Source :- BBC INDIA

अप्रैल की तपती दोपहर में, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से क़रीब 450 किलोमीटर दूर, केन नदी के किनारे बैठी 20 साल की बबीता अहिरवार कहती हैं, “हमें घर के बदले घर, ज़मीन के बदले ज़मीन और गांव के बदले गांव चाहिए.”
20 साल की बबीता के साथ दर्जन भर से अधिक गांवों के लोग अपने परिवार के साथ छतरपुर ज़िले के धौड़न गांव में पिछले 11 दिनों से प्रदर्शन कर रहे थे. हालांकि 17 अप्रैल को धरने पर बैठे ग्रामीणों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच बातचीत के बाद फ़िलहाल आंदोलन को 10 दिन के लिए स्थगित किया गया है, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि 10 दिन में अगर समाधान नहीं किया जाता है तो वो इससे भी बड़ा आंदोलन करेंगे.
उनका आरोप है कि उन्हें विस्थापन के एवज में मिलने वाला मुआवजा पर्याप्त नहीं है और जो मिल भी रहा है उसके लिए भी उनसे रिश्वत मांगी जा रही है.
ये विरोध भारत की महत्वाकांक्षी केन-बेतवा रिवर लिंकिंग प्रोजेक्ट से होने वाले विस्थापन के ख़िलाफ़ हो रहा है.
केंद्र सरकार के अनुसार, इस परियोजना से लाखों घरों में बिजली और सिंचाई का पानी पहुंचाया जा सकेगा.
हालांकि, इन तमाम सरकारी योजनाओं और भविष्य के वादों से बबीता और उनके साथी ग्रामीण कुछ साल पहले तक बिल्कुल अनभिज्ञ थे.
छतरपुर ज़िला कलेक्टर ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में कहा, “केन-बेतवा परियोजना से प्रभावित लोगों ने फ़िलहाल डैम बनाने के काम को प्रभावित किया हुआ है. ग्रामीणों की मुआवजा राशि वितरण से संबंधित जो भी शिकायतें हैं, प्रशासन उन्हें ठीक करने के लिए तत्पर है. अब तक हम 650-700 करोड़ रुपये की मुआवजा राशि का वितरण कर चुके हैं”
हालांकि, आंदोलन कर रहे ग्रामीणों का आरोप है कि उन लोगों के पास प्रशासनिक अधिकारी बात करने तक नहीं पहुंच रहे हैं. दूसरी ओर केन-बेतवा परियोजना के तहत धौड़न गांव में बन रहे डैम का काम पूरी तरह से ठप पड़ा हुआ है.
‘घर, ज़मीन, गांव सरकार सब ले ले, लेकिन हमारा नया ठिकाना बता दे’

मध्य प्रदेश की केन और उत्तर प्रदेश की बेतवा दो नदियां हैं. भारत सरकार की ‘केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट’ की चर्चा साल 1995 में सबसे पहले शुरू हुई थी और इसके साथ ही धौड़न गांव के डूबने की नियति तय हो गई थी.
साल 2005 में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने एक एमओयू पर हस्ताक्षर किया. इसके बाद साल 2024 के 25 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस परियोजना का शिलान्यास किया.
सरकार के अनुसार, एक नदी से दूसरी नदी तक पानी पहुंचाने यानी रिवर लिंकिंग की इस परियोजना में लगभग 44 हज़ार करोड़ रुपये खर्च होंगे. इससे मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना ज़िलों के 21 गांव डूब जाएंगे. लगभग सात हज़ार परिवार विस्थापित होंगे.
केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के बारे में भारत सरकार के कई दावे हैं. इसके मुताबिक, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के क़रीब 13 ज़िलों को इसका फ़ायदा मिलेगा. 11 लाख हेक्टेयर ज़मीन में सिंचाई की सुविधा मिलेगी. 62 लाख लोगों को पीने का पानी मिलेगा. यही नहीं, 100 मेगावाट से ज़्यादा बिजली का सृजन भी होगा.

हालांकि, कड़ी धूप में अपनी मां के साथ रोटी सेंक रहीं बबीता के लिए भविष्य के वादों से पहले उनके सामने आज के जीवन की चिंता है.
जब हमने पूछा कि आखिर इतनी गर्मी में वो लोग क्यों यहां डटे हुए हैं तो बबीता कहती हैं, “अगर हमने आज ये ज़मीन छोड़ दी तो हम कहीं के नहीं रह जाएंगे. सरकार ने हमारे घर की कीमत 40 हज़ार रुपए आंकी है. ज़मीन की कोई कीमत हमें नहीं मिली. एकमुश्त विस्थापन के लिए राहत का पैसा भी नहीं मिला. हम यहां से जाएं तो जाएं कहां?”
यहीं ग्रामीणों की भीड़ में खड़ी 42 साल की सुन्नीबाई अहिरवार कहतीं हैं, “हम तो सब कुछ देने के लिए तैयार हैं. घर, ज़मीन, गांव सरकार सब ले ले लेकिन हम लोग कहां जाएं ये पहले बता दे. हमने वोट देकर सरकार बनाई अब हम 10 दिन से इस धूप में अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर बैठे हुए हैं लेकिन कोई बात करने के लिए तैयार नहीं है”.
सुन्नीबाई बताती हैं कि उनके घर में छह लोग हैं जिनमें से किसी को भी मुआवजा नहीं मिला है.
“साहब हमने ज़िंदगी भर की कमाई 10 लाख रुपये लगाकर अपना घर बनाया था. जब सरकार ने उस घर की कीमत आंकी तो हमें 4 लाख रुपये दिए. अब हम इस गांव से बाहर जाकर कहीं भी ज़मीन खरीदें तो कम से कम 10 लाख की तो ज़मीन ही आएगी, फिर उस पर घर कैसे बनाएंगे ? या सरकार चाहती है कि हम गड्ढा खोदकर रहें?”
मुआवज़े के बंटवारे पर गंभीर सवाल, ग्रामीणों का आरोप

केन-बेतवा नदियों को जोड़ने की इस परियोजना पर लंबे समय से कई सवाल उठे हैं. परियोजना की शुरुआत के बाद से ही ग्रामीणों ने विस्थापन संबंधी डेटा जमा करने के तरीकों और मानकों पर सवाल उठाए थे.
ग्रामीणों का आरोप है कि मुआवजे की राशि पाने के लिए अलग-अलग अधिकारी उनसे रिश्वत मांग रहे हैं.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए धौड़न गांव के तुलसी आदिवासी कहते हैं, “मेरे घर की सरकार ने कीमत बताई थी 46 हज़ार रुपये. उसे लेने के लिए भी अब तक न जाने कितनी बार सरकारी दफ़्तरों और अधिकारियों के यहां चक्कर लगा चुका हूं. मुझे पैसे नहीं मिले. कई लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने कुछ पैसा रिश्वत देकर मुआवज़े का पैसा ले लिया है.”
66 साल के चूरा, जो कि परियोजना से प्रभावित पलकुहां गांव के भूतपूर्व सरपंच रहे हैं, उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि गांव के सचिव से लेकर, तहसीलदार, पटवारी और अन्य अधिकारी मुआवजे का पैसा दिलवाने के नाम पर खुले आम रिश्वत मांग रहे हैं.
उन्होंने आरोप लगाया, “हमने तो साफ मना कर दिया है कि अपने हक़ के पैसे में से एक चवन्नी नहीं देंगे. एक तो वैसे ही सरकार मुआवजे के नाम पर हमें बहुत कम पैसा दे रही है, उसमें भी अगर हम रिश्वत देंगे तो हमारे पास बचेगा क्या?”
रिश्वत लेकर मुआवज़ा राशि देने का आरोप कई ग्रामीण लगा रहे हैं
इस बारे में जब हमने छतरपुर कलेक्टर पार्थ जायसवाल से सवाल किया तो उन्होंने कहा, “हम ग्रामीणों के आरोप की जांच करवाने के लिए तैयार हैं. हमने यह तक प्लान किया है कि ऐसे मामलों में हम दूसरे सब-डिवीजन के अधिकारियों से जांच कराएंगे. और जो भी तथ्य सामने आएंगे उस पर उचित कार्रवाई की जाएगी”.
दूसरी ओर छतरपुर में हाल ही में इसी परियोजना से जुड़ा एक मामला सामने आया, जहां मार्च महीने में एक पटवारी को मुआवज़े की राशि दिलाने के नाम पर रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया गया.
राहुल अग्रवाल नाम के इस पटवारी की गिरफ़्तारी कलेक्टर कार्यालय परिसर से हुई थी, जब वह एक प्रभावित आदिवासी महिला से कथित तौर पर पैसे ले रहा था.
केन-बेतवा परियोजना पर फिर सवाल, 11 दिनों से काम ठप
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केन बेतवा परियोजना के तहत धौड़न गांव में बन रहे डैम का काम पिछले 11 दिनों से पूरी तरह बंद पड़ा हुआ है. यहां पर फिलहाल नदी के पानी को रोकने के लिए बनाए जाने वाले दीवाल का काम चल रहा है.
यहां पर मुआवजे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे ग्रामीण फ़िलहाल खुले आसमान के नीचे डैम साइट पर ही बैठकर प्रदर्शन कर रहे हैं.
ज़िला कलेक्टर पार्थ जायसवाल ने भी इस बात की पुष्टि करते हुए बताया, “काम फ़िलहाल बंद पड़ा हुआ है. इससे न सिर्फ़ सरकारी प्रोजेक्ट में देरी हो रही है बल्कि आर्थिक नुकसान भी हो रहा है.”
उन्होंने जल्द से जल्द ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान निकालने की बात कही है.
इस परियोजना को लेकर न सिर्फ मुआवजे और विस्थापन संबंधी समस्याएं बल्कि पर्यावरण संबंधी चिंताएं भी सामने आ चुकी हैं. ऐसा कहा जा रहा है कि इससे पन्ना टाइगर रिज़र्व समेत आसपास के संरक्षित क्षेत्रों पर असर पड़ेगा और बड़ी संख्या में पेड़ों के कटने या डूबने की आशंका भी है.
सुप्रीम कोर्ट की एक समिति ने 2019 में अपनी रिपोर्ट में परियोजना के विकल्पों पर पर्याप्त विचार न किए जाने और पन्ना टाइगर रिज़र्व पर संभावित प्रभाव की बात कही थी. यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में भी लंबित है.
जहां एक तरफ़ विश्व भर में नदियों को जोड़ने की परियोजनाओं ने कोई ख़ास सफलता नहीं हासिल की है. वहीं, भारत में चल रही इस परियोजना से प्रभावित लोगों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों ने इस इस पर फिर एक बार प्रश्न चिह्न खड़े किए हैं.
पर्यावरणविद और स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर भी इस आंदोलन का हिस्सा बने हुए हैं.
अमित कहते हैं, “पहले ग्रामीणों के मन में परियोजना का ही विरोध था लेकिन धीरे-धीरे अब उनका विरोध विस्थापन में हो रही गंभीर गड़बड़ियों के ख़िलाफ़ हो गया है. यहां शिक्षा का खासा अभाव है और इसीलिए अधिकारियों ने न तो यहां ढंग से ग्राम सभा करवाई न ही सर्वे का रिज़ल्ट पब्लिक को बताया. लोगों के घरों-मकानों और जमीनों की कीमत महज कुछ हज़ार रुपये में तौल दी गई.”
उन्होंने आगे सरकारी रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा, “सरकार यह नहीं समझना चाहती है कि विस्थापन सिर्फ़ घर बदलना नहीं होता है. एक पूरा समुदाय, समाज और इकोसिस्टम खत्म होता है. ऐसे में प्रभावितों के लिए सरकार को थोड़ा संवेदनशील होना चाहिए. जो कि वह बिल्कुल भी नहीं है बल्कि डंडे के इस्तेमाल से काम करवाना चाहती है.”
दिलचस्प बात यह है कि जिन लोगों को अपना घर गांव-ज़मीन छोड़कर कहीं और जाना पड़ रहा है, उनकी अब तक की ज़िंदगी मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रही है.
अब इस परियोजना के शुरू होने के बाद उनके सामने अस्तित्व की चुनौती खड़ी हो गई है.
ग्रामीणों की मांगें कब पूरी होंगी और उनके लगाए आरोपों की कब जांच होगी यह तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन इन चिंताओं के बावजूद परियोजना पर काम जल्द से जल्द शुरू करने की कवायद ज़रूर की जा रही है. दूसरी तरफ़ धूप तेज होती जा रही है. बबीता अपनी मां के साथ फिर चूल्हे की ओर लौट जाती हैं. उनके लिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगला घर कहां होगा.
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