Source :- BBC INDIA

नेपाल में हज़ारों युवा, निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने की अनुमति देने वाला आदेश देश के पूर्व पुलिस प्रमुख ने जारी किया था, इसका उजागर बीबीसी की एक इन्वेस्टिगेशन में हुआ है.
पिछले साल 8 सितंबर को राजधानी काठमांडू में मारे गए 19 लोगों में एक स्कूली यूनिफ़ॉर्म पहना किशोर भी शामिल था, जिसे पीछे से सिर में तब गोली मारी गई थी जब वह भीड़ से दूर जा रहा था. उस दौरान दर्जनों लोग घायल भी हुए थे.
राजनीतिक भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कई हफ़्तों से उबल रहे ग़ुस्से के बीच हुए इन प्रदर्शनों ने और बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया. इन प्रदर्शनों को ‘जेन ज़ी प्रोटेस्ट’ कहा गया. इसके बाद नेपाल के प्रधानमंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा और अगले ही दिन सरकार गिर गई.
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस टीम ने 8 सितंबर की घटनाओं से जुड़े एक आंतरिक पुलिस दस्तावेज़ को देखा है. इसमें उजागर हुआ कि ‘पीटर 1’ नाम के कॉल साइन ने 10 मिनट बाद अपने अधिकारियों से ‘ज़रूरी ताक़त का इस्तेमाल’ करने को कहा था, साथ ही ज़मीनी स्तर पर तैनात पुलिसकर्मी भी कई बार घातक बल प्रयोग की अनुमति मांग चुके थे.
सूत्रों ने बीबीसी आई इन्वेस्टिगेशंस को बताया कि ‘पीटर 1’ का कॉल साइन नेपाल पुलिस के तत्कालीन महानिरीक्षक (आईजीपी) चंद्र कुबेर खापुंग इस्तेमाल करते थे.
खापुंग ने इससे इनकार नहीं किया कि उन्होंने आदेश नहीं दिए थे, लेकिन नेपाल पुलिस का कहना है कि उन्होंने यह क़दम तभी उठाया जब सरकारी सुरक्षा समिति ने इसकी अनुमति दी और जब, नेपाली क़ानून में निर्धारित, अन्य सभी विकल्प इस्तेमाल कर लिए गए थे.
नवंबर में रिटायर हुए खापुंग से बीबीसी ने इस मामले पर टिप्पणी का अनुरोध किया था जिसका जवाब उन्होंने नहीं दिया है.
बीबीसी द्वारा जुटाए गए वीडियो सबूत बताते हैं कि 17 साल के श्रीयम चौलागाईं, 19 मृतकों में सबसे कम उम्र के निहत्थे थे और जब उनकी मौत हुई तब वह घटनास्थल से दूर जाने की कोशिश कर रहे थे.
8 सितंबर की घटनाओं की अभी एक सार्वजनिक जांच चल रही है, जिसकी रिपोर्ट आनी बाकी है. अब तक किसी को भी ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया है- और आम चुनाव 5 मार्च को होने वाले हैं.
बीबीसी ने उन घटनाओं की कड़ी जोड़ी है, जिनका ज़िक्र लीक हुए पुलिस लॉग में है और जिनकी पुष्टि मौके़ पर तैनात अधिकारियों के बयानों में हुई है.
हमने विज़ुअल सबूतों, जिनमें 4,000 से ज़्यादा वीडियो और तस्वीरें शामिल हैं, के साथ–साथ सड़क पर मौजूद लोगों और कमांड सेंटर- जहां से सुरक्षा अधिकारी घटनाओं पर नज़र रख रहे थे- के ब्यौरों का विश्लेषण किया.
इन सबको मिलाकर हमने नेपाल के हालिया इतिहास के सबसे नाटकीय और ख़ून–ख़राबे वाले दिनों में से एक की अब तक की सबसे विस्तृत तस्वीर तैयार की है.
मां नहीं चाहती थी कि वह प्रदर्शन में जाए

चेतावनी: इस रिपोर्ट में शवों की तस्वीरें शामिल हैं
नेपाल एक युवा लोकतंत्र है. 2008 में यह उस गृहयुद्ध के बाद गणराज्य बना, जो 10 साल चला था और जिसमें 17,000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.
नए संविधान से नई शुरुआत करने के वादों का एक दशक बीतने के बाद भी, कई युवाओं का कहना है कि वे उम्मीदें पूरे नहीं हुई हैं.
कुछ अनुमानों के मुताबिक़, हर पाँच में से एक नेपाली युवा बेरोज़गार है.
ज़्यादातर नाराज़गी ऑनलाइन नज़र आती है- ख़ासकर जनरेशन ज़ी के बीच, जिनकी उम्र 14 से 29 साल के बीच है.
पिछले अगस्त में, जेन ज़ी एक्टिविस्टों ने सोशल मीडिया पर ‘नेपो बेबी’ जैसे शब्द साझा करने शुरू किए- यानी नेपाल के विशेषाधिकार प्राप्त परिवारों के बच्चे.
4 सितंबर को सरकार ने फ़ेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और एक्स समेत कई प्लेटफॉर्म बैन कर दिए.
एक्टिविस्ट इसके बाद डिस्कॉर्ड नाम के गेमिंग चैट ऐप की ओर मुड़ गए- जो संगठित होने का एक मंच बन गया.
इसी के साथ यूथ अगेंस्ट करप्शन फ़ोरम में सदस्यों ने 8 सितंबर को संसद के बाहर होने वाले प्रदर्शन की योजना बनाई.

श्रीयम चौलागाईं की माँ नहीं चाहती थीं कि उनका बेटा प्रदर्शन में जाए.
उन्होंने बीबीसी को बताया, “मैंने उसे रोका था. कहा था कि प्रदर्शन में कुछ भी हो सकता है.”
उनके पिता कहते हैं कि श्रीयम राजनीति में बहुत दिलचस्पी रखता था, “वह कहता था कि भ्रष्टाचार ने नेपाल को भीतर से खोखला कर दिया है. वह मुझसे भी ज़्यादा जानकार था.”
श्रीयम ने माँ को समझाया कि प्रदर्शनकारियों को निशाना नहीं बनाया जाएगा, क्योंकि वे युवा हैं, और स्कूल की वर्दी पहने हुए हैं.
माँ ने कहा, “वह बहुत जिज्ञासु था- यह जानना चाहता था कि दुनिया में क्या चल रहा है.”
वह वक़्त जब ख़ून–ख़राबे की शुरुआत हुई
09:00 बजेः युवा काठमांडू के व्यस्त इलाक़े, मैतीघर मंडल, पर जुटने लगते हैं. यह मध्य काठमांडू का एक व्यस्त चौराहा है, जहां अक्सर बड़े प्रदर्शन होते हैं.
संसद से कई सौ मीटर पहले एक बैरिकेड लगा है.
नेपाल के एक ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल ऑनलाइन ख़बर के संपादक बसंता बस्नेत कहते हैं, “सुरक्षा अधिकारियों ने भीड़ को बहुत कम आंका था. मैंने सुरक्षा कर्मियों और राजनीतिक लोगों से बात की- वे कह रहे थे कि ‘बच्चे’ प्रदर्शन के लिए आ रहे हैं.”
करीब 30,000 लोग प्रदर्शन के लिए पहुंचे- यह संख्या पुलिस की उम्मीद से 10 गुना ज़्यादा थी.
एक पुलिस अधिकारी ने नाम ज़ाहिर न करने की शर्त पर बीबीसी को बताया, “हमारे पास प्रदर्शन के लिए एक तय पैटर्न होता है कि भीड़ कैसे व्यवहार करेगी. लेकिन इस नई पीढ़ी को हम समझ ही नहीं पाए- न उनका सोशल मीडिया, न उनकी ग्राउंड पर जुटने की क्षमता.”
प्रदर्शनकारी संसद की तरफ़ बढ़ने लगे, लेकिन पुलिस बैरिकेड ने उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया.
11:47 बजे: प्रदर्शनकारियों का एक समूह बैरिकेड को पार करने का रास्ता ढूंढ लेता है. इससे पुलिस अचानक चौंक जाती है और बैरिकेड छोड़ देती है. भीड़ आगे बढ़ जाती है और प्रदर्शनकारी संसद के गेट तक पहुंच जाते हैं.
12:15 बजे: प्रदर्शनकारियों का एक समूह संसद परिसर की दीवारें पार कर जाता है. पुलिस आँसू गैस छोड़ती है और लाठियां बरसाती है. भीड़ पीछे नहीं हटती- जबकि डिस्कॉर्ड पर आयोजक लोगों से पीछे हटने की अपील करते रहते हैं.
वीडियो फुटेज में श्रीयम संसद के गेट के बाहर दिखाई देते हैं. हरे रंग का स्कूल जम्पर पहने और एक बैकपैक लिए हुए, वह एक बैनर लिए खड़े हैं जिस पर लिखा है, “यूथ अगेंस्ट करप्शन”.
वहीं दूसरी जगहों पर प्रदर्शन और हिंसक होते जा रहे थे.
कंट्रोल रूम के अंदर की स्थिति
सरकारी दफ़्तरों के बड़े परिसर के पास वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी संसद से लगभग 3 कि.मी. दूर एक कंट्रोल रूम में इकट्ठा हैं.
यहाँ सिविल पुलिस, सेना, सशस्त्र पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों के प्रतिनिधि मौजूद हैं. सुरक्षा बैठक की अध्यक्षता राजधानी के मुख्य ज़िला अधिकारी और सीनियर सिविल सर्वेंट छबी लाल रिजाल कर रहे हैं.
कमांड सेंटर में अधिकारी संसद के आस-पास लगे सीसीटीवी कैमरों से लाइव फ़ीड हासिल करने की कोशिश करते हैं.
नाम ज़ाहिर न करने वाले एक अधिकारी के अनुसार, उनके पास टीवी तो है, लेकिन डेडिकेटेड इंटरनेट लाइन नहीं, और जब कनेक्शन बनाने की कोशिश की जाती है तो वह ‘स्थिर नहीं रहता’.
उस दिन वहां मौजूद जिन पुलिस अधिकारियों से हमने बात की उनके मुताबिक़, उस दिन किसी एक व्यक्ति या किसी एक यूनिट को हालात की पूरी तस्वीर समझ में नहीं आ रही थी.
12:30 बजेः मुख्य ज़िला अधिकारी तुरंत कर्फ़्यू लागू कर देते हैं, जिससे प्रदर्शन अवैध हो जाते हैं. पुलिसकर्मी लाउडस्पीकर से लोगों को घर जाने का आदेश देते हैं.
लेकिन आदेश मानने के बजाय, कुछ प्रदर्शनकारी एक पुलिस यूनिट को घेर लेते हैं और उन पर ईंट-पत्थर फेंकना शुरू कर देते हैं.
लगभग उसी समय की फ़ुटेज में दिखता है कि संसद के गेटहाउस में आग लगी हुई है. कई पुलिस सूत्रों और पुलिस लॉग के अनुसार, संसद परिसर और उसके आस-पास के डरे हुए पुलिसकर्मियों ने कमांड सेंटर को मदद के लिए रेडियो पर संदेश भेजे.
नाम ज़ाहिर न कर, एक पुलिस अधिकारी ने हमें बताया, “हममें से कई बुरी तरह घायल थे. एक ने तो वहां से निकाले जाने की गुहार लगाई.”
जब लाठियाँ, वॉटर कैनन और रबड़ की गोलियां इस्तेमाल करने के बाद भी भीड़ नहीं हटी, तो पुलिसकर्मियों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से बार–बार लाइव एम्युनिशन यानी असली गोलियां चलाने की अनुमति मांगी.
12:40 बजेः जो पुलिस लॉग हमने देखे, उनके और कई पुलिस सूत्रों के मुताबिक़, तब अनुमति दे दी गई.
‘ऐसे गोली चलाई जैसे वे दुश्मन हों’

सभी सूत्र इस मंज़ूरी को एक ही कॉल साइन से जोड़ते हैं: पीटर 1.
पुलिस लॉग में पीटर 1 का आदेश दर्ज है: “कर्फ़्यू पहले से लागू है. आगे किसी अनुमति की ज़रूरत नहीं. आवश्यक ताक़त का प्रयोग करें.”
पीटर 1, उस समय के पुलिस महानिरीक्षक (आईजीपी) चंद्र कुबेर खापुंग थे.
बाद में नेपाल के सुप्रीम कोर्ट में दिए गए एक जवाब में खापुंग ने इसकी ज़िम्मेदारी लेने से इनकार किया और नेपाल पुलिस ने बीबीसी से कहा कि गोली चलाने का फ़ैसला उस सुरक्षा समिति ने लिया था, जिसकी अध्यक्षता रिजाल कर रहे थे.
पुलिस के पत्र में कहा गया कि खापुंग ने “सुरक्षा समिति के निर्णय से पहले बल प्रयोग का आदेश नहीं दिया था.”
सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े हालात में, बल प्रयोग बढ़ाने या गोली चलाने जैसे फ़ैसलों का अधिकार कानूनी रूप से पुलिस नहीं, बल्कि सुरक्षा समिति के पास होता है.
लेकिन उस समिति के तत्कालीन अध्यक्ष रिजाल ने अदालत में लाइव राउंड (असली गोलियों) के इस्तेमाल की अनुमति देने से इनकार किया.
हमसे बात करने वाले कई पुलिस अधिकारियों ने स्वीकार किया कि उस दिन ख़ुफिया तंत्र, तैयारी और कमांड में गंभीर चूकें हुई थीं.
कई लोगों ने कहा कि वे इतनी बड़ी भीड़ के इतनी तेज़ी से डिस्कॉर्ड के ज़रिए जुट जाने के लिए तैयार नहीं थे. दूसरे कई अधिकारियों ने पूछा कि सेना का समर्थन समय पर क्यों नहीं मिला.
बहुत से अधिकारियों ने कहा कि वे आज भी उस दिन की यादों से परेशानी महसूस कर रहे हैं.
एक ने कहा, “हमारे जवानों ने उन पर ऐसे गोली चलाई जैसे वे दुश्मन हों.”
वीडियो में दर्ज पहली मौत
13:15 बजेः सीधे गोली लगने से पहली मौत को बीबीसी ने दर्ज किया है. वीडियो साक्ष्य में दिखता है कि एक प्रदर्शनकारी, 34 वर्षीय बिनोद महर्जन, को सिर में गोली लगने के बाद लोग उठाकर ले जा रहे हैं. उनकी बाद में अस्पताल में मौत हो गई.
बीबीसी ने कर्फ़्यू लगने के बाद हुई गोलीबारी की 6 घटनाओं का विश्लेषण किया है. जिन फुटेज की जांच की गई, उनमें किसी भी पीड़ित को हिंसा करते नहीं देखा गया.
14:09 बजेः श्रीयम- जो उस दिन हुई गोलीबारी के सबसे कम उम्र के शिकार थे- फुटेज में शांति से आगे की भीड़ से दूर जाते हुए दिखते हैं, जहां से कुछ प्रदर्शनकारी पुलिस पर पत्थर फेंक रहे थे, लेकिन श्रीयम उनसे दूर थे.
स्कूल बैग अब भी उनके कंधे पर था. वह चलते हुए ताली बजाते हैं, एक भाव जो शांत दिखता है.
तभी एक गोली उनके सिर के पीछे लगती है, और वह ज़मीन पर गिर जाते हैं.
14:21 बजेः बीबीसी को मिले वीडियो सबूतों में दिखता है कि पुलिस संसद परिसर के अंदर से प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग कर रही है. हम यह पुष्टि कर पाए कि पुलिस ने भीड़ पर कम-से-कम सात गोलियां चलाईं.
प्रदर्शनकारी चारों ओर बिखर जाते हैं, कोई इमारतों के बीच की जगह में छिपता है, कोई फुटपाथ के किनारे झुक जाता है.
कुछ लोग अपने सिर को बचाने के लिए उसे ढक लेते हैं.
24 वर्षीय योगेंद्र न्यौपाने को भी गोली लगी और वह गंभीर (जानलेवा) रूप से घायल हो गए.
बीबीसी के अनुसार आखिरी गोली शाम करीब 4 बजे चली. संसद के बाहर का प्रदर्शन सूर्यास्त तक ख़त्म हो गया. लेकिन छिटपुट विरोध रात भर चलते रहे.
सभी उम्र के लोग सड़क पर उतरे
8 सितंबर को संसद के गेट पर हुई हत्याओं से गुस्साए हर उम्र के नेपाली अगले दिन सड़क पर उतर आए. जो विरोध के रूप में शुरू हुआ था, वह तेज़ी से भीड़ की हिंसा में बदल गया और पुलिस पहला निशाने बनी. कई पुलिस थाने जला दिए गए, पुलिसकर्मियों पर हमले हुए और तीन मारे गए.
संसद परिसर, सुप्रीम कोर्ट और कई सरकारी इमारतों में भी आगजनी की गई. कुल मिलाकर उस अशांति में 77 लोग मारे गए.
हालांकि राजनीतिक दलों, पुलिस और प्रदर्शनकारियों, सबने आरोप लगाया कि राजनीतिक हितों से प्रेरित कुछ संगठित समूहों और घुसपैठियों ने हालात बिगाड़े, लेकिन बीबीसी की जाँच में इन दावों के समर्थन में कोई सबूत नहीं मिला.
9 सितंबर को दोपहर लगभग 2:30 बजे, प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफ़ा दे दिया और सरकार गिर गई. रात तक पूरे काठमांडू में कई इमारतें जल रही थीं, और कम से कम 50 से लोगों के मारे जाने की ख़बर थी.
रात 9 बजे सेना ने नियंत्रण संभाल लिया.
अब तक किसी ने भी इन घटनाओं की ज़िम्मेदारी नहीं ली है.
तत्कालीन गृहमंत्री रमेश लेखक, पूर्व प्रधानमंत्री ओली, और खापुंग व रिजाल, किसी ने भी इसे अपनी ज़िम्मेदारी नहीं माना.
नेपाल पुलिस ने बीबीसी से कहा, “हम ऐसे हालात में फँस गए थे, जहां कई घटनाओं का एक साथ सामना करना पड़ रहा था.”
इस बीच, मृतकों के परिवार अब भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं.
श्रीयम की माँ कार्की कहती हैं कि वह आज तक ठीक से रो भी नहीं पाई हैं.
उन्होंने हमसे कहा, “मुझे अब तक नहीं लगता है कि वह चला गया है… मुझे अब भी महसूस होता है कि वह अभी वापस आ जाएगा.”
“मेरे दिमाग में वह अब भी स्कूल की यूनिफ़ॉर्म पहने दिखता है. वह अपना बैग झुलाते हुए वापस आ जाएगा.”
एंटोनी शिरर, राफ़िद हुसैन और विक्टोरिया अराकेलियन की अतिरिक्त रिपोर्टिंग
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
SOURCE : BBC NEWS


