Home राष्ट्रीय समाचार होर्मुज़ और स्वेज़ के अलावा दुनिया के अहम स्ट्रेट और नहरें कहां...

होर्मुज़ और स्वेज़ के अलावा दुनिया के अहम स्ट्रेट और नहरें कहां हैं?

4
0

Source :- BBC INDIA

17 नवंबर, 1869 को पोर्ट सईद में स्वेज नहर के उद्घाटन समारोह का एक चित्र

इमेज स्रोत, Getty Images

स्ट्रेट या जलडमरूमध्य (दो बड़े समुद्रों को मिलाने वाला संकरा रास्ता) और नहरें उन सबसे अहम भौगोलिक तत्वों में गिने जाते हैं, जिन्होंने वैश्विक व्यापार के इतिहास को आकार दिया है और सदियों से अंतरराष्ट्रीय रिश्तों की दिशा तय करने में भूमिका निभाई है.

ये रास्ते सिर्फ़ जहाज़ों की आवाजाही आसान बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि महाद्वीपों के बीच ऊर्जा और सामान की आवाजाही पर नियंत्रण रखने वाले रणनीतिक बिंदु भी हैं.

जैसे‑जैसे माल ढोने के मुख्य ज़रिये के तौर पर समुद्री व्यापार पर निर्भरता बढ़ती गई, वैसे‑वैसे इन जलमार्गों की अहमियत कई गुना बढ़ती चली गई. आज ये वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के बेहद अहम केंद्र बन चुके हैं.

ये मार्ग समुद्रों और महासागरों को आपस में जोड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं, जिससे समुद्री दूरी कम होती है और समय व लागत दोनों की बचत होती है.

महाद्वीपों के चारों ओर घूमकर जहाज़ चलाने के बजाय, नहरें और जलडमरूमध्य सीधे और ज़्यादा प्रभावी रास्ते मुहैया कराते हैं.

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

इसका सीधा असर सामान की क़ीमतों और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ता है. इसलिए अगर इन मार्गों में से किसी एक में भी रुकावट आती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में बड़े स्तर पर उथल‑पुथल मच सकती है.

जलडमरूमध्यों और नहरों की अहमियत सिर्फ़ आर्थिक ही नहीं है, बल्कि इसका राजनीतिक और सैन्य पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है. अक्सर बड़ी ताक़तों के बीच इन मार्गों पर नियंत्रण को लेकर प्रतिस्पर्धा रही है, क्योंकि ये वैश्विक व्यापार की रफ़्तार को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं.

इन पर क़ब्ज़ा या असर रखने से देशों को बड़ा रणनीतिक प्रभाव मिलता है, जिसका इस्तेमाल संकट या अंतरराष्ट्रीय टकराव के समय किया जा सकता है.

इतिहास में ऐसे कई घटनाक्रम हुए हैं, जिन्होंने इन मार्गों की अहमियत को उजागर किया है, चाहे वे इन्हें क़ब्ज़ाने के लिए लड़ी गई जंगें हों, या इनके बंद हो जाने से पैदा हुए संकट. तकनीक के विकास और वैश्विक व्यापार के बढ़ते पैमाने के साथ‑साथ ये मार्ग और भी संवेदनशील हो गए हैं.

यहां कोई भी अचानक होने वाली घटना तुरंत ही वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकती है, जैसा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात को प्रभावित करने वाली कुछ मशहूर घटनाओं में देखा गया है.

जलडमरूमध्यों को प्राकृतिक जलमार्ग माना जाता है, जो भू‑वैज्ञानिक कारणों- जैसे टेक्टॉनिक प्लेटों की हलचल या ज़मीन के कटाव- से बनते हैं और दो जल क्षेत्रों को जोड़ते हैं. उदाहरण के तौर पर, जिब्राल्टर जलडमरूमध्य भूमध्यसागर को अटलांटिक महासागर से जोड़ता है.

इसके उलट, नहरें मानव‑निर्मित मार्ग होती हैं, जिन्हें खुदाई या इंजीनियरिंग बदलावों के ज़रिए नौवहन आसान बनाने और समुद्रों को जोड़ने के लिए बनाया जाता है- जैसे स्वेज़ नहर, जो लाल सागर को भूमध्यसागर से जोड़ती है.

नीचे दुनिया के प्रमुख जलडमरूमध्यों और नहरों का परिचय दिया जा रहा है, साथ ही वैश्विक व्यवस्था में उनकी रणनीतिक भूमिका भी बताई गई है:

होर्मुज़ जलडमरूमध्य

स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ का नक़्शा

होर्मुज़ जलडमरूमध्य ईरान और ओमान की सल्तनत के बीच स्थित है और दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में गिना जाता है. इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह फ़ारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और फिर हिंद महासागर से जोड़ता है.

इसी वजह से खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल टैंकरों के लिए यह एक बुनियादी रास्ता है, जो उन्हें सीधे वैश्विक बाज़ारों तक पहुंचाता है.

इस जलडमरूमध्य की अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि दुनिया की 20 प्रतिशत से ज़्यादा तेल आपूर्ति इसी रास्ते से होकर गुज़रती है. इसलिए इसका आर्थिक महत्व बहुत ज़्यादा है. ऊर्जा उत्पादक देश अपने संसाधनों के निर्यात के लिए इस पर भारी तौर पर निर्भर हैं.

अगर यहां किसी भी तरह की रुकावट आती है, तो वैश्विक स्तर पर तेल की क़ीमतों में उथल-पुथल हो सकती है, जिसका असर बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर पड़ता है.

इसके अलावा, इस जलडमरूमध्य का राजनीतिक और रणनीतिक पहलू भी बेहद संवेदनशील है. यह लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में तनाव का एक अहम बिंदु रहा है, ख़ासकर खाड़ी क्षेत्र में चल रही क्षेत्रीय और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के चलते. इसी वजह से बड़ी समुद्री ताक़तों की ओर से इसकी लगातार निगरानी की जाती है, ताकि व्यापारिक आवाजाही बिना रुकावट जारी रह सके.

हाल ही में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने घोषणा की कि यह जलडमरूमध्य जहाज़ों की आवाजाही के लिए बंद है, विशेष रूप से अमेरिका और इसराइल से जुड़े जहाज़ों के लिए. यह फ़ैसला फ़रवरी 2026 के आख़िरी दिनों में ईरान पर हुए सैन्य हमलों के सीधे जवाब के तौर पर लिया गया, जिसके चलते जलडमरूमध्य में वाणिज्यिक नौवहन लगभग ठप हो गया. हमलों और सुरक्षा ख़तरों के डर से यहाँ से गुज़रने वाले जहाज़ों की संख्या में तेज़ गिरावट दर्ज की गई.

स्वेज़ नहर

मिस्र में स्थित स्वेज़ नहर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जल नहरों में से एक है

इमेज स्रोत, Getty Images

मिस्र में स्थित स्वेज़ नहर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जल नहरों में से एक है. यह लाल सागर को भूमध्यसागर से जोड़ती है और यूरोप तथा एशिया के बीच एक छोटा और सीधा समुद्री रास्ता मुहैया कराती है, जिससे अफ़्रीकी महाद्वीप का चक्कर लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती.

यह नहर वैश्विक व्यापार में, ख़ासकर तेल और गैस ढोने वाले टैंकरों के आवागमन में, बेहद अहम भूमिका निभाती है. यह मिस्र की राष्ट्रीय आय का भी एक बड़ा स्रोत है और सीधे तौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है.

स्वेज़ नहर की खुदाई का काम 1859 में मिस्र के तत्कालीन शासक सईद पाशा के दौर में शुरू हुआ था.

उन्होंने फ़र्डिनेंड डी लेसेप्स के नेतृत्व में फ्रांसीसी कंपनी को खुदाई का अधिकार दिया. यह परियोजना लगभग 10 साल चली और आख़िरकार 17 नवंबर 1869 को, खदीव इस्माइल के शासनकाल में, एक भव्य अंतरराष्ट्रीय समारोह के साथ नहर का औपचारिक उद्घाटन हुआ.

इस उद्घाटन ने लाल सागर और भूमध्य सागर को जोड़ने वाले इस नए समुद्री मार्ग के रणनीतिक महत्व को दुनिया के सामने उजागर किया.

आधुनिक इतिहास में, 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासिर द्वारा नहर के राष्ट्रीयकरण का फ़ैसला एक बड़ा मोड़ साबित हुआ. इसी फ़ैसले के परिणामस्वरूप 1956 में मिस्र पर त्रिपक्षीय हमला हुआ, जिसमें ब्रिटेन, फ़्रांस और इसराइल शामिल थे. इसका मक़सद नहर पर क़ब्ज़ा जमाना और उस पर पश्चिमी नियंत्रण फिर से कायम करना था.

अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते आख़िरकार इसराइली, ब्रिटिश और फ़्रांसीसी सेनाओं को पीछे हटना पड़ा और नहर मिस्र की संप्रभुता में ही बनी रही. बाद में अरब इसराइल युद्धों के कारण भी नहर को कई बार बंद करना पड़ा.

1967 के युद्ध के दौरान यह पूरी तरह बंद हो गई और कई वर्षों तक बंद ही रही, क्योंकि यह सीधे टकराव का क्षेत्र बन चुकी थी. अक्तूबर 1973 के युद्ध के बाद, 1975 में इसे दोबारा खोला गया और धीरे-धीरे नौवहन बहाल किया गया, जिससे वैश्विक व्यापार में इसकी अहम भूमिका फिर से स्थापित हो सकी.

बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य

बाब अल मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है

इमेज स्रोत, Gallo Images via Getty

बाब अल मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है. यह यमन, जिबूती और इरीट्रिया के बीच स्थित है और स्वेज़ नहर के दक्षिणी द्वार के रूप में माना जाता है, जिसकी वजह से वैश्विक व्यापारिक आवाजाही में इसका महत्व बेहद ख़ास हो जाता है.

एशिया और यूरोप के बीच आने जाने वाले जहाज़ों का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुज़रता है. इस कारण यह अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं में एक प्रमुख पारगमन बिंदु बन जाता है और सबसे छोटे समुद्री रास्तों के ज़रिये वैश्विक बाज़ारों को सीधे जोड़ने में मदद करता है.

लेकिन हॉर्न ऑफ़ अफ़्रीका और यमन क्षेत्र में तनाव के चलते इस जलडमरूमध्य को सुरक्षा से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय नौवहन पर ख़तरे पैदा होते हैं. इसी कारण दुनिया की ताक़तें इस अहम मार्ग की स्थिरता बनाए रखने पर ज़ोर देती हैं.

हाल के समय में यमन के हूती विद्रोहियों, जो ईरान के सहयोगी माने जाते हैं, की ओर से यहां नौवहन को लेकर दी जा रही धमकियां और भी तेज़ हो गई हैं. इससे जहाज़ी आवाजाही में साफ़ तौर पर रुकावटें आई हैं और समुद्री बीमा की लागत भी बढ़ गई है.

इन हालात के जवाब में कई यूरोपीय देशों ने मिलकर एक बहुराष्ट्रीय नौसैनिक बल गठित किया, जिसे ‘ऑपरेशन एस्पिड्स’ नाम दिया गया. इसका मक़सद व्यापारिक जहाज़ों की सुरक्षा करना और लाल सागर और बाब अल मंदेब में नौवहन की आज़ादी को सुनिश्चित करना है.

इसके तहत जहाज़ों को एस्कॉर्ट किया जाता है, ख़तरों की निगरानी की जाती है और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें निष्क्रिय किया जाता है, ताकि इस अहम मार्ग की सुरक्षा मज़बूत हो और वैश्विक व्यापार पर बढ़ते तनाव के असर को सीमित किया जा सके.

जिब्राल्टर जलडमरूमध्य

उत्तरी स्पेन और दक्षिणी मोरक्को में जिब्राल्टर जलडमरूमध्य की उपग्रह इमेज

इमेज स्रोत, Getty Images

जिब्राल्टर जलडमरूमध्य उत्तरी मोरक्को और दक्षिणी स्पेन के बीच स्थित है. इसके यूरोपीय किनारे पर जिब्राल्टर क्षेत्र है, जो ब्रिटेन के अधीन है. इसी वजह से इस अहम समुद्री मार्ग में ब्रिटेन की एक प्रभावशाली रणनीतिक मौजूदगी बनी हुई है. यह जलडमरूमध्य भूमध्य सागर को अटलांटिक महासागर से जोड़ता है.

इसकी अहमियत इस बात से आती है कि यह यूरोप, अफ़्रीका और अमेरिका के बीच जहाज़ों की आवाजाही का एक बुनियादी रास्ता है. यही वजह है कि यह वैश्विक व्यापार का एक केंद्रीय बिंदु बन जाता है और एक ही समुद्री मार्ग के ज़रिए कई बाज़ारों को आपस में जोड़ती है.

इस जलडमरूमध्य का सैन्य और राजनीतिक महत्व भी काफ़ी बड़ा है, क्योंकि यह यूरोपीय महाद्वीप के क़रीब स्थित है और दुनिया के सबसे अहम समुद्री प्रवेश द्वारों में से एक को नियंत्रित करती है. इसी कारण यह अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक संतुलन का हिस्सा बनी हुई है.

इतिहास में यहां कई टकराव हुए हैं, जो सदियों तक चली यूरोपीय उपनिवेशवादी प्रतिस्पर्धा से जुड़े रहे, ख़ास तौर पर ब्रिटेन और स्पेन के बीच.

1704 में ब्रिटेन ने जिब्राल्टर क्षेत्र पर क़ब्ज़ा किया, जब ब्रिटिश डच सेनाओं ने इस इलाके पर अधिकार कर लिया था. बाद में 1713 में उट्रेक्ट संधि के ज़रिए इस नियंत्रण को औपचारिक रूप दिया गया, जिसमें स्पेन ने जिब्राल्टर को ब्रिटेन के हवाले कर दिया. इसके बावजूद स्पेन तब से अब तक इस पर अपना दावा करता आया है.

इसके अलावा, मोरक्को और स्पेन के बीच भी जलडमरूमध्य के पास मौजूद कुछ छोटे द्वीपों को लेकर समय समय पर विवाद होते रहे हैं, जैसे लीला द्वीप (तोरा), जहां 2002 में एक सीमित संकट देखने को मिला था. इस घटना ने क्षेत्र में सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ी संवेदनशीलता को उजागर किया.

हालांकि आधुनिक दौर में ये विवाद किसी बड़े सैन्य टकराव में नहीं बदले हैं, फिर भी जलडमरूमध्य की रणनीतिक स्थिति इसे क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के लिए लगातार सैन्य और राजनीतिक रुचि का केंद्र बनाए रखती है. सभी पक्ष यह सुनिश्चित करने की कोशिश में रहते हैं कि यहां से नौवहन सुरक्षित और स्थिर बना रहे.

पनामा नहर

पनामा नहर इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है

इमेज स्रोत, Getty Images

पनामा नहर पनामा में स्थित है और कैरिबियन सागर (जो अटलांटिक महासागर से जुड़ा है) को प्रशांत महासागर से जोड़ती है. इससे दुनिया के पूर्व और पश्चिम हिस्सों के बीच समुद्री रास्ता काफ़ी छोटा हो जाता है.

यह नहर इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है. इसमें जहाज़ों को ऊपर‑नीचे उठाने और उतारने की एक विशेष प्रणाली इस्तेमाल की जाती है, जिससे दोनों महासागरों के बीच बड़े जहाज़ भी बेहद प्रभावी ढंग से गुज़र पाते हैं. इसकी वजह से समुद्री यात्राओं का समय और परिवहन लागत दोनों में काफ़ी कमी आई है.

यह नहर वैश्विक व्यापार में अहम भूमिका निभाती है, ख़ास तौर पर अमेरिका महाद्वीपों और एशिया के बीच माल ढोने में. अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बढ़ते आकार के साथ तालमेल बैठाने के लिए इसमें हाल के वर्षों में विस्तार भी किया गया है, ताकि इसकी क्षमता बढ़ाई जा सके.

पनामा नहर की खुदाई का काम 1881 में एक फ्रांसीसी पहल के तहत शुरू हुआ था, जिसका नेतृत्व फ़र्डिनेंड डी लेसेप्स कर रहे थे. उस समय पनामा कोलंबिया का हिस्सा था. हालांकि यह परियोजना बीच में ही अटक गई और रोक दी गई.

बाद में 1903 में अमेरिका ने पनामा को कोलंबिया से अलग होने में समर्थन दिया, जिसके बाद अमेरिका ने इस परियोजना को दोबारा शुरू किया. नहर का निर्माण पूरा होने के बाद 15 अगस्त 1914 को, अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन के कार्यकाल में इसका औपचारिक उद्घाटन हुआ. उस समय पनामा के राष्ट्रपति ब्लिसारियो बोरस बाराहोना थे, जिन्होंने 1912 से 1916 तक शासन किया.

उद्घाटन के बाद कई दशकों तक पनामा नहर अमेरिकी नियंत्रण और प्रशासन के अधीन रही, जिससे पनामा के भीतर विरोध और तनाव पैदा हुए. इनमें सबसे प्रमुख 1964 की घटनाएँ थीं, जब पनामा के नागरिकों और अमेरिकी सेनाओं के बीच हिंसक झड़पें हुईं.

1970 के दशक में ऐसे समझौते हुए, जिनके तहत नहर की संप्रभुता पनामा को सौंपने का फ़ैसला लिया गया. यह प्रक्रिया आधिकारिक रूप से 1999 में पूरी हुई. हालांकि संप्रभुता से जुड़ा विवाद ख़त्म हो गया, फिर भी नहर को आज भी राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो कभी‑कभी नौवहन पर असर डालती हैं और इसकी रणनीतिक संवेदनशीलता को फिर से उजागर कर देती हैं.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पनामा को नहर का नियंत्रण सौंपे जाने की आलोचना करते हुए कहा है कि यह अमेरिका की ओर से लिया गया एक ग़लत फ़ैसला था. उनके मुताबिक़, नहर एक रणनीतिक संपत्ति है, जिसे वैश्विक व्यापार और अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा में इसकी अहमियत के चलते अमेरिका को अपने पास ही रखना चाहिए था.

मलक्का जलडमरूमध्य

मलक्का जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है

इमेज स्रोत, Getty Images

मलक्का जलडमरूमध्य मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच स्थित है और दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक माना जाता है. यह हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ती है और मध्य‑पूर्व व पूर्वी एशिया के बीच व्यापारिक जहाज़ों के लिए एक बेहद अहम रास्ता है.

इसकी अहमियत इस बात में है कि यह तेल और अन्य सामान को चीन और जापान जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं तक पहुंचाने का सबसे छोटा मार्ग है. इसी वजह से यह वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का एक बुनियादी हिस्सा बन चुकी है और कई देश कच्चे माल और ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति के लिए इस पर निर्भर हैं.

आर्थिक महत्व के बावजूद, मलक्का जलडमरूमध्य को समुद्री डकैती और भारी भीड़ जैसी सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. ऐसे हालात में यहां नौवहन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहयोग ज़रूरी हो जाता है. इसी कारण आसपास के देशों के बीच समन्वय बढ़ाया गया है, ताकि इस अहम मार्ग को सुरक्षित रखा जा सके.

यहां सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी समुद्री डकैती की समस्या. यह तीसरी सहस्राब्दी की शुरुआत में, ख़ास तौर पर 2000 से 2005 के बीच, तेज़ी से बढ़ी. उस दौरान जलडमरूमध्य के कुछ संवेदनशील इलाक़ों में व्यापारिक जहाज़ों पर बार‑बार हमले हुए. इसके बाद मलेशिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर जैसे देशों ने सुरक्षा सहयोग को मज़बूत किया और संयुक्त गश्त शुरू की, ताकि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.

बोस्फ़ोरस और डार्डानेल्स जलडमरूमध्य

तुर्की में बोस्फोरस (उत्तर में) और डार्डानेल्स (दक्षिण में) की उपग्रह इमेज

इमेज स्रोत, Getty Images

बोस्फ़ोरस जलडमरूमध्य तुर्की के इस्तांबुल शहर में स्थित है. यह एशिया और यूरोप महाद्वीपों को अलग करता है और काला सागर को मरमरा सागर से जोड़ता है. अपनी भौगोलिक स्थिति के लिहाज़ से इसे दुनिया के सबसे अहम प्राकृतिक जलडमरूमध्यों में गिना जाता है.

यह जलडमरूमध्य काला सागर क्षेत्र के देशों से तेल, गैस और अन्य सामान को वैश्विक बाज़ारों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाता है. यह व्यापारिक और सैन्य जहाज़ों के लिए एक प्रमुख मार्ग है, और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के तहत तुर्की यहां जहाज़ों की आवाजाही को नियंत्रित करता है.

इसकी अहमियत इसलिए भी है कि यह पूर्व और पश्चिम का संगम बिंदु है, जिससे इसे एक ख़ास भू राजनीतिक महत्व मिलता है. अपनी संवेदनशील स्थिति और अंतरराष्ट्रीय संतुलन पर पड़ने वाले असर के कारण यह क्षेत्रीय सुरक्षा का भी एक प्रमुख हिस्सा है.

डार्डानेल्स जलडमरूमध्य भी तुर्की में ही स्थित है. यह एजियन सागर (जो भूमध्य सागर का हिस्सा है) को मरमरा सागर से जोड़ता है और तुर्की के उन जलमार्गों का विस्तार माना जाता है, जो काला सागर को भूमध्य सागर तक पहुंचाते हैं.

इस जलडमरूमध्य का रणनीतिक महत्व बहुत बड़ा है. यह यूरोप और एशिया के बीच सामान ढोने वाले व्यापारिक जहाज़ों के लिए एक अहम रास्ता है और अंतरराष्ट्रीय नौवहन व्यवस्था का हिस्सा है, जिस पर कड़ी निगरानी और नियंत्रण लागू रहता है.

पहले विश्व युद्ध के दौरान, 1915 में तुर्की के इन जलडमरूमध्यों के क्षेत्र में गैलीपोली अभियान चला था. उस समय मित्र राष्ट्रों ने रूसी साम्राज्य तक समुद्री रास्ता खोलने के लिए इन जलडमरूमध्यों पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश की थी, लेकिन उस्मानी सेनाओं ने हमला नाकाम कर दिया. यह उस युद्ध की सबसे भीषण लड़ाइयों में से एक थी.

कील नहर

कील नहर बाल्टिक सागर को उत्तरी सागर से जोड़ती है

इमेज स्रोत, Getty Images

कील नहर जर्मनी के उत्तरी हिस्से में, श्लेसविग होलस्टीन प्रांत में स्थित है. यह बाल्टिक सागर को उत्तरी सागर से जोड़ती है और यूरोपीय जहाज़ों के लिए एक छोटा समुद्री रास्ता उपलब्ध कराती है.

यूरोप के भीतर समुद्री परिवहन में इस नहर का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है, ख़ासकर औद्योगिक बंदरगाहों के बीच आवाजाही के लिए. इसी वजह से यह यूरोपीय अर्थव्यवस्था को सहारा देने और आंतरिक व्यापार को आसान बनाने में अहम भूमिका निभाती है.

उच्च कार्यक्षमता और जहाज़ों की आवाजाही के सख़्त लेकिन सुचारु प्रबंधन की वजह से यहां से गुज़रना काफ़ी सहज होता है. यह नहर इस बात का अच्छा उदाहरण मानी जाती है कि जल नहरें यूरोप में समुद्री परिवहन ढांचे को कितनी मज़बूती देती हैं.

कील नहर की खुदाई का काम 1887 में जर्मन सम्राट विल्हेल्म प्रथम के शासन के अंतिम वर्षों में शुरू हुआ था. इसका निर्माण पूरा हुआ और 1895 में सम्राट विल्हेल्म द्वितीय के शासनकाल में इसे आधिकारिक तौर पर खोला गया. उन्होंने ही इसका उद्घाटन किया और इसे जर्मन नौसैनिक शक्ति का एक अहम हिस्सा बनाया.

पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह नहर जर्मन नौसेना के लिए एक बेहद अहम सैन्य मार्ग बन गई थी. इसी कारण यह दुश्मन ताक़तों के लिए एक रणनीतिक लक्ष्य भी रही, जो बमबारी या नाकाबंदी के ज़रिए इसके इस्तेमाल को बाधित करना चाहती थीं.

पहले विश्व युद्ध के बाद वर्साय संधि के तहत इस नहर पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाए गए और इसे अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए खोलना पड़ा, जिससे जर्मनी का पूरा नियंत्रण सीमित हो गया.

बाद के वर्षों में यह नहर फिर से पूरी तरह जर्मनी की संप्रभुता में आ गई, लेकिन समुद्री संतुलन में इसकी अहम भूमिका के चलते यह यूरोपीय शक्तियों की नज़र में बनी रही, ख़ासकर शीत युद्ध के दौर में, जब यह यूरोपीय रणनीतिक संदर्भ में एक संवेदनशील मार्ग मानी जाती थी.

अन्य जलडमरूमध्य और नहरें

बाब अल मंदेब से गुज़रता एक व्यापारिक जहाज़

इमेज स्रोत, Getty Images

दुनिया में कुछ और जलडमरूमध्य और नहरें भी हैं, जिनकी वैश्विक स्तर पर भूमिका सीमित है. उनकी अहमियत ज़्यादातर क्षेत्रीय स्तर पर होती है, न कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के प्रमुख मार्ग के रूप में.

इनमें प्रमुख रूप से फ़्लोरिडा जलडमरूमध्य शामिल है, जो अमेरिका के फ़्लोरिडा राज्य और क्यूबा द्वीप के बीच स्थित है और मेक्सिको की खाड़ी को अटलांटिक महासागर से जोड़ती है.

इसके अलावा डेनमार्क जलडमरूमध्य, जो उत्तरी अटलांटिक महासागर में आइसलैंड और ग्रीनलैंड के बीच स्थित है और अटलांटिक महासागर को आर्कटिक महासागर से जुड़े पानी से जोड़ती है.

इसके साथ ही चिली के सुदूर दक्षिण में स्थित मैजेलन जलडमरूमध्य भी है, जो अटलांटिक और प्रशांत महासागरों को जोड़ती है, हालांकि बाकी प्रमुख जलडमरूमध्यों की तुलना में इसका इस्तेमाल सीमित है.

वैश्विक स्तर पर सीमित महत्व वाली नहरें आमतौर पर स्थानीय या क्षेत्रीय जलक्षेत्रों को आपस में जोड़ती हैं.

इनमें ग्रीस की कोरिंथ नहर, जो कोरिंथ की खाड़ी को सारोनिक खाड़ी से जोड़ती है, अमेरिका के मैसाचुसेट्स राज्य की केप कॉड नहर, जो केप कॉड खाड़ी को अटलांटिक महासागर से जोड़कर तटीय नौवहन का रास्ता छोटा करती है, और इंग्लैंड की मैनचेस्टर शिप कैनाल शामिल है.

यह नहर मैनचेस्टर शहर को मर्सी नदी के ज़रिए आयरिश सागर (जो अटलांटिक महासागर का हिस्सा है) से जोड़ती है, जिससे शहर को सीधा समुद्री संपर्क मिलता है और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों व समुद्री परिवहन को बढ़ावा मिलता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS