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रुपया डॉलर के मुकाबले पहली बार ₹94 के पार, किस पर क्या पड़ेगा असर

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Source :- LIVE HINDUSTAN

Dollar Vs INR: आज भारतीय रुपया पहली बार 94 प्रति डॉलर के पार पहुंचा है। डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि आम लोगों की मुश्किलें भी बढ़ा देती है। जानें गिरावट की वजह और एक्सपर्ट के मुताबिक आगे क्या रहेगा रुपये का रुख।

भारतीय रुपया शुक्रवार, 27 मार्च को ऐतिहासिक गिरावट के साथ पहली बार 94 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया। रुपया 94.15 के करीब पहुंच गया, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। मध्य पूर्व में जारी युद्ध और ऊर्जा संकट की आशंकाओं ने आयात पर निर्भर भारत जैसे देशों की मुद्रा पर दबाव बढ़ा दिया है।

क्यों टूट रहा है रुपया?

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में तेल महंगा होने से डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। इसके साथ ही वैश्विक बाजारों में गिरावट और बॉन्ड यील्ड में तेजी ने भी निवेशकों को सुरक्षित विकल्पों की ओर धकेला है, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव पड़ा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के विरोधाभासी बयानों ने भी बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। एक ओर उन्होंने ईरान पर हमले टालने की बात कही, वहीं दूसरी ओर सख्त चेतावनी भी दी, जिससे निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ।

आगे क्या रहेगा रुख?

फॉरेक्स एक्सपर्ट अमित पबारी के अनुसार, बाजार इस समय “उम्मीद और अनिश्चितता” के बीच फंसा हुआ है। अगर तनाव कम होता है तो रुपया ₹1 से ₹1.5 तक रिकवर कर सकता है, लेकिन जब तक स्थिति साफ नहीं होती, तब तक उतार-चढ़ाव जारी रहेगा।

टेक्निकल तौर पर 94.00–94.20 का स्तर मजबूत रेजिस्टेंस माना जा रहा है, जहां केंद्रीय बैंक की दखल की संभावना है। वहीं 92.80–93.00 का स्तर सपोर्ट के रूप में उभर रहा है।

कमजोर रुपये के साइड इफेक्ट्स

डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि आम लोगों की मुश्किलें भी बढ़ा देती है। जब रुपया कमजोर होता है, तो इसका सीधा असर महंगाई और आपके महीने के बजट पर पड़ता है। आइए समझते हैं कि रुपये में गिरावट क्यों होती है और इसका असर आप पर कैसे पड़ता है।

भारत अपनी जरूरत का 75% से 80% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। जब रुपया कमजोर होता है, तो तेल आयात महंगा हो जाता है। अनुमान के मुताबिक, डॉलर के मुकाबले रुपये में 1 रुपये की गिरावट से तेल कंपनियों पर करीब 8,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

दवाएं और पढ़ाई महंगी

भारत में कई जरूरी दवाएं विदेशों से आती हैं। रुपये के कमजोर होने से इन दवाओं के रेट बढ़ जाते हैं। दूसरी ओर विदेश में पढ़ाई महंगी हो जाती है। विदेश यात्रा का खर्च बढ़ जाता है। होटल और खाने-पीने पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है।

विकास योजनाओं पर असर

जब डॉलर महंगा होता है, तो सरकार का खर्च बढ़ जाता है। ऐसे में सरकार को विकास योजनाओं (जैसे सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा) पर खर्च कम करना पड़ सकता है। इसका असर आम लोगों को मिलने वाली सुविधाओं पर पड़ता है।

सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ेगा

देश में आने और जाने वाली विदेशी मुद्रा के अंतर को चालू खाता घाटा कहते हैं। जब आयात ज्यादा होता है, तो देश से ज्यादा डॉलर बाहर जाता है और CAD बढ़ जाता है। भारत में सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा तेल और सोने के आयात पर खर्च होती है।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN