Source :- LIVE HINDUSTAN
सूत्रों के मुताबिक, कतर, ओमान और कुवैत आर्थिक नुकसान और जवाबी हमलों के डर से बंद दरवाजों के पीछे युद्ध को जल्द से जल्द खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि UAE, सऊदी अरब और बहरीन युद्ध को और बढ़ाने के लिए तैयार हैं।
ईरान युद्ध का आज 28वां दिन है। इस बीच ईरान ने खाड़ी देशों खासकर सऊदी अरब और कुवैत के कई अहम ठिकानों पर आज फिर हमले किए हैं। इससे मध्य-पूर्व का संकट और गहरा गया है। इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानी ऊर्जा ठिकानों पर अपने प्रस्तावित हमलों को और आगे बढ़ा दिया है। उन्होंने ईरान से फिर कहा है कि वह स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को फिर से खोल दे वरना उसे अपने ऊर्जा संयंत्रों के विनाश का सामना करना पड़ेगा। ट्रंप ने तेहरान के लिए जलडमरूमध्य खोलने की अपनी समय सीमा को 7 अप्रैल को 0000 GMT तक बढ़ा दिया है और कहा है कि ईरान के साथ बातचीत “बहुत अच्छी” चल रही है।
दूसरी तरफ, खाड़ी के मुस्लिम देश ईरान को लेकर दो फाड़ होते दिख रहे हैं। कुछ देश ईरान से जंग रोकने की अपील कर रहे हैं तो कुछ देश अमेरिकी से गुहार लगा रहे हैं कि जब तक ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता नष्ट नहीं कर दिया जाता है, तब तक उस पर धुआंधार हमले जारी रखने चाहिए और उसके बाद ही सीजफायर के समझौते पर पहुंचा जाना चाहिए। चार खाड़ी सूत्रों ने बताया कि खाड़ी अरब देश अमेरिका से कह रहे हैं कि तेहरान के साथ कोई भी समझौता सिर्फ़ युद्ध खत्म करने से कहीं ज़्यादा होना चाहिए; उसे ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं पर हमेशा के लिए रोक लगानी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को फिर कभी हथियार के तौर पर इस्तेमाल न किया जाए।
खाड़ी देश ही दो फाड़?
सूत्रों के मुताबिक, खाड़ी देश कतर, ओमान और कुवैत आर्थिक नुकसान और जवाबी हमलों के डर से बंद दरवाजों के पीछे युद्ध को जल्द से जल्द खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब और बहरीन का कहना है कि वे युद्ध को और बढ़ाने के लिए तैयार हैं और युद्ध के बाद के ऐसे ईरान को स्वीकार नहीं करेंगे जो अभी भी होर्मुज़ जलडमरूमध्य का इस्तेमाल सौदेबाजी के हथियार के तौर पर कर सके।
खाड़ी देशों पर ईरान ने बार-बार किए हमले
बता दें कि खाड़ी देशों पर ईरान ने अमेरिका-इजरायल युद्ध के दौरान बार-बार हमले किए हैं। खाड़ी के देशों ने निजी बैठकों में वाशिंगटन से कहा है कि इस्लामिक गणराज्य ने उनके लिए बातचीत का कोई भी “रास्ता” नहीं छोड़ा है। इसलिए किसी भी समझौते में ऊर्जा और नागरिक संपत्तियों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों, तेल और शिपिंग मार्गों के लिए खतरों, और प्रॉक्सी युद्ध पर लागू होने वाली पाबंदियों को पक्का किया जाए। उनका कहना है कि किसी भी समझौते को युद्ध के नियमों को फिर से लिखना होगा, जिसमें इस बात की गारंटी दी जाए कि स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को फिर कभी युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल न किया जाए, और खाड़ी देशों को भविष्य की व्यवस्था में शामिल किया जाए।
असली परीक्षा युद्ध रोकने के बाद की है
एमिरेट्स पॉलिसी सेंटर की अध्यक्ष इब्तेसाम अल-करबी ने रॉयटर्स से कहा, “असली चुनौती ईरान को युद्ध रोकने के लिए मनाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि खाड़ी क्षेत्र फिर से उन्हीं हालात के सामने बेबस न हो जाए, जिनकी वजह से यह युद्ध शुरू हुआ था।” संयुक्त अरब अमीरात के अमेरिका में राजदूत यूसुफ़ अल-ओतैबा ने इस युद्ध को एक ऐसे संकट के तौर पर नहीं देखा है जिसे बस रोक दिया जाए, बल्कि एक ऐसी परीक्षा के तौर पर देखा है जिससे यह पता चलेगा कि क्या ईरान इसके बाद भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को बंधक बना सकता है।
पूरे क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा की नींव रखी जाए
इस बीच, अमेरिका की खुफिया जानकारी से परिचित पाँच लोगों के अनुसार, अमेरिका केवल इतनी ही बात पक्के तौर पर कह सकता है कि उसने ईरान के विशाल मिसाइल ज़खीरे का लगभग एक-तिहाई हिस्सा नष्ट कर दिया है। लेकिन उसकी क्षमताएं अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। यही वजह है कि खाड़ी देश अभी भी ईरान को लेकर सशंकित हैं। खाड़ी देश अब चाहते हैं कि नया समझौता 2015 के परमाणु समझौते से ज्यादा व्यापक हो। इसमें मिसाइल, ड्रोन, प्रॉक्सी युद्ध और समुद्री सुरक्षा सभी शामिल हों। खाड़ी देशों का स्पष्ट संदेश है कि अगर इस बार केवल युद्ध रोका गया, तो अगला संकट फिर से तय है। इसलिए वे ऐसे समझौते की मांग कर रहे हैं जो न केवल वर्तमान युद्ध को खत्म करे, बल्कि पूरे क्षेत्र में स्थायी शांति और सुरक्षा की नींव रखे।
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