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दुनिया के ‘ख़ास लोग’ ईरान युद्ध के असर के बारे में क्या सोचते हैं?

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Source :- BBC INDIA

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का कहना है कि दुनिया के सामने फिलहाल चिंता की कोई बात नहीं है

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दुनिया पर मौजूदा संकट के दो केंद्र हैं. ईरान के दक्षिण में स्थित 24 मील चौड़ा होर्मुज़ स्ट्रेट और उससे सात हज़ार मील दूर स्थित व्हाइट हाउस.

यह सप्ताह दुनिया के बाक़ी देशों के लिए एक अनोखा अवसर था. इन देशों को सीधे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के सामने अपनी आर्थिक दलीलें रखनी थीं. ये सब हुआ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की वसंत बैठक में, जो वॉशिंगटन डीसी में व्हाइट हाउस से कुछ ही दूरी पर आयोजित हो रही है.

मैंने जी7 के ज़्यादातर वित्त मंत्रियों, कुछ सेंट्रल बैंकर्स और दुनिया के शीर्ष वित्त विशेषज्ञों से बात करके महसूस किया कि उनमें नाख़ुशी थी क्योंकि अमेरिका के युद्ध में जाने के फ़ैसले की अनुमानित लागतों का बोझ बाक़ी दुनिया उठा रही है.

चांसलर रैचेल रीव्स खासकर मुखर थीं. उन्होंने इस युद्ध को ‘मूर्खता’ और ‘गलती’ बताया. साथ ही उन्होंने कहा कि ‘ये युद्ध हमारा नहीं था.’

वित्त मंत्रियों की बैठकें, जैसे जी20 ब्रेकफास्ट, गंभीर माहौल में हुईं. भागीदारों के मुताबिक़, कमरे में केवल अमेरिका की ही आवाज़ ऐसी थी जो शॉर्ट टर्म कॉन्फिडेंस ज़ाहिर कर रही थी.

बैठक में मौजूद लोगों के मुताबिक़, एशियाई वित्त विशेषज्ञों ने ख़ासकर ‘ऊर्जा की वास्तविक कमी’ को लेकर साफ़तौर पर चिंता जताई.

ब्रेकफास्ट की टेबल पर कई चिंताएं ज़ाहिर होने के कुछ देर बाद, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट अमेरिकी फाइनेंशियल टीवी पर दिखाई दिए और कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है. उन्होंने कहा कि बाज़ार और अर्थव्यवस्था तेज़ी से संभल जाएंगे.

कनाडा के वित्त मंत्री फ्रांस्वा-फिलिप शांपेन लगभग सभी महत्वपूर्ण बैठकों में मौजूद थे. वह ट्रंप की टैरिफ़ वॉर का सीधे तौर पर सामना भी कर चुके हैं. उन्होंने अलग नज़रिया रखा.

उन्होंने कहा, “ज्योग्राफी नहीं बदलती. लोग भी उतना नहीं बदलते. इसलिए यह विश्व ऊर्जा के संदर्भ में एक जोखिम बना रहेगा, जिसे हमें आने वाले वर्षों तक मैनेज करना होगा. बेशक संघर्ष समाप्त हो जाए.”

‘धीमा झटका’

फरवरी के अंत में अमेरिका-इसराइल के ईरान पर हमलों से दुनिया के सामने उर्जा संकट पैदा हुआ

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आईएमएफ़ की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने मुझे बताया कि दुनिया एक “धीमे झटके” का सामना कर रही है. वहीं विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा ने आर्थिक रूप से ग़रीब देशों पर इसके प्रभाव के बारे में बताया.

इराक़ तेल का निर्यात या उत्पादन नहीं कर रहा है, जो सामान्यतः 85 फ़ीसदी रेवेन्यू पैदा करता है. बांग्लादेश में घरेलू ज़रूरतों के लिए खाना पकाने में गैस की बड़ी मांग है. वह मध्य पूर्व के आपूर्तिकर्ताओं से कट गया है.

और प्रशांत द्वीप के देशों के पास ऊर्जा का भंडारण बहुत कम है. वो लंबी शिपिंग रास्तों के अंत में टैंकरों और कंटेनर जहाज़ों का इंतज़ार कर रहे हैं. ये स्ट्रेट में हुई रुकावट के कारण सामने आई आपूर्ति श्रृंखला की नाज़ुक कड़ी के कुछ वास्तविक उदाहरण मात्र हैं.

इन हालात के चलते विश्व बैंक ने आर्थिक रूप से कमज़ोर देशों को ऊर्जा और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों से निपटने में मदद करने के लिए 100 अरब डॉलर तक की सहायता राशि तैयार रखी है. ये कोविड लॉकडाउन के दौरान दी गई राशि से भी ज़्यादा है.

जॉर्जीवा ने चेतावनी दी, “मार्च एक मुश्किल महीना था, लेकिन अप्रैल शायद और भी मुश्किल होगा.”

“क्यों? क्योंकि 28 फ़रवरी तक रवाना हुए टैंकर अपने ठिकानों तक पहुंच चुके हैं. और कोई नई खेप नहीं आ रही है. एक टैंकर धीमी गति से पहुंचता है. फिजी तक पहुंचने में 40 दिन लगेंगे.”

शुक्रवार को कुछ उम्मीद जगाने वाले घटनाक्रमों के बावजूद, विश्व खाद्य कीमतों के लिए संकट की घड़ी तेज़ी से चल रही है. अहम फर्टिलाइजर यूरिया की कीमत दोगुनी हो गई है. हालांकि उत्तरी देशों में अभी फसलें बोई जा रही हैं, लेकिन वैश्विक खाद्य उपलब्धता की समस्या जून-जुलाई में शुरू हो सकती है.

बंगा ने कहा, “असली समस्या तब होगी, जब तीन महीने बाद फ़र्टिलाइज़र उपलब्ध नहीं होंगे. उत्तरी देशों के अलावा अन्य देशों में भी बुवाई का मौसम शुरू हो जाएगा. तब हम खाद्य उपलब्धता के एक मुश्किल साइकल में फंस जाएंगे.”

ईरान से बातचीत की उम्मीद

होर्मुज स्ट्रेट को दुनियाभर में पैदा हुए उर्जा संकट की वजह माना जा रहा है

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ट्रंप प्रशासन की इस सब पर प्रतिक्रिया दो हिस्सों में थी: युद्ध जल्द ही समाप्त हो जाएगा और जो फायदा होगा उसके लिए इस मुश्किल का सामना किया जा सकता है.

अमेरिकी ट्रेजरी बिल्डिंग के ठीक सामने स्थित विलार्ड होटल वह जगह है जहां ‘लॉबिंग’ शब्द का जन्म हुआ था. और बाकी दुनिया यहां आर्थिक आपदा से बचने के लिए कुछ राजनयिक दबाव डालने आई थी.

बेसेंट कुछ पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे, जिनमें मैं भी शामिल था. ईरान युद्ध के कारण वैश्विक मंदी की आशंका को लेकर आईएमएफ के पूर्वानुमान पर उनकी क्या राय थी?

उन्होंने मुझसे कहा, “मुझे आश्चर्य होता है कि अगर लंदन पर परमाणु हमला हो जाए तो वैश्विक जीडीपी पर कितना असर पड़ेगा.”

“मुझे अल्पकालिक पूर्वानुमानों की उतनी चिंता नहीं है जितनी आने वाले समय में सुरक्षा की है. कुछ हफ्तों के लिए थोड़ा सा आर्थिक कष्ट सहना, बड़े जोखिम से बचने से बेहतर है.”

मैंने उनसे साफ करने को कहा कि उनका मतलब क्या है. उन्होंने डिएगो गार्सिया में ईरानी प्रक्षेपण की ओर इशारा किया. बेसेंट ईरान पर अमेरिकी नाकाबंदी को लेकर भी आश्वस्त थे. जिसके बारे में उन्होंने कहा कि ईरान के जहाज़ ‘आगे नहीं बढ़ पाएंगे.’

साथ ही, वे ईरानियों के साथ बातचीत को लेकर भी आश्वस्त थे, जो ईरानी नेतृत्व के सभी पक्षों का विश्वसनीय प्रतिनिधित्व कर सकते थे.

जब मैं बेसेंट से मिला, तब फ्रांस के वित्त मंत्री रोलैंड लेस्क्योर ने उनसे निजी तौर पर मुलाकात की थी.

उन्होंने मुझसे कहा, “मैं आपको वह सब कुछ नहीं बताऊंगा जो मैं उनसे कह रहा हूं. लेकिन स्ट्रेट इस संकट की जड़ है और इसे सुलझाना ज़रूरी है. इससे हम सभी को नुकसान हो रहा है.”

उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के कारण अमेरिका भी आर्थिक तंगी का सामना कर रहा है. उन्होंने कहा कि ईरानी इस आर्थिक नुकसान का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए कर रहे हैं. उन्होंने आगे कहा, “यह उनका वेपन ऑफ डिटरेंस (अवरोध खड़ा करने वाला हथियार) है.”

इसके उलट, उनका मानना ​​है कि फ्रांस में घरेलू ऊर्जा की कीमतें बहुत अधिक नहीं बढ़ेंगी.

उन्होंने कहा, “70 के दशक में जब तेल संकट आया था, तब फ्रांस की 90 फीसदी ऊर्जा हाइड्रोकार्बन से आती थी. अब यह 60 फीसदी है. हम इस संकट का फायदा उठाकर परमाणु और नवीकरणीय ऊर्जा में और अधिक निवेश कर रहे हैं.”

ब्रिटेन की चांसलर रेचल रीव्स की ऊर्जा नीति में भी बदलाव आया है. अब वह ‘टाई बैक’ के माध्यम से उत्तरी सागर के मौजूदा क्षेत्रों से उत्पादन को बढ़ाने पर विचार कर रही हैं. साथ ही बढ़ती हुई बिजली और गैस की कीमतों से निपटने की कोशिश कर रही हैं. आने वाले दिनों में नए प्रस्ताव आने की उम्मीद है.

ब्रिटेन के सामने मौजूद समस्याओं के बावजूद, बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर एंड्रयू बेली ने मुझसे स्पष्ट रूप से कहा कि बैंक को युद्ध से पैदा हुई महंगाई से निपटने के लिए ब्याज दरों में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि महंगाई से निपटने का तरीका तनाव कम करना है.

और भी चुनौतियां

मिथोस, एंथ्रोपिक के क्लाउड सिस्टम का हिस्सा है

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कनाडा के वित्त मंत्री फ्रांस्वा-फिलिप शांपेन ने कहा, “होर्मुज़ स्ट्रेट, हम जानते हैं कि यह कहां स्थित है और कितना बड़ा है. जो समस्या (मिथोस) है उसका पता ही नहीं है.”

जब मैंने बार्कलेज़ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सी.एस. वेंकटकृष्णन से बात की, तो खाड़ी संकट उनकी चिंताओं की सूची में केवल तीसरे स्थान पर था. उनकी पहली चिंता थी, “क्या टेक्नोलॉजी और एआई का अत्यधिक विकास हुआ है?”

“दूसरा मुद्दा निजी ऋण और लिक्विडिटी जैसी समस्याएं हैं. और तीसरा, ज़ाहिर है मध्य पूर्व में चल रही घटनाएं हैं.”

हालांकि खाड़ी देशों से अभी भी काफी अनिश्चितता बनी हुई है. लेकिन अब हालात थोड़े बेहतर हैं, जिससे कुछ लोग अन्य चिंताओं पर ध्यान केंद्रित कर पा रहे हैं.

ग्रोथ के आंकड़ों से पता चला है कि ब्रिटेन पहली तिमाही में 0.5 फीसदी से 0.6 फीसदी की वृद्धि दर की ओर बढ़ रहा है. इससे रीव्स को उम्मीद भी जगी है. शुक्रवार को स्ट्रेट के फिर से खुलने की ख़बर आते ही ऊर्जा की कीमतें गिर पड़ीं. साथ ही, उधार लेने की लागत, पेट्रोल की कीमतें और मॉर्टगेज दर भी कम हो गईं.

वॉशिंगटन डीसी में मौजूद हर कोई यह मानने की हिम्मत कर रहा है कि संकट अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका है. अगर ऐसा नहीं हुआ है, तो इसके परिणाम बेहद गंभीर होंगे.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS