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जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक से ज़्यादा बार ईरान के ख़ार्ग द्वीप पर क़ब्ज़ा करने की संभावना का इशारा किया, तो उस वक्त यह सवाल ज़ोर पकड़ने लगा कि क्या वह वाक़ई ईरान में ज़मीनी दख़ल देना चाहते हैं.
इन सवालों के बाद यह आशंका भी जताई जाने लगी कि शायद किसी चरण पर यह परिदृश्य हक़ीक़त बन जाए, ख़ासकर इसलिए कि बीते कुछ दिनों में हज़ारों अमेरिकी सैनिकों को मध्य‑पूर्व भेजा गया है.
अब तक ठीक‑ठीक यह मालूम नहीं है कि इन सैनिकों को किस मक़सद से भेजा गया है या उनकी तैनाती का स्वरूप क्या होगा.
युद्ध की शुरुआत के बाद से, जो अब एक महीने से ज़्यादा हो चुका है, ट्रंप की ओर से ईरानियों को दी जाने वाली चेतावनियां लगातार जारी रही हैं. कभी उन्होंने उन्हें ‘पाषाण युग में पहुँचा देने’ की धमकी दी, तो कभी ‘उनके सभी ऊर्जा ठिकानों पर ज़ोरदार और शायद एक साथ हमला करने’ की बात कही.
ख़ार्ग द्वीप का महत्व इस वजह से है कि ईरान अपने अधिकांश तेल का निर्यात यहीं से करता है, और यह ईरान के लिए जीवनरेखा जैसा है.
‘यह हमला नहीं है’
ज़्यादातर विशेषज्ञ और विश्लेषक इस बात से इनकार करते हैं कि वॉशिंगटन इराक़ पर हुए हमले जैसा कोई परिदृश्य दोहराएगा. उस हमले की याद आज भी उसके गंभीर नतीजों के साथ ताज़ा है, जिसने मध्य‑पूर्व में ख़ूनी सांप्रदायिक संघर्षों को जन्म दिया और चरमपंथी हथियारबंद संगठनों के उभार का रास्ता खोला.
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप में ईरान मामलों के विशेषज्ञ विश्लेषक निस्सान रफ़ाती ‘पूरी तरह ज़मीनी हमले’ और आपात स्थिति के लिए तैयार की गई सैन्य योजनाओं के बीच फ़र्क़ करते हैं. उनका कहना है कि तेहरान के साथ चार दशकों के टकराव ने अमेरिकी सेंट्रल कमांड को हर संभावित हालात के लिए तैयार रहने पर मजबूर किया है.
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रफ़ाती का मानना है कि अमेरिका व्यापक हमले के बजाय किसी ‘सीमित ज़मीनी कार्रवाई’ का सहारा ले सकता है, जिसका मक़सद चुनिंदा जगहों पर क़ब्ज़ा करना या परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना हो सकता है.
वह इस संभावित कार्रवाई की वजह यह बताते हैं कि अमेरिका या तो संवर्धित यूरेनियम पर नियंत्रण पाना चाहता है, जो अपने आप में बेहद कठिन काम है, या फिर होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान के दबदबे से निपटना चाहता है. यह वही मार्ग है जिससे दुनिया के करीब 20 फ़ीसदी तेल व्यापार की आवाजाही होती है, और जो युद्ध शुरू होने के बाद से लगभग बंद है.
पिछले साल जून में अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हवाई हमले किए, जिनके बारे में इसराइली सेना ने कहा कि उनका उद्देश्य ‘ईरान के परमाणु ख़तरे को खत्म करना’ था.
इन हमलों में छह वैज्ञानिक मारे गए और कई सैन्य कमांडरों की हत्या की गई, जिनमें जनरल मोहम्मद बाक़ेरी (सशस्त्र बलों के प्रमुख), जनरल हुसैन सलामी (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के कमांडर‑इन‑चीफ़) और जनरल ग़ुलाम अली रशीद (सेना के डिप्टी कमांडर) शामिल थे. इन कार्रवाइयों को नेतन्याहू ने ‘इसराइल के अस्तित्व के लिए ख़तरे का अंत’ बताया था.
इसके बावजूद, विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका का किसी चुनिंदा ज़मीनी सैन्य कार्रवाई में उतरना भारी ख़तरों से भरा हुआ होगा, चाहे वह अमेरिकी सैन्य बलों के लिए हो या पूरे क्षेत्र के लिए.
यह ख़तरा खास तौर पर इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि इराक़, यमन और लेबनान में ईरान समर्थक गुटों की ओर से धमकियां दी जा रही हैं, जिन्होंने मौजूदा संघर्ष शुरू होने के बाद बार‑बार अमेरिकी हितों को निशाना बनाया है.
‘नौवहन का गला घुटना’
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इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप में ईरान मामलों के विशेषज्ञ विश्लेषक निसान रफ़ाती किसी भी ज़मीनी टकराव के गंभीर नतीजों को लेकर चेतावनी देते हैं. उनका कहना है कि तेहरान “किसी भी संभावित अमेरिकी बल से भिड़ने के लिए अपनी सेनाएं आगे बढ़ाएगा, जिससे हालात सीधे युद्ध में बदल जाएंगे.”
रफ़ाती का मानना है कि अमेरिकी वायु श्रेष्ठता, ईरानी सेना की क्षमताओं में आई गिरावट के बावजूद, उसे मिसाइलों और ड्रोन के ज़रिए हमले जारी रखने से नहीं रोक पाएगी, ऐसे हमले जो पहले इसराइल और खाड़ी क्षेत्र को निशाना बना चुके हैं.
रफ़ाती संघर्ष के दायरे के फैलने के ख़तरों की ओर भी ध्यान दिलाते हैं. वह इराक़ में जारी तनाव, ईरान समर्थित इराक़ी सशस्त्र गुटों द्वारा अमेरिकी राजनयिक इमारतों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाए जाने की बात करते हैं.
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इसके अलावा लेबनान में इसराइल की घुसपैठ और इसराइल पर हूती विद्रोहियों के मिसाइल हमलों का हवाला देते हैं.
वह ख़ास तौर पर लाल सागर में बाब अल मंदब जलडमरूमध्य में नौवहन को लेकर हूतियों की धमकियों को लेकर चिंता जताते हैं, जिससे दुनिया के तेल व्यापार के दो सबसे अहम समुद्री रास्तों पर ‘घुटन की स्थिति’ पैदा हो सकती है.
नवंबर 2023 से लेकर 2025 के बीच, ईरान समर्थित हूतियों ने लाल सागर में कम से कम दर्जनों जहाज़ों को निशाना बनाया था. हूती उत्तरी यमन और राजधानी सना पर क़ाबिज़ हैं. रफ़ाती बताते हैं कि ये हमले इसराइल के ख़िलाफ़ युद्ध में ‘ग़ज़ा के समर्थन’ में किए गए.
इसके चलते दुनिया की कुछ बड़ी शिपिंग कंपनियों को अपने रास्ते बदलने पड़े. लाल सागर के दक्षिणी प्रवेश द्वार पर और यमन, इरिट्रिया व जिबूती के क़रीब स्थित बाब अल मंदब जलडमरूमध्य, हिंद महासागर और अदन की खाड़ी से आने वाले जहाज़ों के लिए स्वेज़ नहर की ओर जाने का एक बेहद अहम दक्षिणी द्वार है.
‘एक ग़लत फ़ैसला’
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कनाडा की ओटावा यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर और लंदन स्थित शोध संस्थान चैटम हाउस के फ़ेलो थॉमस जूनो किसी भी ज़मीनी कार्रवाई की उपयोगिता पर सवाल उठाते हैं. उनके मुताबिक, काम की जटिलता और उसके सफल होने की बेहद कम संभावनाओं के बावजूद, ट्रंप अपने ‘ग़लत फ़ैसलों’ को दोहरा सकते हैं.
जूनो कहते हैं, “ख़ार्ग द्वीप पर क़ब्ज़ा करना उसे अपने क़ब्ज़े में बनाए रखने से कहीं ज़्यादा आसान है,” क्योंकि वहां मौजूद अमेरिकी सेनाएं ईरानी हमलों के लिए एक खुला निशाना बन जाएंगी. उनके मुताबिक, तेहरान के तेल निर्यात को नुकसान पहुंचाने की क़ीमत वॉशिंगटन को ‘बहुत भारी दाम’ के रूप में चुकानी पड़ेगी.
अमेरिकी ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, ईरान के पास दुनिया के कुल तेल भंडार का 10 फ़ीसदी से ज़्यादा और प्राकृतिक गैस का लगभग 15 फ़ीसदी हिस्सा है. चूंकि वह अपना ज़्यादातर तेल एशिया को निर्यात करता है, इसलिए युद्ध की वजह से तेल की क़ीमतें बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं, जिससे एशियाई बाज़ारों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं.
शोध संस्थान चैथम हाउस के फ़ेलो थॉमस जूनो का मानना है कि अमेरिकी सैनिकों को भेजने के कई मक़सद कई हो सकते हैं- ईरान पर दबाव बनाना, किसी ज़मीनी कार्रवाई की भूमिका तैयार करना, या फिर अमेरिकी जनता और रिपब्लिकन पार्टी को यह मज़बूत संदेश देना कि वॉशिंगटन दुश्मन का सामना करने में सक्षम है.
जूनो का कहना है कि मध्य पूर्व पहुंचे अमेरिकी सैनिकों की संख्या किसी बड़े ज़मीनी अभियान के लिए काफ़ी नहीं है. वह जोड़ते हैं कि ‘ईरान पर हमला’ करने के लिए एक लाख सैनिकों की ज़रूरत होगी, न कि सिर्फ़ कुछ हज़ार की.
वह कहते हैं, “इराक़ पर हमले के लिए 1 लाख 50 हज़ार सैनिकों की ज़रूरत पड़ी थी, जबकि ईरान का क्षेत्रफल इससे बड़ा है और उसकी भौगोलिक बनावट कहीं ज़्यादा जटिल है.”
ईरान के सहयोगी गुट
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क्षेत्र में ईरान से जुड़े गुटों के ख़तरे के स्तर और ईरान के भीतर किसी ज़मीनी कार्रवाई की स्थिति में अमेरिकी बलों को निशाना बनाने की उनकी क्षमता को लेकर आकलन अलग-अलग हैं.
थॉमस जूनो का मानना है कि इन गुटों का असर अब कम हो रहा है, क्योंकि “हमास कमज़ोर हो चुका है, हिज़्बुल्लाह इसराइल के साथ युद्ध में उलझा हुआ है, और इराक़ के सशस्त्र गुट सतर्क हैं और तनाव बढ़ाने की इच्छा नहीं रखते.”
जूनो हूती विद्रोहियों के बाब अल‑मंदब जलडमरूमध्य को बंद करने की आशंका को खारिज करते हैं, क्योंकि उन्हें अमेरिका की बदले की कार्रवाई का डर है. उनके मुताबिक वर्ष 2025 में अमेरिका और इसराइल का हमला उनके लिए ‘बहुत दर्दनाक’ था, और यही कारण है कि वे भविष्य में समुद्री यातायात रोकने को लेकर हिचकिचा सकते हैं- हालांकि इसकी संभावना पूरी तरह ख़त्म भी नहीं हुई है.
इसके उलट, इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप में ईरानी मामलों के विशेषज्ञ निसान रफ़ाती ईरान के सहयोगी गुटों से पैदा होने वाले ख़तरे पर ज़ोर देते हैं. वह इसका उदाहरण इराक़ी गुटों द्वारा अमेरिकी हितों पर किए गए हमलों से देते हैं.
रफ़ाती बताते हैं कि हूतियों का ख़तरा सिर्फ़ जहाज़ों पर सीधे हमले तक सीमित नहीं है, बल्कि वे ‘बीमा की लागत बढ़ाकर और नाविक दलों में असुरक्षित जलमार्गों से गुज़रने को लेकर डर पैदा करके’ नौवहन के लिए प्रतिकूल माहौल भी बना सकते हैं.
सऊदी अरब ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य से बचने के लिए अपने तेल निर्यात के रास्ते बदल लिए हैं और अब वह लाल सागर पर स्थित अपने बंदरगाहों पर ज़्यादा निर्भर है. इसी संदर्भ में रफ़ाती कहते हैं, “होर्मुज़ में जो कुछ हुआ उसे देखते हुए, समुद्री व्यापार के ठप पड़ने का डर पैदा करना मुश्किल नहीं है.”
इराक़ी सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ मुख़लद हाज़िम चेतावनी देते हैं कि उनका देश हिसाब‑किताब चुकाने का मैदान बन सकता है. वह इस ओर इशारा करते हैं कि तेहरान समर्थक गुटों की संख्या बहुत ज़्यादा है और उनकी वास्तविक संख्या व सैन्य क्षमताओं को लेकर ठोस जानकारी की कमी है.
हाज़िम का मानना है कि इराक़, ख़ार्ग जैसे द्वीपों के ख़िलाफ़ किसी भी अमेरिकी कार्रवाई से अछूता नहीं रह पाएगा. उनके मुताबिक़, इन गुटों के पास समर्थन से जुड़ी ऐसी योजनाएं हैं जो सार्वजनिक नहीं हैं और जिनमें ज़मीनी सैन्य कार्रवाइयों में हिस्सा लेने के लिए इराक़ी लड़ाकों को भेजना तक शामिल हो सकता है.

अमेरिका की ओर से इराक़ी गुटों से हथियार छीनने की बार‑बार उठती मांगों और ग़ज़ा युद्ध के बाद से बग़दाद की तटस्थ रहने की कोशिशों के बावजूद, हाज़िम बताते हैं कि ये गुट “अक्सर राज्य के फ़ैसलों की परवाह नहीं करते, जबकि सरकार चाहती है कि इराक़ किसी भी बाहरी ख़तरे से दूर रहे.”
हाज़िम का यह भी मानना है कि ईरान क्षेत्र में अपने से जुड़े गुटों का इस्तेमाल करके इसराइल को एक से ज़्यादा मोर्चों पर उलझाए हुए है.
हाज़िम कहते हैं कि वह “हिज़्बुल्लाह के ज़रिए उत्तर में दबाव बनाए रखता है और हूतियों के ज़रिए दक्षिण में भी मोर्चा खोलना चाहता है, जिन्होंने कई मिसाइलें दागी हैं, जबकि ख़ुद वह मध्य इसराइल में रणनीतिक मिसाइल भंडार के प्रबंधन की ओर बढ़ रहा है.”
हाज़िम, जो ख़ुद एक पूर्व पायलट हैं, का मानना है कि किसी भी अमेरिकी कार्रवाई के लिए असली ख़तरा पड़ोसी देशों से नहीं, बल्कि ईरान के भीतर से है.
उनके मुताबिक़, रिवोल्यूशनरी गार्ड और बसीज के लाखों लड़ाके ‘आख़िरी सांस तक लड़ने’ की सोच रखते हैं और वे ऐसे गुटों में बदल सकते हैं जो विकेंद्रीकृत ढंग से लड़ाई लड़ें. वह ईरान की कठिन भौगोलिक बनावट पर भी ज़ोर देते हैं, जो उनके अनुसार ‘हथियारों से पहले ही हमलावरों से लड़ते हैं’.
युद्ध शुरू होने के बाद से, ईरान ने अमेरिकी हमलों के जवाब में उन खाड़ी देशों पर बमबारी की है. ईरान का कहना है कि उसने उन जगहों का निशाना बनाया जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं या फिर वो ठिकाने जिनसे अमेरिकी हित जुड़ा है.
समय के साथ, हमलों का दायरा बढ़ता गया और इसमें ऊर्जा संयंत्र, पानी के डी-सैलिनेशन की इकाइयां, तेल रिफ़ाइनरी और हवाई अड्डे जैसी अहम बुनियादी ढांचे की सुविधाएं भी शामिल हो गईं. नतीजतन, उड़ानों की आवाजाही कम हो गई और बड़ी संख्या में प्रवासी और पर्यटक इलाक़ा छोड़कर चले गए.
खाड़ी सहयोग परिषद के देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय क़ानून और अच्छे पड़ोसी सिद्धांतों का ईरान द्वारा किया गया खुला उल्लंघन बताया और इसकी निंदा की. यदि ज़मीनी स्तर पर टकराव बढ़ता है, तो इस बात की आशंका और गहरी हो जाती है कि सबसे ज़्यादा नुक़सान खाड़ी देशों को ही उठाना पड़ेगा.
लंबे समय से खाड़ी देशों के अमेरिका के साथ मज़बूत गठबंधन रहे हैं, लेकिन कई पर्यवेक्षकों के अनुसार, यह युद्ध खाड़ी देशों को वॉशिंगटन के साथ अपने रिश्तों पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है- भले ही अब तक कोई खुली आलोचना सामने नहीं आई है. अभी यह स्पष्ट नहीं है कि यह युद्ध इस गठबंधन की मज़बूती पर किस तरह का असर छोड़ेगा.
अमेरिका की छत्रछाया से हटने पर विचार
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इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप में ईरान मामलों के विशेषज्ञ विश्लेषक निसान रफ़ाती खाड़ी देशों के ईरान को लेकर अलग-अलग रुख़ की ओर इशारा करते हैं. उनका कहना है कि युद्ध से ठीक पहले के कुछ वर्षों में सभी खाड़ी देशों ने ईरान के साथ नज़दीकी बढ़ाने की कोशिश की थी, लेकिन वे इस बात से ‘हैरान रह गए कि वे सीधे ईरान की जवाबी कार्रवाई का निशाना बन गए’.
वह बताते हैं कि खुद को ‘सीधे निशाने पर’ पाए जाने की वजह से खाड़ी देशों ने वॉशिंगटन के साथ अपना सैन्य सहयोग और गहरा किया, साथ ही “यूक्रेन जैसी दूसरी शक्तियों के साथ समझौते करके अपनी रक्षा साझेदारियों में विविधता लाने” की दिशा में भी कदम बढ़ाए.
इराक़ी सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ मख़लद हाज़िम इस बात की पुष्टि करते हैं कि खाड़ी देश अमेरिका की छत्रछाया से हटकर भी अपनी सुरक्षा साझेदारियों और हथियारों के स्रोतों में विविधता ला सकते हैं.
उनके मुताबिक़, इनमें तुर्की, रूस, अज़रबैजान और पाकिस्तान जैसी ताक़तें शामिल हो सकती हैं. वह इस ओर भी इशारा करते हैं कि ताज़ा घटनाओं के चलते ईरान को ‘क्षेत्रीय स्तर पर बढ़ती दुश्मनी’ का सामना करना पड़ेगा.
थॉमस जूनो का मानना है कि भौगोलिक हक़ीक़त समय के साथ ‘ईरान के प्रति खाड़ी देशों के ग़ुस्से और नफ़रत की भावनाओं को कम कर देगी’. वह ज़ोर देकर कहते हैं कि पड़ोसी होने का रिश्ता अंततः दोनों पक्षों पर ‘साथ रहने और व्यवहारिकता की ओर लौटने’ का दबाव डालता है.
जूनो का यह भी मानना है कि खाड़ी देश ‘हर हाल में नुक़सान में’ हैं. अगर युद्ध रुक भी जाता है, तो वे “एक ऐसे ईरान के पड़ोसी बने रहेंगे जो बदला लेना चाहता है और जिसका होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर बड़ा नियंत्रण है.” और अगर युद्ध जारी रहता है, तो ये देश ‘कमज़ोर और निशाने पर बने रहेंगे’.
उनके मुताबिक़, तेल और गैस का उत्पादन बुरी तरह घट चुका है और सुरक्षित देशों के रूप में उनकी छवि को भी नुकसान पहुंचा है.
चीनी प्रतिद्वंद्वी
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खाड़ी देशों के तेल का बड़ा हिस्सा पूर्वी एशिया के बाज़ारों, ख़ासतौर पर चीन, भारत और अन्य देशों में जाता है, ताकि वहां की औद्योगिक ज़रूरतें पूरी की जा सकें. ग्लासगो स्थित स्ट्रैथक्लाइड यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर इब्राहीम फ़हमी का मानना है कि अमेरिका इस युद्ध के ज़रिए ‘चीन के आर्थिक विकास को बाधित करना’ चाहता है.
वह बताते हैं कि पिछले साल जनवरी में वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ़्तारी और वॉशिंगटन द्वारा वेनेज़ुएलाई तेल पर क़ब्ज़ा किए जाने के बाद अमेरिका ‘खेल के नियमों में व्यापक बदलाव’ की ओर बढ़ रहा है, ताकि उत्तरी अमेरिका को तेल का मुख्य स्रोत बनाया जा सके.
तेल उद्योग के विशेषज्ञ फ़हमी चेतावनी देते हैं कि इस तरह का बदलाव तेल और गैस की क़ीमतों को ‘ऐतिहासिक रूप से रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचा देगा, जो ऊर्जा बाज़ारों ने पहले कभी नहीं देखा’, और इससे वैश्विक महंगाई की लहरें उठेंगी, जिनका चीन पर ‘बेहद नकारात्मक असर’ पड़ेगा. उनका यह भी मानना है कि मौजूदा युद्ध में जारी तनाव के पीछे आर्थिक कारण हैं, क्योंकि ‘निकट लक्ष्य भले ही ईरान हो, लेकिन दूरगामी उद्देश्य चीन के ख़िलाफ़ एक व्यापक आर्थिक युद्ध छेड़ना है’.
ज़मीनी हस्तक्षेप की स्थिति में फ़हमी का मानना है कि ‘ईरान और उसके खाड़ी पड़ोसियों जैसे देशों के रणनीतिक भंडार खत्म हो जाएंगे’, क्योंकि ज़मीनी कार्रवाई न तो कोई आसान सैर होगी और न ही कुछ दिनों तक सीमित रहने वाला हमला. वह चेतावनी देते हैं कि अगर हूती विद्रोही लाल सागर में नौवहन को बाधित कर देते हैं, तो यह परिदृश्य पूरे क्षेत्र को ‘एक विनाशकारी ढलान’ की ओर धकेल सकता है, जिसका मतलब समुद्री निर्यात आयात की आवाजाही का पूरी तरह ठप हो जाना होगा.
इसके बावजूद, राजनीतिक और ज़मीनी हालात अब भी उतार चढ़ाव और अटकलों के लिए खुले हुए हैं- सवाल बहुत हैं, लेकिन जवाब कम. हालांकि, क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर इस युद्ध के असर इतने बड़े हो चुके हैं कि टकराव में शामिल पक्षों द्वारा अनिश्चित हद तक और ज़्यादा तनाव बढ़ाए जाने की कल्पना करना मुश्किल होता जा रहा है.
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