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माना जा रहा है कि अमेरिका ईरान के साथ युद्धविराम वार्ता के दूसरे दौर पर चर्चा कर रहा है, जबकि पाकिस्तान का एक प्रतिनिधिमंडल ईरान की राजधानी तेहरान पहुंच चुका है.
रविवार को पाकिस्तान की मेज़बानी में अमेरिका-ईरान के बीच बीस घंटे से अधिक चली वार्ता बिना किसी नतीजे के ख़त्म होने के बाद दो हफ़्ते का युद्धविराम लागू है.
इन बेनतीज़ा चर्चाओं के एक दिन के भीतर ही राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के प्रति अपनी नई रणनीति की घोषणा की, जिसमें अंतरराष्ट्रीय तेल व्यापार के लिए अहम जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ की नाकाबंदी का प्रस्ताव शामिल है.
समझौते तक पहुंचने में इस शुरुआती विफलता और आगे की वार्ताओं की संभावना को कैसे देखा जाना चाहिए? क्या ईरान और अमेरिका नियंत्रित तनाव की ओर बढ़ रहे हैं या फिर एक बड़े युद्ध की अनिवार्य स्थिति की तरफ जा रहे हैं?
आगे क्या हो सकता है, इसके चार संभावित परिदृश्य यहां दिए गए हैं.
1. ‘रणनीतिक विराम’ के रूप में नाजु़क युद्धविराम
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कई हफ्तों की लड़ाई के बाद, अमेरिका-ईरान युद्धविराम संकट को सीमित करने की इच्छा का संकेत देता दिखा. हालांकि, शुरुआत से ही इसके साथ कई तरह की बातें जुड़ी रहीं.
युद्धविराम के प्रावधानों की व्याख्या को लेकर मतभेद सामने आए.
इसमें युद्धबंदी का भौगोलिक दायरा और यहां तक कि “युद्धविराम उल्लंघन” की परिभाषा शामिल थी.
इन मतभेदों के कारण कुछ पर्यवेक्षकों ने इसे एक स्थायी ढांचे के बजाय रणनीतिक विराम के रूप में देखना शुरू कर दिया.
वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के वरिष्ठ फेलो बेहनाम बेन तालेब्लू ने कहा, “संघर्ष शुरू होने के बाद से ही समझौते तक पहुंचने की संभावना लगभग शून्य थी.”
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ की फ़ारसी सेवा से कहा, “ये सिद्धांतों, स्थितियों और नीतियों का एक ऐसा समूह है, जिन पर अमेरिका और ईरान सालों से असहमत रहे हैं, और युद्ध इन मतभेदों को कम करने में नाकाम रहा है…बल्कि जंग ने इन्हें और बढ़ा दिया है.”
इस बीच, दोनों पक्षों के अधिकारियों के परस्पर विरोधी बयानों ने स्थिति की नाज़ुकता को और बढ़ा दिया है.
जहां इस्लामिक रिपब्लिक के अधिकारी बार-बार युद्धविराम उल्लंघन की बात करते हैं, वहीं अमेरिका और इसराइल अपनी प्रतिबद्धताओं की अधिक सीमित व्याख्या पेश करते हैं.
इन अलग-अलग दावों ने अविश्वास को और गहरा किया है और युद्धविराम के स्थायित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
अगर वार्ता की मेज़ पर लौटने की कोशिशें पूरी नहीं होती हैं, तो यह युद्धविराम केवल समय लेने का एक जरिया बन सकता है.
इससे दोनों पक्षों को रुकने, संभलने और फिर से संगठित होने, अपने रुख़ का पुनर्मूल्यांकन करने और अगले चरण की तैयारी करने का मौका मिलेगा.
यह परिदृश्य तब और संभव हो जाता है, जब किसी एक पक्ष को लगता है कि उसे मौजूदा स्थिति से ज्यादा फ़ायदा नहीं मिल रहा और दबाव बढ़ाने की ज़रूरत है.
उदाहरण के लिए, अमेरिका महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे जैसे बिजली संयंत्र, पुल या ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाने को एक विकल्प के रूप में देख सकता है.
हालांकि, ऐसे हमले दबाव बढ़ा सकते हैं, लेकिन इनके व्यापक मानवीय और आर्थिक परिणाम होंगे और ईरान की ओर से अधिक कड़ी प्रतिक्रिया भी हो सकती है.
इसी समय, इसराइल, जो बातचीत को लेकर काफी संदेह में रहता है, एक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है.
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में शोध करने वाली हमीदरेज़ा अज़ीज़ी ने कहा, “इसराइल ईरानी अधिकारियों, यहां तक कि वार्ता में शामिल लोगों की हत्या जैसे कदम भी उठा सकता है.”
उन्होंने आगे कहा, “डोनाल्ड ट्रंप की ओर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ की नाकाबंदी की घोषित नीति टकराव के जोखिम को बढ़ाती है.”
हालांकि तनाव बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके संभावित ऊंचे खर्च, जैसे क्षेत्रीय संघर्ष का फैलना और वैश्विक आर्थिक दबाव. इस परिदृश्य को कम संभावित बना सकते हैं, कम से कम अल्पकाल में.
2. “शैडो वॉर”
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एक परिदृश्य – जो शायद सबसे अधिक मुमकिन है, वो है टकराव की “नियंत्रित तनाव” के रूप में वापसी .
इसका मतलब होगा कि संघर्ष, खुली ज़ंग के स्तर तक नहीं पहुंचेगा और न ही दोनों पक्ष पूरी तरह सैन्य कार्रवाई से परहेज करेंगे.
इसमें बुनियादी ढांचे, सैन्य ठिकानों या आपूर्ति लाइनों पर सीमित हमले जारी रह सकते हैं.
इसके बाद प्रॉक्सी समूहों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी. इराक़ या लाल सागर में ईरान समर्थित समूहों की गतिविधियों में इज़ाफ़ा और इनके नेटवर्क पर अमेरिकी दबाव बढ़ने से संघर्ष का भौगोलिक दायरा बढ़ सकता है.
कुछ विश्लेषक इस स्थिति को “शैडो वॉर” कहते हैं.
हमीदरेज़ा अज़ीजी ने बीबीसी न्यूज़ की फ़ारसी सेवा से कहा, “दोनों पक्ष अपने विकल्पों और दबाव के साधनों का इस्तेमाल करना चाहते हैं ताकि बिना पूर्ण युद्ध में गए एक-दूसरे को प्रभावित कर सकें.”
उन्होंने कहा, “अगर युद्धविराम का उल्लंघन होता है, तो यह आकलन है कि ईरान अपने सहयोगी बलों के ज़रिए नए कदम उठा सकता है, ख़ासकर यमन में.”
हालांकि, यह परिदृश्य भी जोखिम से खाली नहीं है. जैसे-जैसे तनाव बढ़ता है, गलत आकलन का ख़तरा भी बढ़ता है, और भले ही कोई पक्ष तनाव बढ़ाना न चाहता हो, एक छोटी गलती भी संघर्ष को अनियंत्रित स्तर तक पहुंचा सकती है.
3. शांत कूटनीति जारी
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पाकिस्तान में वार्ता विफल होने के बावजूद, यह निष्कर्ष निकालना अभी संभव नहीं है कि कूटनीति खत्म हो चुकी है या वार्ता पूरी तरह बंद हो गई है.
इन वार्ताओं के मेज़बान के रूप में पाकिस्तान आने वाले दिनों में ईरान और अमेरिका के बीच संदेशों का आदान-प्रदान कर समझौते के लिए प्रयास जारी रख सकता है.
इसी समय, क़तर, ओमान, और यहां तक कि सऊदी अरब और मिस्र जैसे पारंपरिक मध्यस्थ भी सक्रिय हो सकते हैं, जो संघर्ष के बेकाबू होने की आशंका के बीच संदेशवाहक के रूप में काम करेंगे और अचानक तनाव बढ़ने से रोकने की कोशिश करेंगे.
हालांकि, मुख्य बात यह है कि इस दिशा में प्रगति दोनों पक्षों के बीच बुनियादी मतभेदों को कम करने पर निर्भर करेगी.
अमेरिका का 15 सूत्रीय प्रस्ताव और ईरान का 10 सूत्रीय जवाबी प्रस्ताव यह दिखाता है कि दोनों पक्ष बजाय किसी मध्य मार्ग पर पहुंचने के, अभी भी अपनी-अपनी शर्तों को प्राथमिकता दे रहे हैं,
इसलिए, भले ही वार्ता का नया दौर संभव हो, लेकिन जल्दी और व्यापक समझौते की उम्मीद करना सही नहीं लगता.
4. समुद्री नाकाबंदी
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अगर अमेरिकी नौसेना की नाकाबंदी जारी रहती है, तो ईरानी सेना ने खाड़ी, लाल सागर और ओमान की खाड़ी में शिपिंग को ख़तरे की चेतावनी दी है.
अमेरिकी राष्ट्रपति ने घोषणा की है कि देश की नौसेना ईरान पर समुद्री नाकाबंदी लगाएगी, जिससे कोई भी जहाज़ या तेल टैंकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से गुजर नहीं सकेगा.
उन्होंने यह भी धमकी दी है कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में उन जहाजों को रोका जाएगा जो होर्मुज़स से गुजरने के लिए ईरान को ट्रांजिट शुल्क देते हैं.
यह रणनीति ईरान की तेल आय को रोकने, उसकी अर्थव्यवस्था को कमज़ोर करने और साथ ही ईरानी तेल के मुख्य खरीदार चीन को प्रभावित करने के उद्देश्य से बनाई गई लगती है.
बेहनाम बेन तालेब्लू ने ईरान के लंबे समुद्री तट का ज़िक्र करते हुए कहा, “अगर पर्याप्त ख़ुफ़िया, निगरानी और टोही संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो ईरान के बंदरगाहों की समुद्री नाकाबंदी काफी प्रभावी हो सकती है,”
“ऐसे कदम का व्यावहारिक परिणाम यह होगा कि सरकार अपने प्रमुख निर्यात (तेल) की क्षमता से वंचित हो जाएगी.”
लेकिन अन्य विश्लेषकों ने इस नीति से अमेरिका को होने वाली भारी लागत की ओर इशारा किया है, क्योंकि इससे उसकी सैन्य ताकत भौगोलिक रूप से ईरान के करीब आ जाएगी और हमलों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाएगी.
इसके अलावा, इस योजना को प्रभावी बनाने के लिए नौसेना को लंबे समय तक ईरान की सीमाओं के पास तैनात रहना होगा, जिससे भारी खर्च होगा.
ऐसी नीति को बनाए रखने से वैश्विक तेल और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है.
साथ ही यमन में मौजूद हूती बाब अल-मंदब स्ट्रेट को बाधित कर सकते हैं, जिससे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं.
धुंधली होती सीमाएं
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आखिरकार, इन परिदृश्यों से यह सामने आता है कि क्षेत्र ऐसे चरण में पहुंच गया है, जहां युद्ध और शांति के बीच की सीमा पहले से कहीं अधिक धुंधली हो गई है.
पाकिस्तान वार्ता की विफलता कूटनीति के अंत का संकेत नहीं है, न ही यह व्यापक युद्ध की शुरुआत का अंतिम संकेत है.
बल्कि, यह एक ऐसी स्थिति की ओर इशारा करता है जिसे ग्रे-ज़ोन कहा जा सकता है.
हमीदरेज़ा अज़ीज़ी ने कहा, “हालांकि दोनों पक्ष इस संघर्ष को ख़त्म करना चाहते हैं, लेकिन बहुत जल्द ऐसा होना संभव नहीं लगता.”
मौजूदा माहौल में, रणनीतिक फ़ैसले, सुरक्षा से जुड़े सवाल और ज़मीनी स्तर पर छोटे घटनाक्रम भी संकट की दिशा पर बड़ा असर डाल सकते हैं.
इसने कई विश्लेषकों को क्षेत्र में “संरचनात्मक अस्थिरता” की बात करने के लिए प्रेरित किया है.
ये एक ऐसी स्थिति होगी जिसमें नियम पूरी तरह तय नहीं होंगे और परिणाम भी अनिश्चित रहेंगे.
ईरान और अमेरिका शायद ऐसे चरण में प्रवेश कर चुके हैं, जहां युद्ध और वार्ता एक साथ जारी हैं.
दोनों पक्ष सैन्य साधनों का इस्तेमाल जारी रखते हुए कूटनीतिक चैनल को आंशिक रूप से खुला रखे हुए हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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