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तनाव आपकी त्वचा पर असर डाल सकता है, रिसर्च में और क्या-क्या पता चला

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Source :- BBC INDIA

तनाव और त्वचा का सीधा संंबंध है

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27 मार्च 2026, 11:53 IST

पढ़ने का समय: 5 मिनट

घर बदलने पर अचानक मुंहासे निकल आए? या ब्रेकअप के दौरान एक्ज़िमा अचानक बढ़ गया? ये बातें संयोग नहीं हो सकतीं.

तनाव का हमारी त्वचा पर असर पड़ता है, यह बात लंबे समय से मानी जाती रही है. लेकिन पिछले कुछ दशकों में रिसर्च ने इस मन-त्वचा के संबंध को गहराई से समझा है जिससे तनाव और त्वचा से संबंधी समस्याओं को ठीक करने में मदद मिल सकती है.

तनाव त्वचा पर कई तरह के बुरे असर डाल सकता है जैसे मुंहासों को बढ़ाना, त्वचा को सूखा और सेंसिटिव बनाना, संक्रमण का ख़तरा बढ़ाना, और एक्ज़िमा, सोरायसिस और हाइव्स जैसी बीमारियों को भड़काना या शुरू करना.

लंदन की साइकोडर्मेटोलॉजिस्ट डॉक्टर आलिया अहमद कहती हैं, “आपकी त्वचा शारीरिक तनाव और भावनात्मक तनाव दोनों से प्रभावित होती है.”

साइकोडर्मेटोलॉजी एक नई उभरती हुई फील्ड है जिसमें मन और त्वचा दोनों को साथ में देखा जाता है.

डॉक्टर अहमद अपने मरीज़ों के न सिर्फ़ शारीरिक लक्षणों बल्कि मानसिक स्थिति का भी जायज़ा लेती हैं. वह पूछती हैं- मूड कैसा है, चिंता या रोने का मन कितनी बार होता है, नींद कैसी आ रही है, खान-पान और व्यायाम कैसा है.

डॉक्टर अहमद कहती हैं, “त्वचा विशेषज्ञ अक्सर खुद को जासूस की तरह महसूस करते हैं.”

शरीर का सबसे बड़ा अंग होने के कारण त्वचा की स्थिति व्यक्ति के पूरे स्वास्थ्य का अच्छा संकेत दे सकती है.

तनाव त्वचा पर कैसे असर डालता है?

कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि तनाव मुंहासों को बढ़ा सकता है

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मस्तिष्क और त्वचा दोनों शुरुआती भ्रूण में एक ही प्रकार की कोशिकाओं से विकसित होते हैं, इसलिए ये दोनों गहराई से जुड़े हुए हैं.

जब हम तनाव महसूस करते हैं, तो मस्तिष्क एक श्रृंखला शुरू करता है जिससे कोर्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे हार्मोन खून में छोड़ दिए जाते हैं.

थोड़ी मात्रा में यह ‘फ़ाइट और फ़्लाइट’ प्रतिक्रिया देते हैं जो हमें ज़्यादा सतर्क और सक्रिय बनाती है. लेकिन जब यह ज़्यादा हो जाता है, तो ये हार्मोन सूजन बढ़ाते हैं, जिससे सूजन वाली त्वचा की बीमारियां और बदतर हो जाती हैं.

यह हार्मोन त्वचा की बाहरी सुरक्षात्मक परत को भी कमज़ोर कर देते हैं. इससे नमी बाहर निकल जाती है और पोलन, खुशबू आदि इरिटेंट्स अंदर घुस जाते हैं, जिससे त्वचा सूखी और सेंसिटिव हो जाती है.

साथ ही तनाव त्वचा में एंटीमाइक्रोबियल पेप्टाइड्स यानी वे छोटे अणु जो बैक्टीरिया और वायरस को मारते हैं जिससे संक्रमण होने का ख़तरा बढ़ जाता है.

कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि तनाव मुंहासों को बढ़ा सकता है क्योंकि यह त्वचा का तेल यानी सीबम ज़्यादा बनाता है, जो पोर्स को बंद कर देता है.

डॉक्टर अहमद बताती हैं कि तनाव नींद खराब कर देता है, और अच्छी नींद न आने से त्वचा खुद को ठीक करने की क्षमता खो देती है.

विष चक्र

तनाव त्वचा की कोशिकाओं को हिस्टामिन जैसे रसायन छोड़ने के लिए उकसाता है, जिससे खुजली होती है

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तनाव त्वचा की कोशिकाओं को हिस्टामिन जैसे रसायन छोड़ने के लिए उकसाता है, जिससे खुजली होती है.

इसे लेकर डॉक्टर अहमद बताती हैं, “खुजली होती है, आप खरोंचते हैं, त्वचा और ख़राब होती है, फिर और ज़्यादा खुजली होती है. फिर आप खुद से परेशान होने लगते हैं कि मैं खरोंचना क्यों नहीं रोक पा रहा. इससे तनाव और बढ़ता है, जो फिर खुजली बढ़ा देता है.”

त्वचा की समस्या खुद भी तनाव बढ़ा सकती है. उदाहरण के लिए एक्ज़िमा में खुजली के कारण नींद नहीं आती, लोग कमेंट करते हैं, आप उदास हो जाते हैं और तनाव बढ़ने से समस्या और बिगड़ जाती है और यही चक्र चलता रहता है.

लेकिन क्या तनाव कम करने से फ़ायदा होता है?

येल यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर राजिता सिन्हा कहती हैं, “तनाव तब हानिकारक हो जाता है जब हमें लगने लगे कि हम उसे कंट्रोल नहीं कर सकते.”

इस स्थिति में सिरदर्द, पेट की समस्या, भूलना, चिड़चिड़ापन या नींद न आना जैसे लक्षण दिखने लगते हैं.

वह सलाह देती हैं कि आप सहारा लें और ज़्यादा व्यायाम करें. नियमित व्यायाम कोर्टिसोल के सामान्य स्तर को कम कर सकता है. कठिन व्यायाम तनाव के दौरान होने वाले कोर्टिसोल के उछाल को भी नियंत्रित करने में मदद कर सकता है.

प्रोफ़ेसर सिन्हा माइंडफ़ुलनेस मेडिटेशन की भी सिफारिश करती हैं.

नियमित अभ्यास से मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स मजबूत होता है, जो सोच-समझ और फ़ैसले लेने के लिए ज़िम्मेदार होता है.

कुछ अध्ययनों में माइंडफ़ुलनेस थेरेपी से सोरायसिस जैसे रोगों में त्वचा की स्थिति और जीवन की गुणवत्ता दोनों में सुधार देखा गया है.

क्या आप वाकई तनाव में हैं?

असल में रिलैक्स करना जितना आसान लगता है, उससे कहीं मुश्किल है

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डॉक्टर अहमद अपने मरीज़ों को अलग-अलग तरीके आज़माने की सलाह देती हैं ताकि उन्हें पता चले कि उनके लिए क्या सबसे अच्छा है.

ये तरीके हो सकते हैं जैसे सोने से पहले बिस्तर पर रिलैक्सेशन एक्सरसाइज़, एक्टिव लोगों के लिए वॉकिंग मेडिटेशन, या जो लोग ज़्यादा सोचते रहते हैं उनके लिए ग्राउंडिंग टेक्नीक.

लेकिन वह चेतावनी देती हैं कि असल में रिलैक्स करना जितना आसान लगता है, उससे कहीं मुश्किल है.

डॉक्टर अहमद कहती हैं, “मेरी क्लिनिक में बहुत से हाई-परफॉर्मिंग लोग आते हैं चाहे ऑफिस का काम हो या घर पर बच्चों या बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल.”

वे कहते हैं कि वे जिम जाते हैं या रोज़ वॉक करते हैं, लेकिन जब डॉक्टर गहराई से पूछती हैं तो पता चलता है कि वे इन कामों के दौरान भी अपने कामों के बारे में ही सोचते रहते हैं.

डॉक्टर अहमद कहती हैं, “उन गतिविधियों के दौरान आपका मन भी आराम करे, यह ज़रूरी है.”

डॉक्टर अहमद आगे कहती हैं कि तनाव कम करने के अलावा त्वचा को “थोड़ा-थोड़ा सब कुछ” चाहिए जैसे सही स्किनकेयर, ज़रूरी दवाइयां, अच्छा खाना, अच्छी नींद और स्वस्थ जीवनशैली.

इसे लंबे समय तक जारी रखना पड़ता है, तभी त्वचा में लगातार सुधार आता है. फिर आपको खुद ही पता चलने लगता है कि आपकी त्वचा की समस्या के असली ट्रिगर क्या हैं.

साइकोडर्मेटोलॉजी का समग्र दृष्टिकोण सिर्फ त्वचा ही नहीं, मन को भी बेहतर बनाता है.

डॉक्टर अहमद बताती हैं, “मैं न सिर्फ अपने मरीज़ों की त्वचा में सुधार देखती हूं, बल्कि वे खुद बताते हैं कि उनका मन भी ज़्यादा अच्छा और शांत महसूस कर रहा है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS