भारतीय दंड संहिता और संबंधित कानून शामिल हैं, शत्रुता को बढ़ावा देने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने या सार्वजनिक शांति भंग करने वाली गतिविधियों से पर्याप्त रूप से निपटने में सक्षम है
याचिकाकर्ताओं ने केंद्र सरकार को यह निर्देश देने की भी मांग की थी कि वह ‘हेट स्पीच’ और ‘अफवाह फैलाने’ से जुड़े मौजूदा कानूनी ढांचे की समीक्षा करे और जरूरत के मुताबिक नए कदम उठाए.
अदालत ने कहा, “एक ऐसे देश के लिए जिसने ऐतिहासिक रूप से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना को अपनाया है, वहां ‘नागरिकता’ की अवधारणा को विभाजन या बहिष्कार का आधार नहीं बनाया जा सकता. इसलिए यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि नागरिकों के साथ जाति, रंग, धर्म, लिंग या किसी भी ‘हम बनाम वे’ की सोच पर आधारित आधार पर भेदभाव किया जाए.”
बेंच ने कहा कि उभरती सामाजिक चुनौतियों को देखते हुए नए कानून बनाना या पुराने क़ानूनों में बदलाव करना केंद्र और विधायिका पर निर्भर है. वे चाहें तो विधि आयोग की मार्च 2017 की 267वीं रिपोर्ट में दिए गए सुझावों तहत संशोधन करने पर विचार कर सकते हैं
हेट स्पीच के ख़िलाफ़ कई याचिकाओं में धर्म संसद और इस तरह की अन्य धार्मिक सभाओं में एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ हिंसा, आर्थिक बहिष्कार, हथियारबंद होने और जनसंहार की अपील का हवाला देकर इस मामले में उचित क़ानून बनाने की अपील की गई थी.
कु़र्बान अली, मेजर जनरल एसजी वोम्बटकेरे, पत्रकारों, नागरिक स्वतंत्रता समूहों और धार्मिक संस्थाओं की दायर याचिकाओं में इस बात की ओर इशारा किया गया था कि इस तरह की बातों की सार्वजनिक रूप से घोषणा की जाती है.
इन याचिकाओं में कहा गया था कि पुलिस अक्सर इसकी अनुमति दे देती है या निष्क्रिय रहती है. एफ़आईआर शायद ही कभी गिरफ़्तारी या अभियोजन की ओर ले जाती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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