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EXPLAINER: होर्मुज पर पहले भी हो चुका है ‘टैंकर युद्ध’, US नेवी को मिले थे जख्म; पूरी कहानी

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Source :- LIVE HINDUSTAN

डोनाल्ड ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा को दूसरे देशों को ऊपर डाल दिया है। ट्रंप का कहना है कि इसकी रक्षा उन देशों को करना चाहिए, जो कि इसका उपयोग करते हैं। हालांकि, ट्रंप के फैसले के पीछे कई लोग 40 साल पहले अमेरिकी नौसेना को मिले जख्मों को भी मान रहे हैं। 

इरपश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच ईरान का सबसे बड़ा हथियार होर्मुज स्ट्रेट पर उसका कब्जा है। कुछ टैंकरों पर हमला करने के बाद वह पूरा रास्ता बंद करके बैठा है। अब यहां से केवल वही जहाज निकल रहे हैं, जिन्हें ईरान की इजाजत मिली हुई है। तेहरान की तरफ से साफ तौर पर कह दिया गया है कि अमेरिका और इजरायल और उनके सहयोगियों को होर्मुज से नहीं निकलने दिया जाएगा। ऐसी स्थिति में जब अमेरिका से पूछा गया कि क्या वह होर्मुज खोलने और जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिलवाने के लिए नेवी को भेजेगा? तो वाइट हाउस इससे इनकार करता नजर आया। विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिकियों के इस इनकार के पीछे 40 साल पहले हुए एक लड़ाई भी है, जिसमें होर्मुज खुलवाने के लिए आई यूएस नेवी को काफी नुकसान उठाना पड़ा था।

होर्मुज शुरुआत से ही ईरान के लिए एक बड़ा दाव रहा है। इराक और ईरान के बीच हुए युद्ध के दौरान भी तेहरान ने होर्मुज को निशाना बनाया था। आइए जानते हैं उस समय की घटनाओं के बारे में…

इराक-ईरान युद्ध के दौरान बंद हुई थी होर्मुज

अमेरिका की पश्चिम एशिया में दिलचस्पी शुरुआत से ही रही है। ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद खुमैनी सत्ता में आए। उन्होंने ईरान से अमेरिका समर्थित पहलवी वंश को भागने पर मजबूर कर दिया। इसके साथ ही ईरान के तेल पर पश्चिमी देशों का प्रभाव खत्म हो गया। ऐसी स्थिति में अमेरिका ने इराक के शासक सद्दाम हुसैन को समर्थन दिया और फिर ईरान पर हमला बोल दिया।

1984 में इराक जब जमीनी स्तर पर ईरान को हराने में सक्षम न रहा, तो उसने होर्मुज से जाते ईरानी जहाजों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। इसका जबाव देते हुए ईरान ने होर्मुज से निकलने वाले अंतर्राष्ट्रीय जहाजों को निशाना बनाया, जो इराक की मदद के लिए सामान लेकर आ रहे थे। इससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हुआ और कतर जैसे देशों ने अमेरिका और सोवियत संघ से मदद मांगी। यहां सबसे पहले सोवियत संघ मदद के लिए पहुंचा और तेल के जहाजों को सुरक्षित निकलने में मदद की, लेकिन अमेरिका इस क्षेत्र में सोवियत प्रभाव को बर्दाश्त नहीं कर सकता था और उसके ऊपर से वह ईरान को अपना दुश्मन मानता था, तो ऐसी स्थिति में वर्ष 1986 में वह अपनी नौसेना लेकर यहां पर सुरक्षा देने के लिए गया। कुछ ही महीनों के अंदर अमेरिका ने यहां पर बड़ी संख्या में जहाज तैनात कर दिए। वह कतर के जहाजों समेत कई व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा प्रदान करने लगा।

होर्मुज की सुरक्षा करते अमेरिका को मिले जख्म

इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए अमेरिका सुरक्षा देने के लिए कूद तो गया था,लेकिन युद्ध के दौरान हानि होना तय होता है। अमेरिका के साथ भी यही हुआ। 17 मई 1987 को अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस स्टार्क के ऊपर इराकी विमान ने गलती से दो मिसाइलें दाग दी। इस हमले में 37 अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई और कई घायल हुए। इस घटना ने दिखाया कि युद्ध में गलतियां कितनी घातक हो सकती हैं। उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने कहा था कि सैनिकों के सामने आने वाले खतरे को कभी कम करके नहीं आंका जा सकता।

इस हमले के अलावा अमेरिका का एक और जहाज ‘ब्रिगेटोन’ जहाजों को सुरक्षित रूप से एस्कॉर्ट करने के दौरान ईरान द्वारा बिछाई गई माइन के चपेट में आ गया। इस घटना से अमेरिकी नौसेना की काफी किरकिरी हुई थी। इसके अलावा अमेरिकी युद्धपोत यूएएस सैम्यूअल बी रॉबर्ट्स भी 1987 में एक माइन से टकरा गया था, जिसकी वजह से यह जहाज लगभग दो हिस्सों में टूट गया था, हालांकि क्रू सदस्यों ने बहादुरी दिखाते हुए जहाज को बचा लिया था।

लगातार होते इस नुकसान के बाद अमेरिका ने सीधे तौर पर ऑपरेशन प्रेयिंग मैन्टिस शुरू करके ईरानी नौसेना पर हमला बोलना शुरू कर दिया। इस अभियान में उसने ईरानी तेल प्लेटफार्म्स, नौसैनिक जहाजों पर भी जोरदार हमला किया। अमेरिका के इस हमले और इराक के साथ लगातार होते युद्ध के बाद पूरा खाड़ी क्षेत्र परेशान था। इसके बाद 1988 में दोनों देशों के बीच यूएन की मध्यस्थता में शांति समझौता हुआ। ईरान के खुमैनी ने इस समझौते को ‘जहर का घूंट’ करार दिया था।

इस अभियान के दौरान अमेरिका को नौसैनिक रूप से काफी नुकसान उठाना पड़ा था। अभी डोनाल्ड ट्रंप द्वारा होर्मुज खोलने के लिए दूसरे देशों की मदद मांगना इसी तरह के नुकसान से बचने का तरीका हो सकता है।

वर्तमान में क्या स्थिति?

1990 के दशक से लेकर अभी 2026 में टेक्नोलॉजी में काफी बदलाव आया है। ड्रोन्स और एआई वॉरफेयर ने पूरे युद्ध क्षेत्र को बदलकर रख दिया है। खुले समुद्र में बड़े युद्धपोत एक खुला निशाना होते हैं। ईरान केवल एक 20 हजार डॉलर के ड्रोन से अमेरिका को नुकसान पहुंचा सकता है। उस समय पर जब तकनीक ज्यादा उच्च नहीं थी, तब भी अमेरिका को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। अब अगर अमेरिका ऐसा करने के लिए आता है, तो नुकसान ज्यादा हो सकता है।

इसके अलावा ईरान द्वारा समुद्र में बिछायी गई माइन भी एक बड़ा खतरा हैं। हालांकि, अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका के पास माइन हटाने की क्षमता सीमित है और उसे सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ सकता है। इसलिए अमेरिका इसके लिए नाटो सहयोगियों की तरफ देख रहे हैं, लेकिन ट्रंप का पुराना व्यवहार और यूरोप समेत कई देशों की राजनीति इस समय ऐसी उलझी हुई है कि कोई भी देश नए झमेले में नहीं पड़ना चाहता। हालांकि, हाल ही में कई देशों ने यहां पर आने की पुष्टि की है। हालांकि, अमेरिका की ईरान युद्ध की नीति को लेकर कुछ विशेषज्ञ यह भी सवाल उठा रहे हैं कि अगर ट्रंप प्रशासन ने इतिहास से सबक लिया गया होता, तो टैंकरों की सुरक्षा की योजना पहले ही बना ली जाती।

SOURCE : LIVE HINDUSTAN