Home राष्ट्रीय समाचार वो संगठन जिनके इशारे पर बीजेपी और टीएमसी के बड़े नेताओं को...

वो संगठन जिनके इशारे पर बीजेपी और टीएमसी के बड़े नेताओं को भी चलना पड़ता है

10
0

Source :- BBC INDIA

पीएम मोदी और ममता बनर्जी

इमेज स्रोत, ANI

    • Author, शुभज्योति घोष
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता से
  • 27 अप्रैल 2026, 10:40 IST

  • पढ़ने का समय: 11 मिनट

पिछले सात–आठ वर्षों में पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में चुपचाप लेकिन अभूतपूर्व बदलाव आया है.

और यह बदलाव है- राज्य की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के लिए चुनावी रणनीति बनाने और उसे लागू करने की ज़िम्मेदारी अब लगभग पूरी तरह पार्टी नेताओं के हाथों से निकल चुकी है.

इसकी जगह अब यह काम दो तथाकथित ‘बाहरी’ संगठनों की ओर से किया जा रहा है.

सत्ता में काबिज़ तृणमूल कांग्रेस के लिए यह संगठन है आई पैक (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी).

लगभग सात साल पहले, जब राज्य में लोकसभा चुनावों में बीजेपी को उम्मीद से कहीं बेहतर नतीजे मिले थे, तब तृणमूल नेता अभिषेक बनर्जी ने पार्टी के गढ़ को सुरक्षित रखने के लिए इस कंसल्टेंसी को साथ जोड़ा था.

आई पैक की स्थापना प्रसिद्ध चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (जो अब कंसल्टेंसी छोड़कर सक्रिय राजनीति में आ चुके हैं) ने की थी.

राजनीतिक हलकों में माना जाता है कि 2021 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी की ज़बरदस्त जीत में इसकी निर्णायक भूमिका थी.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

यह धारणा पूरी तरह सही है या नहीं, यह एक अलग बात है, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि अब ज़िलों से लेकर गांवों और कस्बों तक तृणमूल कांग्रेस के भीतर अंतिम फ़ैसले पार्टी नेता नहीं, बल्कि आई पैक में काम करने वाले वेतनभोगी पेशेवर लेते हैं.

दरअसल, यह संगठन सिर्फ़ सलाह देने तक सीमित नहीं रहा है; अब यह रणनीति बनाता है और उसके अमल की निगरानी भी करता है.

उम्मीदवार चयन से लेकर प्रचार की शैली तक, सब कुछ आई पैक के इशारों पर तय होता है. उत्तर बंगाल के एक विधायक कहते हैं, “आजकल आई पैक की हिदायत के बिना तृणमूल में पत्ता तक नहीं हिलता.”

इस प्रभाव की गहराई जनवरी में तब साफ़ दिखाई दी, जब ईडी अधिकारियों ने आई पैक के कोलकाता मुख्यालय और उसके प्रमुख प्रतीक जैन के घर पर छापे मारे.

ख़ुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को हस्तक्षेप के लिए जाना पड़ा- जो इस बात का संकेत है कि यह संगठन पार्टी के शीर्ष स्तर तक कितनी गहराई से जुड़ा हुआ है.

अब केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी पर नज़र डालिए.

पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान वह स्थानीय नेतृत्व पर बहुत कम भरोसा करती है और उसकी जगह रणनीतिक नियंत्रण राज्य के बाहर के नेताओं के हाथों में सौंप देती है.

यहाँ केंद्रीय भूमिका अमित मालवीय निभाते हैं.

‘झालमुरी या गंगा में नाव की सवारी’

बीजेपी के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय पश्चिम बंगाल में पार्टी के चुनाव अभियान का भी नेतृत्व कर रहे हैं

इमेज स्रोत, Samir Jana/Hindustan Times via Getty Images

मालवीय, बीजेपी के पश्चिम बंगाल में कार्यकलाप की निगरानी करते हैं, साथ ही पार्टी के ‘आईटी सेल’ के भी प्रमुख हैं.

राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने और अभियान चलाने के लिए प्रसिद्ध (और कई बार विवादों में रहा) यह आईटी सेल अब कोलकाता से ही बीजेपी की पश्चिम बंगाल की चुनावी रणनीति को प्रभावी ढंग से तैयार कर रही है.

चाहे यह तय करना हो कि नरेंद्र मोदी झालमुरी खाएँगे या गंगा में नाव की सवारी करेंगे, अमित शाह कहाँ और क्या बोलेंगे, स्मृति ईरानी मछली खाने पर क्या टिप्पणी करेंगी, या योगी आदित्यनाथ की रैली में ‘बुलडोज़र’ कब और कहाँ दिखेगा- हर छोटी से छोटी बात अमित मालवीय की निगरानी में आईटी सेल की पेशेवर टीम तय करती है.

इसका नतीजा यह हुआ है कि आई पैक और आईटी सेल के बीच इस रणनीतिक मुक़ाबले में अब दोनों बड़ी पार्टियों के वरिष्ठ नेता भी फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में तेज़ी से अप्रासंगिक होते नज़र आ रहे हैं.

तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी- दोनों के नेता वास्तव में इन दो संगठनों के जारी निर्देशों को ही लागू कर रहे हैं. पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में यह एक हालिया और पूरी तरह अभूतपूर्व घटनाक्रम है.

तृणमूल

इमेज स्रोत, AP

होटलों से चलाए जा रहे अभियान

मोदी

इमेज स्रोत, AFP via Getty Images

कोलकाता के पूर्वी छोर पर न्यू टाउन राजारहाट स्थित है.

यह एक आधुनिक और सुव्यवस्थित टाउनशिप है, जो अब बीजेपी के आईटी सेल का अस्थायी और अनौपचारिक मुख्यालय बन चुका है.

यहाँ के दो पाँच सितारा होटल, वेस्टिन और नोवोटल को बीजेपी नेतृत्व ने बड़े पैमाने पर बुक किया हुआ है और पिछले दो-तीन महीनों से दूसरे राज्यों से नेताओं का लगातार आना-जाना लगा हुआ है.

अमित मालवीय के नेतृत्व में आईटी सेल, ऊँचे वेस्टिन होटल की 30वीं मंज़िल पर मौजूद कई सुइट्स से अपना काम कर रहा है. ख़ुद मालवीय महीनों से वहीं ठहरे हुए हैं.

राज्य की सभी 294 विधानसभा सीटों पर बीजेपी उम्मीदवारों के लिए प्रचार संदेश तय करना, स्टार प्रचारकों की तैनाती, और यह फ़ैसला करना कि उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को किन इलाक़ों में भेजा जाए- ये सभी निर्णय यहीं से लिए जा रहे हैं.

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ या अन्य स्टार प्रचारकों को कहाँ भेजा जाना है, यह आईटी सेल के ऑफ़िस में तय होता है

इमेज स्रोत, ANI

ग़लतियाँ भी होती हैं. उदाहरण के तौर पर, हाल ही में स्मृति ईरानी को हुगली की एक विधानसभा सीट पर प्रचार के लिए भेज दिया गया, लेकिन स्थानीय उम्मीदवार को इसकी जानकारी ही नहीं दी गई थी.

जब वह अपने काफ़िले के साथ पहुँचीं, तो वहाँ एक भी श्रोता मौजूद नहीं था. उन्हें वापस लौटना पड़ा और दो दिन बाद, उचित इंतज़ाम होने पर दोबारा आना पड़ा.

फिर भी, कुल मिलाकर आईटी सेल के पेशेवर प्रबंधन में राज्य भर में बीजेपी का चुनाव अभियान काफ़ी कुशलता के साथ आगे बढ़ा है.

वेस्टिन से कुछ ही दूरी पर नोवोटल होटल है, जो एक और अहम केंद्र बन चुका है.

पिछले दो महीने के दौरान कोलकाता के लगातार दौरों में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कई बार इसी होटल में रुके.

10 अप्रैल को अमित शाह ने इसी होटल के बैंक्वेट हॉल से बीजेपी का चुनावी घोषणापत्र- जिसे संकल्प पत्र नाम दिया गया- औपचारिक रूप से जारी किया.

इस आयोजन पर आईटी सेल की छाप साफ़ दिखाई देती थी.

हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी नोवोटल में कोलकाता के पत्रकारों के साथ एक ‘ब्रेकफ़ास्ट मीटिंग’ की मेज़बानी की- एक ऐसा कार्यक्रम, जिसे उम्मीद के मुताबिक़ आईटी सेल ने ही आयोजित किया था.

होटल की लॉबी हर समय केंद्रीय सुरक्षा कर्मियों, पुलिस और अलग-अलग स्तर के नेताओं से भरी रहती है.

एक बीजेपी सांसद के शब्दों में, “राज्य सरकार के साथ हमारे रिश्तों को देखते हुए, कोलकाता में कहीं और हमें कोई प्रशासनिक सहयोग नहीं मिलता.”

उनका कहना था कि इसी वजह से पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व और आईटी सेल ने पाँच सितारा होटलों के नियंत्रित और आरामदेह माहौल में काम करना चुना.

महेश शर्मा

पश्चिम बंगाल बदलाव के लिए तैयार है- बीजेपी

बीजेपी नेताओं का मानना है कि पश्चिम बंगाल अब बदलाव के लिए तैयार है

इमेज स्रोत, ANI

पिछले छह हफ़्तों की अपनी रिपोर्टिंग के दौरान मैंने भी इन होटलों में काफ़ी समय बिताया.

वेस्टिन में एक देर रात, मैंने अमित मालवीय को बीजेपी सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा के साथ गहरी बातचीत करते हुए पाया.

अपना परिचय देने के बाद उन्होंने मुझे भी बातचीत में शामिल होने के लिए न्योता दिया और इसके बाद राज्य के चुनावों पर एक लंबी और बेबाक चर्चा हुई.

उस बातचीत के ज़्यादातर हिस्से को तो रिपोर्ट में नहीं लिया जा सकता, लेकिन दोनों नेताओं ने ज़ोर देकर कहा कि पश्चिम बंगाल अब राजनीतिक बदलाव के लिए तैयार है.

उनका कहना था, “इसमें समय लगा है- लेकिन अब नहीं.”

राज्य में महीनों बिताने के बाद मालवीय अब बंगाली काफ़ी हद तक समझने लगे हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी को एक ‘बाहरी’ या ‘हिंदी पट्टी की पार्टी’ के रूप में देखा जाने वाला नज़रिया अब काफ़ी हद तक ख़त्म हो चुका है. उन्होंने इशारों‑इशारों में इस बदलाव का श्रेय आईटी सेल के लगातार प्रयासों को दिया.

नोएडा से तीन बार सांसद रहे महेश शर्मा ने गर्व के साथ जोड़ा, “हम लोगों को यह समझाने में कामयाब रहे हैं कि नोएडा में बंगालियों को जो सम्मान और सफलता मिली है, पश्चिम बंगाल में भी वे उसी सम्मान के हक़दार हैं.”

देर रात की उस बातचीत का सार यही था कि बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व राज्य को जीतने के लिए जानबूझकर ‘बंगालियत’ को अपना रहा है और इस रणनीति को लागू करने के लिए आईटी सेल बिना रुके काम कर रहा है.

वाटरसाइड से चल रहा है आई‑पैक

ममता बनर्जी

इमेज स्रोत, ANI

न्यू टाउन जहाँ कोलकाता से मिलता है, उसके क़रीब सेक्टर‑पांच का इलाक़ा है, जो शहर का आईटी हब माना जाता है. वहीं, बड़े जलाशयों के पास स्थित गोदरेज वाटरसाइड नाम की इमारत में आई‑पैक का कोलकाता दफ़्तर है.

जनवरी में, जब ईडी ने इस दफ़्तर और इसके प्रमुख के आवास पर छापे मारे, तो ममता बनर्जी ख़ुद वहाँ पहुँच गई थीं.

अधिकारियों के साथ वह इमारत में दाख़िल हुईं और कैमरों के सामने फ़ाइलें हाथ में लेकर बाहर निकलीं- जिससे काफ़ी विवाद खड़ा हो गया था.

इसके बाद उन पर एक केंद्रीय एजेंसी के काम में बाधा डालने के आरोप में मामला दर्ज किया गया, जो अब सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

कई पर्यवेक्षकों के लिए यह घटना तृणमूल की चुनावी मशीनरी में आई‑पैक की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करती है. आख़िर मुख्यमंत्री ख़ुद हस्तक्षेप क्यों करतीं?

इसके बाद के हफ़्तों में, आई‑पैक के संस्थापकों में से एक को दिल्ली में हिरासत में लिया गया, पश्चिम बंगाल में कर्मचारियों को कथित तौर पर छुट्टी पर जाने को कहा गया और वाटरसाइड का दफ़्तर बंद कर दिया गया.

फिर भी तृणमूल का कहना है कि आई‑पैक का काम बिना किसी रुकावट के जारी है.

निजी तौर पर पार्टी नेता मानते हैं कि यह कंसल्टेंसी संगठन में इतनी गहराई तक धँस चुकी है कि अस्थायी बाधाएँ भी इसके कामकाज को प्रभावित नहीं करतीं.

ग्रामीण और अर्ध‑शहरी सीटों में आई‑पैक के कर्मचारी उम्मीदवारों के साथ लगातार जुड़े रहते हैं- हर गतिविधि पर नज़र रखते हैं, निर्देश देते हैं और कोलकाता को तुरंत फ़ीडबैक भेजते हैं.

उत्तर बंगाल के एक तृणमूल विधायक ने खुले तौर पर कहा, “वे हमें पूरी स्क्रिप्ट भेज देते हैं. हमें ज़्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती- बस उसका पालन करना होता है.”

अभिषेक भी आई पैक पर निर्भर

अभिषेक बनर्जी

इमेज स्रोत, ANI

पूरे भारत में कई युवा नेता रणनीतिक मार्गदर्शन के लिए पेशेवर सलाहकारों पर तेज़ी से निर्भर होते जा रहे हैं- चाहे वह संदेश तय करना हो, मीडिया से संवाद करना हो या सार्वजनिक छवि गढ़ना हो.

पश्चिम बंगाल में अभिषेक बनर्जी के लिए ठीक यही भूमिका आई पैक निभाता है, जिन्हें व्यापक रूप से ममता बनर्जी का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता है.

विडंबना यह है कि 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद अभिषेक ही आई पैक को राज्य में लेकर आए थे- हालाँकि शुरुआत में ममता बनर्जी को इस पर कुछ संदेह था.

बाद में उन्होंने ख़ुद माना कि आई पैक ने पार्टी की छवि सुधारने में मदद की, ख़ासकर 2021 के बेहद प्रभावी नारे के ज़रिए: “बांग्ला निजेर मेयेकेई चाय” (बंगाल अपनी ही बेटी को चाहता है).

कोलकाता के बाहरी इलाक़े पाइलान में एक रैली के दौरान मैंने आई पैक के परिचालन नियंत्रण के स्तर को ख़ुद देखा.

जब हम देर से पहुँचे और सुरक्षाकर्मियों ने हमें प्रवेश नहीं दिया, तो आई पैक के एक संपर्क को फ़ोन करने के महज़ 90 सेकेंड में मामला सुलझा गया. हमें आगे तक ले जाया गया, स्टेज के क़रीब.

यह घटना दिखाती है कि अभिषेक बनर्जी की आवाजाही, मीडिया की पहुँच और उनके भाषण की सामग्री तक, सब कुछ पर्दे के पीछे आई पैक ही नियंत्रित कर रहा है.

प्रबंधन की पढ़ाई कर चुके अभिषेक ढीली ढाली संगठनात्मक संस्कृति की जगह कॉरपोरेट स्टाइल अनुशासन को पसंद करते हैं- लक्ष्य तय करना और समय पर नतीजे की मांग करना.

उनके पूरे समर्थन के साथ, आई पैक पार्टी के भीतर ठीक इसी सोच को संस्थागत रूप देने का काम कर रहा है.

‘एकला चलो रे’ से मैनेजमेंट वाले अभियानों तक

ममता बनर्जी

इमेज स्रोत, Debarchan Chatterjee/NurPhoto via Getty Images

हाल ही में नोवोटल में एक नाश्ते के दौरान मेरी मुलाक़ात मैथिली ठाकुर से हुई- लोकप्रिय गायिका और अब बिहार से बीजेपी नेता- जो इस समय देश की सबसे कम उम्र की विधायकों में शामिल हैं.

उन्होंने याद किया कि सालों पहले वह एक उभरती कलाकार के रूप में बीबीसी दफ़्तर गई थीं.

आज वह बीजेपी के लिए उन क्षेत्रों में प्रचार कर रही हैं, जहाँ ग़ैर बंगाली मतदाताओं की संख्या अच्छी-ख़ासी है- गाना गा रही हैं, भाषण दे रही हैं और वोट मांग रही हैं.

हैरानी की बात नहीं कि उनके पूरे कार्यक्रम का प्रबंधन आईटी सेल ही कर रहा है.

उन्होंने उत्साहित होकर पूछा, “क्या आपने कल जोरासांको में ‘एकला चलो रे’ गाते हुए मेरा वीडियो देखा?”

मैंने नहीं देखा था- लेकिन चुनाव अभियान के बीच एक ग़ैर बंगाली कलाकार का टैगोर का गाना गाने की चर्चा ज़रूर सुनी थी.

कोई 25–30 साल पहले तक पश्चिम बंगाल की राजनीति पर सीपीआई(एम) और कांग्रेस का दबदबा था.

तब तृणमूल कांग्रेस का अस्तित्व ही नहीं था और बीजेपी की मौजूदगी नाममात्र की थी.

सीपीआई(एम) सख़्त केंद्रीकृत अनुशासन के साथ काम करती थी; उम्मीदवार चयन से लेकर प्रचार के तरीक़ों तक, सब कुछ राज्य समिति तय करती थी.

इसके उलट कांग्रेस की संस्कृति काफ़ी ढीली थी, जहाँ उम्मीदवारों को प्रचार ख़र्च और रणनीति में काफ़ी छूट मिलती थी.

लेकिन आज के राजनीतिक माहौल में यह लगता है कि कोई भी पार्टी- बड़ी हो या छोटी- ‘एकला चलो’ यानी अकेले चलने का रास्ता अपनाने का जोखिम नहीं उठा सकती.

तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी- दोनों के अनुभव बताते हैं कि चुनावी सफलता शायद अब अनिवार्य रूप से पेशेवर रणनीतिकारों के मार्गदर्शन पर निर्भर हो गई है- चाहे वे पार्टी के भीतर से हों या बाहर से.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS