Source :- LIVE HINDUSTAN
पूरे विवाद की मुख्य जड़ इस जलमार्ग पर नियंत्रण को लेकर है। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ऐतिहासिक रूप से इस मार्ग पर अपना प्रभाव रखता आया है, लेकिन अब वह इस प्रभाव को औपचारिक रूप देने के लिए एक शुल्क प्रणाली शुरू करने का दबाव बना सकता है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्होंने पूरी तरह से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज नाकेबंदी कर रखी है। साथ ही उन्होंने दावा किया है कि इसके चलते ईरान को रोज 500 मिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है। फिलहाल, उन्होंने नाकेबंदी को खोलने से इनकार कर दिया है। खास बात है कि यह टिप्पणी ऐसे समय पर आई है, जब ईरान ने ट्रंप के सीजफायर के ऐलान को मानने से इनकार कर दिया है। साथ ही अमेरिका को ‘युद्ध हारने वाला’ करार दिया है।
ट्रंप ने लिखा, ‘ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद नहीं करना चाहता, वे इसे खुला रखना चाहते हैं ताकि वे हर दिन 50 करोड़ डॉलर कमा सकें (इसलिए, अगर यह बंद रहता है तो वे इतना ही नुकसान उठा रहे हैं!)। वे इसे बंद करने की बात सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि मैंने इसकी पूरी तरह से नाकाबंदी कर दी है, इसलिए वे केवल अपना सम्मान बचाना चाहते हैं। चार दिन पहले कुछ लोग मेरे पास आए और कहा, ‘ईरान तुरंत होर्मुज को खोलना चाहता है।’ लेकिन अगर हम ऐसा करते हैं, तो ईरान के साथ कभी कोई समझौता नहीं हो सकता, जब तक कि हम उनके बाकी देश और उनके नेताओं को खत्म न कर दें।’
सीजफायर का ऐलान
ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, ‘ईरान की सरकार गंभीर रूप से विभाजित है, जिसकी उम्मीद पहले से थी। पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के अनुरोध पर, हमसे कहा गया है कि हम ईरान पर अपना हमला तब तक रोक दें जब तक उनके नेता और प्रतिनिधि एक संयुक्त प्रस्ताव लेकर नहीं आते। इसलिए मैंने अपनी सेना को नाकाबंदी जारी रखने और बाकी सभी मामलों में तैयार रहने का निर्देश दिया है। मैं युद्धविराम को तब तक के लिए बढ़ा रहा हूं जब तक उनका प्रस्ताव पेश नहीं हो जाता और बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंच जाती।’
होर्मुज है वार्ता में बड़ी बाधा
एजेंसी वार्ता के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत के एक और दौर की तैयारी के बीच ‘होर्मुज’ का मुद्दा एक बड़ी बाधा बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस अनसुलझे विवाद के कारण बातचीत शुरू होने से पहले ही पटरी से उतर सकती है। एसएंडपी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस के आंकड़ों के अनुसार, युद्ध से पहले इस जलमार्ग से रोजाना 100 से अधिक जहाज गुजरते थे, लेकिन अब यह संख्या काफी गिर गई है। पिछले शुक्रवार से रविवार के बीच केवल 36 जहाज ही यहां से गुजर पाए। हालांकि, यह पिछले हफ्तों की तुलना में थोड़ा बेहतर आंकड़ा है क्योंकि ईरान ने प्रतिबंधों में मामूली ढील दी थी।
शिपिंग एनालिटिक्स फर्म केप्लर ने पुष्टि की है कि 13 अप्रैल को अमेरिकी नौसैनिक घेराबंदी लागू होने के बाद से कम से कम 27 ईरानी जहाज इस चैनल से गुजरे हैं। वहीं, इसी अवधि के दौरान अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने कई जहाजों को अपना रास्ता बदलने का निर्देश दिया है। वर्तमान में ओमान की खाड़ी और फारस की खाड़ी में टैंकरों की लंबी कतारें लगी हुई हैं और कई जहाज संचालकों के लिए बिना सुरक्षा गारंटी के यहां से गुजरना जोखिम भरा बना हुआ है।
नियंत्रण है विवाद की जड़
पूरे विवाद की मुख्य जड़ इस जलमार्ग पर नियंत्रण को लेकर है। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ऐतिहासिक रूप से इस मार्ग पर अपना प्रभाव रखता आया है, लेकिन अब वह इस प्रभाव को औपचारिक रूप देने के लिए एक शुल्क प्रणाली शुरू करने का दबाव बना सकता है। यदि ऐसा होता है, तो वैश्विक ऊर्जा प्रवाह पर ईरान का दबदबा काफी बढ़ जाएगा, जिसे अमेरिका के लिए स्वीकार करना बेहद मुश्किल होगा।
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