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ईरान के जवाबी हमले से अमेरिकी एयर डिफ़ेंस सिस्टम पर उठ रहे हैं सवाल

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Source :- BBC INDIA

ईरान ने बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े के हेडक्वार्टर को निशाना बनाकर मिसाइल हमला किया, जिसके बाद धुआं उठता दिखा. इसे उसने अमेरिकी और इसराइली हमलों का बदला बताया

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ईरान ने बहरीन में अमेरिकी नौसैनिक बेस को निशाना बनाया है, जिससे अमेरिकी एयर डिफ़ेंस में कमियाँ सामने आई हैं.

ज़ाहिर तौर पर यह अमेरिका और इस इलाक़े में उसके साथी देशों के लिए चिंता की बात होगी.

वीडियो में मिसाइलें और ड्रोन बहरीन में अमेरिका के पांचवें बेड़े के हेडक्वार्टर के आस-पास हमला करते दिख रहे हैं.

ख़बर लिखे जाने तक इस हमले में किसी के हताहत होने की कोई सूचना नहीं है.

अमेरिकी मिलिट्री को शायद इस हमले की कुछ चेतावनी मिली होगी और सावधानी बरतते हुए उसने अपने लोगों को यहां से निकाल लिया होगा.

ब्रिटिश रॉयल नेवी के पूर्व कमांडर टॉम शार्प का कहना है कि ‘ईरान ने बहरीन को शायद एक हाई प्रोफ़ाइल टारगेट के तौर पर देखा होगा, जहां पहले एयर डिफ़ेंस की स्थिति अपेक्षाकृत ज़्यादा अच्छी नहीं थी.

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अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े के हेडक्वार्टर पर ईरानी मिसाइल हमले के बाद उठता धुआं

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अमेरिका ने बढ़ाई है हवाई सुरक्षा व्यवस्था

ऐसा लगता है कि एक वीडियो में ईरान का एक धीमी गति वाला शाहेद ड्रोन उसके डिफ़ेंस को तोड़ता हुआ दिख रहा है.

यूक्रेन में ऐसे ड्रोन को अक्सर एक साधारण हाई कैलिबर मशीन-गन से मार गिराया जा सकता है.

ख़बर है कि पिछले कुछ हफ़्तों में अमेरिका ने इस इलाक़े में और एयर डिफ़ेंस सिस्टम भेजे हैं, जिनमें आधुनिक थाड और पैट्रियट सिस्टम शामिल हैं.

ये बैलिस्टिक मिसाइलों को मार गिरा सकते हैं. लेकिन ये काफ़ी महंगे हैं और इनकी संख्या भी कम है.

इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि यूक्रेन के पास दस से भी कम पैट्रियट बैटरी हैं और वह अभी भी राजधानी कीएव की रक्षा करने के लिए संघर्ष कर रहा है.

अभी भी यह आसान नहीं है कि अमेरिका के पास मिडिल ईस्ट में अपने सभी सैन्य अड्डों और हितों की रक्षा करने के लिए ये काफी संख्या में हों.

अमेरिकी नेवी ने खाड़ी और पूर्वी भूमध्य सागर में लगभग एक दर्जन अर्ले बर्क-क्लास डिस्ट्रॉयर भी तैनात किए हैं.

ये एयर डिफ़ेंस डिस्ट्रॉयर ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों को भी मार गिरा सकते हैं. ये यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के ख़िलाफ़ रेड सी में पहले ही असरदार साबित हो चुके हैं.

साल 2024 और 2026 के बीच अमेरिका ने लगभग चार सौ हूती ड्रोन और मिसाइलों को इंटरसेप्ट किया.

इस इलाक़े में भेजे गए अमेरिकी फाइटर जेट भी ड्रोन और मिसाइलों को इंटरसेप्ट करने में सक्षम हैं. अमेरिका के पास अब इस इलाक़े में एक सौ से ज़्यादा लड़ाकू विमान हैं.

लेकिन ये बड़ी क्षमताएँ भी ईरान को कुछ टारगेट पर सफलतापूर्वक हमला करने से रोकने के लिए शायद काफ़ी नहीं हैं.

अमेरिका और इसराइल के इन नए हमलों से पहले, ईरान के पास शायद क़रीब दो हज़ार कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का जखीरा था. उसके पास और भी कई वन-वे अटैक ड्रोन हैं.

ईरान का शाहेद ड्रोन रूस को निर्यात किया गया है और यह पूरे यूक्रेन में तबाही मचा रहा है. रूस अब हर महीने हज़ारों ऐसे ड्रोन बना रहा है और शायद उसने ईरान को अपनी तकनीक विकसित करने में मदद दी है.

ईरान में बने शाहेद ड्रोन ने यूक्रेन में मचाई है तबाही

शाहेद ड्रोन

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शार्प का कहना है कि रॉयल नेवी में अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने मिडिल ईस्ट में मिलिट्री बेस पर ईरानी हमले की नकल करते हुए वॉर गेम्स किए थे.

इस दौरान कई बार मिसाइल और ड्रोन सीमित एयर डिफ़ेंस को भेदकर अपना रास्ता बना लेते थे.

वे कहते हैं, “अगर ईरानी सब कुछ छोड़ देते हैं. अगर शासन को ख़तरा महसूस होता है और तेज़ी से हमला करते हैं, तो अंत में अमेरिका के पास थाड और पैट्रियट इंटरसेप्टर ख़त्म हो जाएंगे.”

शार्प का यह भी कहना है कि ईरान की ड्रोन और मिसाइल क्षमता “बहुत ज़्यादा विस्तृत है.”

लेकिन अमेरिका में विदेश नीति पर काम करने वाले रिसर्च इंस्टीट्यूट फाउंडेशन फॉर डिफ़ेंस ऑफ़ डेमोक्रेसीज एक सीनियर फेलो एडमंड फिटन-ब्राउन कहते हैं कि इस बात के सबूत हो सकते हैं कि ईरानी, ​​जवाबी कार्रवाई करना चाहता है, लेकिन इसे एक बड़े झगड़े में नहीं बदलना चाहता.

वे कहते हैं कि यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि पिछले साल अमेरिका और इसराइल के हमलों ने ईरान की कुछ सैन्य क्षमताओं को कितना नुक़सान पहुंचाया.

वे आगे कहते हैं, “शुरुआती संकेत यह हैं कि ईरानी जवाबी कार्रवाई काफ़ी नरम रही है. यह याद रखने वाली बात है कि यमन में हूती विद्रोहियों को एक साल तक टारगेट करने के बाद, अमेरिका ने उनकी मिसाइल और ड्रोन लॉन्च करने की काबिलियत को नुकसान पहुंचाया था, लेकिन ख़त्म नहीं किया था.”

जंग का मैदान अमेरिका से काफ़ी दूर

ईरान के शाहेद ड्रोन ने पूरे यूक्रेन में तबाही मचा दी है (फ़ाइल फ़ोटो)

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सिर्फ़ हवा से लड़ी गई लड़ाइयों में शायद ही कभी कोई पक्की जीत मिलती है या सरकार बदलने का मौक़ा मिलता है.

साल 2011 में लीबिया पर नेटो के नेतृत्व वाला बमबारी अभियान एक बड़ा अपवाद हो सकता है, हालांकि उस दौरान काफ़ी अफ़रा-तफ़री मच गई थी.

अगर वह रेंज में हो तो ईरान के पास अमेरिकी नौसेना पर हमला करने की भी काफ़ी क्षमता है. उसके पास एंटी-शिप मिसाइलों का बड़ा स्टॉक है, साथ ही छोटी, तेज़, बिना क्रू वालीहमलावर बोट भी हैं.

यह भी एक सवाल है जिसका जवाब नहीं मिला है कि क्या चीन ने पिछले कुछ महीनों में ईरान को मिलिट्री सपोर्ट दिया होगा.

अमेरिका में मौजूद सेंटर फ़ॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ के डेनियल बायमैन का कहना है, “शुरुआती हमलों से ईरान के नेतृत्व और सैन्य संपत्तियों को नुक़सान हो सकता है, लेकिन अमेरिका को अभियान जारी रखने के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है, जबकि ईरान के बचने का मुख्य रास्ता बस टिके रहना है.”

एयर डिफ़ेंस के महत्व की याद यूक्रेन दिलाता है. यह राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की की अपने सहयोगियों से सबसे ज़रूरी मांग बनी हुई है. यूक्रेन का मामला यह भी दिखाता है कि सैकड़ों ड्रोन और दर्जनों मिसाइलों से जुड़े कई जटिल हमलों से बचाव करना कितना मुश्किल है.

अमेरिका के पास ज़्यादा संसाधन हैं और वह इसराइल के साथ मिलकर ईरान की ड्रोन और मिसाइल फ़ैक्ट्रियों और लॉन्च साइट्स को टारगेट करेगा.

लेकिन उस ख़तरे को ख़त्म करना आसान नहीं होगा. लंबी लड़ाई सिर्फ़ ईरान के लिए ही नहीं, बल्कि अमेरिका के हथियारों के स्टॉक और सप्लाई के लिए भी एक चुनौती होगी, क्योंकि यह एक ऐसा युद्ध है जो अमेरिका से काफ़ी दूर लड़ा जा रहा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

SOURCE : BBC NEWS